जयपुर लिटरेचर फ़ेस्टिवल संसार का सबसे बड़ा साहित्य समारोह समझा-माना जाता है और उसकी यह कीर्ति अकारण नहीं है. उसके तीन पक्ष हैं. पहला कि वह साहित्य को सिर्फ़ रचनात्मक और आलोचनात्मक साहित्य तक सीमित करने के बजाय भाषा में किये गये सभी कर्मों अर्थात् चिंतन, इतिहास, पुरातत्व, सिद्धांत, पत्रकारिता, राजनैतिक,धर्म, दर्शन आदि को शामिल करता है. दूसरा जितनी बड़ी संख्या में उसमें वक्ता संसार भर और भारत से बुलाये जाते हैं उतने कहीं और नहीं. तीसरा कि उसमें श्रोताओं-दर्शकों की संख्या पांच दिनों में लगभग पांच लाख होती है जितनी, जहां तक जानकारी है, किसी और ऐसे समारोह में नहीं आती. चौथा पक्ष यह भी है कि इस समारोह में प्रमुखता उनकी है जो अंग्रेज़ी में बोलते-लिखते हैं. दुर्भाग्य से, हिंदी और अन्य भारतीय भाषाएं इस समारोह में अल्पसंख्यक ही हैं. अपवाद छोड़कर उनके सत्रों में भीड़ भी नहीं होती.

इस बार भी बेहद भीड़ थी और समारोह स्थल में जाना और उसके द्वार तक पहुंचना मुश्किल का काम था. चलना बहुत पड़ता है और फिर ज़्यादातर वक़्त किसी भी सत्र में बैठने की जगह नहीं मिलती. इस बार मैंने कई सत्र खड़े होकर ही सुने. खड़े लोगों की संख्या अब तो बैठे हुओं के बराबर होने लगी है. वक्तव्य, बातचीत, बहस आदि के विषयों में बहुत विविधता थी. इस बार तथाकथित दक्षिणपंथियों को अधिक जगह दी गयी और उनमें से एकाध तो सात-आठ सत्रों में मुखर थे. यह भी अलक्षित नहीं जा सकता कि इस बार वाम दृष्टिवाले लोग बहुत कम, लगभग न के बराबर थे. भले उनका राजनैतिक अवमूल्यन हो गया हो, इससे इनकार करना मूर्खता होगी कि बुद्धि, ज्ञान और सृजन के क्षेत्र में इस दृष्टि ने हमें अनेक मूर्धन्य और उल्लेखनीय लोग दिये हैं जो अब भी, विपरीत परिस्थिति में सक्रिय हैं.

दूसरी ओर, यह भी सही है कि बहुत सारे वक्‍ता वर्तमान की समीक्षा करते हुए मुखर और निडर होकर बोले. अगर साहित्य और बुद्धि, ज्ञान और सृजन उसके प्रयोक्ताओं को निर्भय न करें तो वह उनको निर्भय कैसे कर सकता है जो उससे प्रभावित या प्रतिकृत होते हैं? ऐसे बड़े समारोह अपनी गहमागहमी और उत्तेजना के बावजूद थकाऊ भी होते हैं. पर बीच-बीच में ऐसे कुछ युवा भी मिलते रहे जो आपके साहित्य से परिचित हैं और उनमें से कई ने मेरे हाल के प्रकाशित कविता संग्रह पढ़ रखे हैं. युवाओं की बड़ी संख्या, जो कुछ दिन तो अपार लगती थी, समारोह को पिकनिक मानकर उसमें आती हैं. उनमें से अधिकांश का अंग्रेज़ी के प्रति आकर्षण अब भक्ति के स्तर पर पहुंच रहा है. उनमें से अधिकांश अपनी मातृभाषा को तजते युवा लगे. समारोह के अंतर्गत जो बड़ी पुस्तकों की दूकान है उसमें अंग्रेज़ी पुस्तकें ही बहुत थीं और वही बिकीं. हिंदी की पुस्तकें एक छोटे से रैक में थीं और उन्हें इस क़दर उलटा-पुलटा गया था कि वे बेतरतीब और अनाकर्षक ही दिख रही थीं. हो सकता है कि रहे हों पर, दुर्भाग्य से, मुझे एक भी ऐसा विदेशी वक्ता नहीं मिला जिसे भारतीय भाषाओं में लिखे जा रहे को लेकर कोई जिज्ञासा हो. भारतीय भाषाओं की इस अदृश्यता को लेकर मेरी ही तरह क्षुब्ध थे, बांग्ला और अंग्रेज़ी के उपन्यासकार कुणाल सेन.

जयपुर में लाठ

जयपुर में दर्शनीय ऐतिहासिक स्थल कई हैं और जवाहर कला केंद्र जैसी चार्ल्स कोरिया द्वारा आकल्पित इमारत भी. पर हम जैसों के लिए जयपुर का एक अधिकतर अनदेखा-अनजाना स्तंभ, लाट है, कवि-चिंतक-अनुवादक और अप्रतिम कलासंग्राहक मुकुंद लाठ और उनका घर जो आधुनिक कला का एक निजी संग्रहालय है. शायद ही भारत में किसी और व्यक्ति के पास पचास से अधिक वर्षों के दौरान संग्रहीत ऐसी कलाकृतियां हैं जो मुकुंद जी के निजी संग्रह में हैं. हम लोग जब लिटफ़ेस्ट की चिन्ता छोड़कर एक दिन सुबह उनके यहाँ गये तो फ्रेंच कलाविदों का एक दल, विशेष रूप से, उनका संग्रह देखने आया हुआ था। उनके घर का एक बड़ा हिस्सा बहुत ही सुकल्पित कथावीथिका है जिसमें उनके संग्रह का एक बड़ा भाग सुरुचि और समझ से प्रदर्शित है. उनके पास पुस्तकों का भी एक नायाब संग्रह है जो भी इस वीथिका का हिस्सा है. अनेक कक्षों में फैली इस वीथिका में गणेश पाइन, जोगेन चौधरी, परितोष सेन, लक्ष्मा गौड़, जामिनी राय, सनत कर, सोमनाथ होर, नन्दगोपाल, मक़बूल फ़िदा हुसेन, रज़ा, जार्ज कीट आदि की बहुत रुचि से चुनी गयी कलाकृतियां हैं. संचयन मे बंगाल की प्रधानता है क्योंकि मूलतः तो मुकुंद जी कोलकाता के ही हैं.

मुकुंद जी संस्कृति, भारतीय परम्परा, संगीत, सौंदर्यशास्त्र आदि पर दशकों से बड़े अध्यवसाय से विचार करते रहे हैं. अभी हाल में उनके निबंधो का एक संचयन ‘भावन’ नाम से रज़ा पुस्तकमाला के अंतर्गत राजकमल प्रकाशन से आया है. वे इन दिनों वेद के हिंदी अनुवाद में लगे हैं. बहुत कम निकलते हैं. घर पर ही काम करते, रोज़ शास्त्रीय गायन करते रहते हैं. उन्होंने बरसों पंडित जसराज से संगीत सीखा है. हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत पर उनका चिंतन वैसे भी अद्वितीय और अतुलनीय है। उनकी विनम्रता, मनोयोग, अध्यवसाय और जिजीविषा सभी अदम्य है। उनक अपनी प्राथमिकताएँ हैं और उन्हें उनसे विरत कर किसी और विषय पर बुलवाना या लिखवाना बहुत कठिन होता है. पर अगर आप उनके चल रहे काम में रुचि लें तो फिर वे सहयोग, उदार होकर, करते हैं. मैंने ‘पूर्वग्रह’ के ज़माने से उनसे बहुत बार इसी हिकमत का इस्तेमाल कर लिखवाया-बुलवाया है. उनके जैसा सहज और हंसमुख वक्ता हिंदी में दूसरा नहीं है. यह कहने का मन होता है कि जिसने मुकुंद लाठ की कला संपदा नहीं देखी और जो उनसे मिला नहीं उसने जयपुर नहीं देखा. जयपुर सिर्फ़ अतीत वैभव नहीं है और न ही वर्तमान राजस्थानी रंगबिरंगापन: वह मुकुंद लाठ की गहरी विद्वत्ता, कलासंग्रह और सृजनशीलता भी है.

इधर-उधर

लेखकों, कलाकारों, बुद्धिजीवियों आदि की जीवनियों में मेरी पुरानी दिलचस्पी है और मुझे जब ऐसी कोई जीवनी मिल जाये, ज़रूर खरीद लेता हूं. इस बार जयपुर लिटफ़ेस्ट की दूकान में बेंजामिन मोज़र द्वारा लिखी गयी अमरीकी लेखक-बुद्धिजीवी सूसान सौण्टैग की जीवनी मिली जो ‘सौण्टैग: हर लाइफ़’ नाम से एलेन लेन ने प्रकाशित की है. नीदरलैण्ड और फ्रांस में रहनेवाले लेखक ने इससे पहले ब्राज़ीली उपन्यासकार क्लेरिन्स लिस्पेक्टर की जीवनी भी लिखी है. एक तरह से वे जीवनीकार-लेखक हैं. बहरहाल, सौण्टैग की जीवनी 820 पृष्ठों की है. उसमें 100 से अधिक पृष्ठों की सन्दर्भसूची है. ऐसी सुशोधित और सुसन्दर्भित जीवनी हिन्दी में शायद एक भी नहीं है. न जाने क्यों सन्दर्भ को अज्ञात या अप्रगट रखने का चलन हमारे यहां इस क़दर है.

इस जीवनी के मुखड़े के रूप में सौण्टैग के साथ एक प्रश्नोत्तर दिया गया है जो इस प्रकार है:

प्रश्न: क्या तुम हमेशा सफल होती हो?

उत्तर: हां, मैं तीस प्रतिशत बार सफल होती हूं.

प्रश्न: तब तुम हमेशा सफल नहीं होतीं?

उत्तर: हां, मैं होती हूं. समय के तीस प्रतिशत में सफल होना हमेशा होना है.

एक और पुस्तक हाथ लगी पास्काल वियनार की. ‘दि रोविंग शैडोज़’ जो फ्रेंच से अनूदित है और सीगल द्वारा प्रकाशित है. पढ़ने और लिखने पर एक संहिता की तरह पठनीय इस पुस्तक की संरचना सांगीतिक है और उसमें ऐतिहासिक प्रसंगों, पूर्व और पश्चिम की लोकथाओं, मिथकों के अंशों आदि को बहुत ही उदग्र कल्पनाशीलता से गूंथा गया है.

‘नंगे पांव शिक्षक’ शीर्षक छोटे से अध्याय में लिखा गया है. ‘एक रहस्यपूर्ण नंगे पांव शिक्षक का उतना ही रहस्यमय उपदेश है. ईश्वर एक अंधेरा है. जब सब प्रकाश चला जाये तो वह अचानक अंधेरा है जो आत्मा में निवेश करता है’. एक ओर अध्याय का एक अंश यों है: ‘मैंने धरती की तीर्थ यात्राएं की हैं. अतीत को संचित करने के लिए नहीं बल्कि भूतपूर्व के संकतों के लिए. हम दरिद्र पहेलियां हैं. पहेली वह प्रश्न होती है जो ऐसा उत्तर न्योतती है जिसने उसे रचा है. उत्तर जिसने रचा है बीत चुका. अटकल लगाने वाला जानता है कि उत्तर हमेशा अतीत होता है.’

एक ओर इन्दराज़ है: ‘कला सिर्फ़ पुनर्जन्म जानती है. प्रकृति उद्गम है. कला कभी उस नन्हें प्रस्फुटन से बड़ी नहीं होती जो वसंत में शाखाओं से हलके सफ़ेद कलियों का होता है.’