सियाचिन जैसे अत्यधिक ऊंचाई वाले इलाकों में तैनात जवानों के खाने-पीने से लेकर उनके कपड़ों और रहने की व्यवस्था जैसी चीजों का ठीक से ख्याल नहीं रखा जा रहा है. सीएजी की एक रिपोर्ट में यह बात कही गई है. यह रिपोर्ट कल संसद में रखी गई. इसके शब्द हैं, ‘ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पहले जाने वाले विशेष कपड़ों और वहां इस्तेमाल होने वाले जरूरी उपकरणों की खरीद में चार साल तक की देरी देखी गई. इसके चलते इनकी काफी कमी हो गई.’ सीएजी के मुताबिक बर्फीले इलाकों में चौंध से आंखों को बचाने वाले स्नो गॉगल की 62 फीसदी तक कमी देखी गई. सीएजी के मुताबिक नवंबर 2015 से सितंबर 2016 के दौरान जवानों को ‘मल्टी परपज बूट’ नहीं दिए जा सके. इसके चलते पुराने जूतों को दुरुस्त करके ही काम चलाना पड़ा.

सीएजी रिपोर्ट में इंडियन नेशनल डिफेंस यूनिवर्सिटी की स्थापना में हो रही देरी का भी जिक्र है. इसकी सिफारिश 1999 के करगिल युद्ध के बाद बनी एक कमेटी ने की थी. सीएजी के मुताबिक इस परियोजना की लागत 395 करोड़ रु की तुलना में 914 फीसदी छलांग लगाते हुए 4007.22 करोड़ हो चुकी है, लेकिन इसका धरती पर उतरना अब भी बाकी है.

सीएजी की यह रिपोर्ट उन खबरों के बीच आई है जिनमें कहा गया है कि सेना आम बजट में उसे हुए आवंटन से खुश नहीं है. इस बार रक्षा बजट में मामूली बढ़ोतरी करते हुए 2020-21 के लिए इसमें 3.37 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है. पिछले बजट में यह आंकड़ा 3.18 लाख करोड़ रुपये था. तीनों बल ज्यादा बजट आवंटन की मांग करते रहे हैं ताकि काफी समय से लंबित आधुनिकीकरण योजनाओं को आगे बढ़ाया जा सके. विशेषज्ञों के मुताबिक रक्षा आवंटन जीडीपी का 1.5 प्रतिशत बना हुआ है, और यह 1962 के बाद से सबसे कम है. पिछले वर्ष बालाकोट हमले के बाद से रक्षा बजट बढ़ाए जाने की उम्मीद थी.