इसकी घोषणा के एक साल और गठित होने के 7 महीने बाद भी नीति आयोग के ही बुनियादी मसले सुलझ नहीं पा रहे तो देश के उलझे हुए आर्थिक मसलों पर उससे क्या उम्मीद की जाए!
15 जुलाई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नीति आयोग की बैठक बुलाई थी. लेकिन यह एक बड़ी हद तक सिर्फ भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक बनकर रह गई. कांग्रेस शासित नौ राज्यों के अलावा पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और ओडिशा के मुख्यमंत्री भी इसमें शामिल नहीं हुए. नीति आयोग की संचालन परिषद की यह दूसरी बैठक थी. इसमें शामिल न होने को लेकर सबने अपने-अपने कारण गिनाए. उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत का कहना था कि दिल्ली में होने के बावजूद वे इस बैठक में इसलिए नहीं गए कि इसमें भूमि अधिग्रहण बिल पर चर्चा होनी थी जिस पर कांग्रेस का रुख भाजपा की अगुवाई वाली केंद्र सरकार के बिल्कुल उलट है. तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने कहा कि वे अन्य जरूरी सरकारी कामों में व्यस्त हैं.
यह क्रांतिकारी तो था लेकिन इस लिहाज से कि उन्होंने 1950 में गठित होने के बाद 64 साल तक महाशक्तिशाली रहे योजना आयोग को एक झटके में खत्म कर दिया था.
पिछले साल योजना आयोग जैसे विभाग को खत्म करके उसकी जगह नीति आयोग बनाने के अपने फैसले को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने क्रांतिकारी करार दिया था. यह क्रांतिकारी तो था लेकिन इस लिहाज से कि उन्होंने 1950 में गठित होने के बाद 64 साल तक महाशक्तिशाली रहे योजना आयोग को एक झटके में खत्म कर दिया था. वही योजना आयोग, जिसके आगे बड़े-बड़े राज्यों के मुख्यमंत्री भी बेचारे से नजर आते थे. प्रधानमंत्री की घोषणा के करीब एक साल और गठित होने के 7 महीने बाद भी नीति आयोग के ही बुनियादी मसले सुलझ नहीं पा रहे तो उससे देश के उलझे हुए आर्थिक मसलों पर क्या उम्मीद की जाए! 15 जुलाई की बैठक इसका सबसे नया उदाहरण है. दरअसल पिछले कुछ समय के दौरान ऐसी कई खबरें आई हैं जो संकेत देती हैं कि यह महत्वपूर्ण संस्था उस तरह से काम नहीं कर पा रही जैसा इसके बारे में बताया-सोचा गया था. खबरों के मुताबिक न तो आयोग सदस्यों को यह ठीक से पता है कि व्यवस्था को चलाने वाली सत्ता के नक्शे में उनकी क्या हैसियत है और न ही यह कि उन्हें अपनी प्राथमिकताएं क्या रखनी हैं.
नीति आयोग के जिम्मे बहुत से अहम काम हैं. उसे केंद्र द्वारा चलाई जा रही योजनाओं का अध्ययन करके उन्हें एक नया स्वरूप देना है. उसे स्किल इंडिया मिशन और स्वच्छ भारत मिशन के लिए एक रोडमैप भी बनाना है. आयोग गरीबी उन्मूलन और कृषि पर एक रिपोर्ट भी तैयार कर रहा है. आने वाले दिनों में राष्ट्रीय ऊर्जा नीति और सबके लिए घर जैसी योजनाओं में भी उसकी अहम भूमिका होगी. लेकिन लगता है कि उससे पहले उसे अपना घर ठीक करने की जरूरत है.
इसी साल जनवरी में जब एशियाई विकास बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री और कोलंबिया यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर अरविंद पनगढ़िया को नीति आयोग का उपाध्यक्ष बनाया गया था तो सरकार के इस कदम की खूब चर्चा हुई थी. यह स्वाभाविक भी थी. चर्चित अर्थशास्त्री जगदीश भगवती के साथ मिलकर लिखी गई पनगढ़िया की किताब व्हाई ग्रोथ मैटर्स को आजाद भारत में हुए आर्थिक विकास और उसके असर को समझने के लिए एक जरूरी दस्तावेज माना जाता है. भगवती को नरेंद्र मोदी का बेहद करीबी और आर्थिक मामलों में उन्हें सलाह देने वाला माना जाता है और पनगढ़िया को उनका शिष्य. पनगढ़िया ही वह शख्स भी रहे जिन्होंने राजस्थान में उन श्रम सुधारों की अगुवाई की जिन्हें अब दूसरे राज्य भी अपना रहे हैं.
अरविंद पनगढ़िया की स्थिति अब यह है कि उन्हें कैबिनेट की बैठकों में बुलाया ही नहीं जाता. आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति की बैठकों में भी नहीं
खबरों के मुताबिक अरविंद पनगढ़िया की स्थिति अब यह है कि उन्हें कैबिनेट की बैठकों में बुलाया ही नहीं जाता. आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति की बैठकों में भी नहीं, जबकि उनसे पहले जो मोंटेक सिंह अहलूवालिया योजना आयोग के उपाध्यक्ष थे, वे नियमित तौर पर इन बैठकों में रहते थे. इसकी वजह जानकार उस अस्पष्टता को मानते हैं जो पनगढ़िया के अधिकारों को लेकर है.
दरअसल पनगढ़िया को कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया गया था. लेकिन बाद में खबर आई कि उनकी तनख्वाह कैबिनेट सचिव के रैंक की है. जानकारों के मुताबिक इससे यह संदेश गया कि कैबिनेट मंत्री का दर्जा सिर्फ दिखाने का है जिसका कोई खास राजनीतिक वजन नहीं है. नौकरशाही के लिए यह संदेश काफी था. उसने पनगढ़िया की उपेक्षा करना शुरू कर दिया. बताया जाता है कि पहले जब पनगढ़िया कोई बैठक बुलाते थे तो इसमें सारे सचिव मौजूद होते थे. बाद में उनकी स्थिति अस्पष्ट होने पर उन्हीं सचिवों ने बैठकों में अपने जूनियर अधिकारियों को भेजना शुरू कर दिया.
दूसरी समस्या नेतृत्व को लेकर है. बताया जाता है कि आयोग में जब कभी मुख्यमंत्रियों के सब ग्रुप्स की बैठकें होती हैं तो इनकी कमान मुख्यमंत्रियों के हाथ में ही होती है. जानकारों के मुताबिक जिस तरह के स्वतंत्र थिंक टैंक के रूप में इस संस्था की कल्पना की गई थी उसके हिसाब से एजेंडा आयोग के सदस्यों को तय करना चाहिए. लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा.
नीति आयोग में अनिश्चित संख्या में स्थायी और दो तक अस्थायी सदस्य हो सकते हैं. लेकिन फिलहाल इसमें केवल दो स्थायी सदस्य - अर्थशास्त्री बिबेक देबरॉय और पूर्व रक्षा सचिव वीके सारस्वत - ही हैं
एक और समस्या स्टाफ की कमी की भी है. नीति आयोग में अनिश्चित संख्या में स्थायी और दो तक अस्थायी सदस्य हो सकते हैं. लेकिन फिलहाल इसमें केवल दो स्थायी सदस्य - अर्थशास्त्री बिबेक देबरॉय और पूर्व रक्षा सचिव वीके सारस्वत - ही हैं. आयोग के स्थायी सदस्य के रूप में डॉयचे बैंक में वैश्विक रणनीतिकार संजीव सान्याल की नियुक्ति का मामला लंबे समय से लटका हुआ है. जानकारों के मुताबिक आयोग को शीर्ष स्तर पर ही कम से कम छह अधिकारियों की जरूरत है. इसके अलावा मिडिल और लोअर लेवल पर भी कई अधिकारी चाहिए. इसके चलते ही बताया जा रहा है कि वह जल्द ही करीब 100 लोगों की भर्ती कर सकता है.
संचालन के मामले में भी नीति आयोग में स्पष्टता का अभाव दिखता है. उदाहरण के लिए कौन से सदस्य का काम क्या है, इस बारे में कोई स्पष्ट दिशानिर्देश नहीं हैं. आयोग को अब तक यह भी पक्के तौर पर पता नहीं है कि क्या पंचवर्षीय योजना को पूरी तरह से खत्म कर दिया गया है. यह भ्रम आयोग की संचालन परिषद (जिसमें प्रधानमंत्री के अलावा मुख्यमंत्री भी होते हैं) के एक फैसले से हुआ है जिसमें कहा गया गया है कि नीति आयोग को 2016-17 में खत्म होने वाली पंचवर्षीय योजना की एक मध्यावधि समीक्षा पेश करनी चाहिए. योजनागत और गैरयोजनागत श्रेणी में आने वाले वित्तीय आवंटन का काम अब वित्त मंत्रालय ही देख रहा है, सो इस मोर्चे पर भी आयोग के लिए कोई काम नहीं बचा.
साफ है कि देश की दशा ठीक करने से पहले नीति आयोग को अपना घर ठीक करने की जरूरत है.