आजकल उत्तर-पूर्वी दिल्ली, दिल्ली शहर का एक ऐसा कोना बन चुका है जहां एनआरसी-सीएए के खिलाफ सबसे ज्यादा विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. इस इलाके में सीलमपुर, चांद बाग, जाफराबाद, यमुना विहार, खुरेजी खास समेत कुल नौ जगहों पर विरोध के तंबू गड़े हुए हैं.

सुबह का वक्त है और हम सीलमपुर के धरनास्थल पर हैं. बस स्टॉप से कुछ ही कदम की दूर, सर्विस लेन पर दरियां बिछाकर करीब 25-30 महिलाएं बैठी हुई हैं. मंच की तरफ, होर्डिंगनुमा पोस्टर रस्सियों से बांधकर लगाया गया है जिस पर लिखा है ‘सीएए-एनआरसी के खिलाफ औरतों का इंकलाब.’ इसके साथ-साथ यहां पर अंबेडकर-गांधी की तस्वीरों के अलावा तमाम तरह के नारों से लिखी तख्तियां भी लगी और रखी दिखाई देती हैं.

यहां बैठी महिलाओं से उनकी कम संख्या के बारे में पूछने पर एक प्रदर्शनकारी निकहत कहती हैं कि ‘देखिए, ज़िंदगी तो रुक नहीं सकती है. हमारे बच्चे जिनकी नौकरियां करते हैं, उनका नुकसान तो नहीं कर सकते हैं. बच्चे भी स्कूल जाते हैं. इसलिए सुबह के वक्त ज्यादातर औरतें अपनी घरेलू जिम्मेदारियां निभाने चली जाती हैं.’ तीन साल से रिटायर्ड टीचर की फुर्सत भरी ज़िंदगी जीने वाली निकहत आगे हंसते हुए जोड़ती हैं, ‘और हम बुड्ढियां बैठी रहती हैं. मोदीजी की तरह 18 घंटे काम तो नहीं कर सकतीं पर बैठ सकती हैं, सो बैठी रहती हैं. लेकिन अगर आप शाम के वक्त आएं तो आपको यहां पांच-सात सौ लोगों की भीड़ मिलेगी.’

कुछ और बातों के बाद निकहत का कहना था कि ‘सीलमपुर का नाम सबसे पहले पत्थरबाजी के चलते खबरों में आया था, इसलिए हमें दोगुनी सावधानी रखनी पड़ी है. पहले आठ दिन तो हमने सिर्फ शाम को मोमबत्ती जलाकर प्रदर्शन किया. अब 15 दिन से ज्यादा हो गए जब हम 24 घंटे के लिए धरने पर बैठ गए हैं.’ इस बातचीत के बीच एक अन्य प्रदर्शनकारी नज़्मा हमें चाय के लिए पूछती हैं और मना करने पर मुस्कुराते हुए कहती हैं कि ‘वो जो चाय बेचते थे उन्होंने हमें आपको चाय पिलाने का मौका दिया है, इसलिए पी लीजिए.’

यहां पर चाय-खाने और बाकी इंतज़ाम से जुड़े सवालों के जवाब दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा नीलिमा देती हैं. वे बताती हैं ‘दिल्ली यूनिवर्सिटी का एक स्टूडेंट ग्रुप है – पिंजड़ा तोड़. शुरू में उसके सदस्यों ने यहां पर महिलाओं को प्रदर्शन के लिए इकट्ठा करने का काम किया, बाद में महिलाओं ने खुद कमान संभाल ली. अब छात्र और प्रदर्शन करने वाले लोग मिल-जुलकर यहां की व्यवस्थाएं देखते हैं.’ थोड़ी-थोड़ी देर में दो-दो, तीन-तीन महिलाओं के कई समूह प्रदर्शन स्थल पर पहुंचते हैं. इनमें से कई महिलाएं बच्चों के साथ भी दिखाई देती हैं. इस बीच हमारा सबसे ज्यादा ध्यान एक चार-पांच साल का बच्चा खींचता है. यह बच्चा अपनी मां से बार-बार यह कहता दिखता है कि उसे कब जिंदाबाद का नारा लगाना है और कब आज़ादी बोलना है.

सीलमपुर विरोध प्रदर्शन में महिलाएं

महिलाओं और बच्चों को छोड़कर, हम प्रदर्शन स्थल से थोड़ी दूर खड़े कुछ पुरुषों के एक समूह से बातचीत करने की कोशिश करते हैं. इनमें से ज्यादातर लोग इस विरोध का समर्थन करने की बात करते हैं. ये सभी लोग आसपास ही रहते हैं और कहते हैं कि प्रदर्शन के चलते उन्हें कोई असुविधा नहीं हो रही है. कुछ समय पहले हुई हिंसा का जिक्र आने पर, अखिलेश झा कहते हैं कि ‘यह इलाका गरीब या निम्न मध्यमवर्गीय लोगों का है. यहां कोई रसूख वाला नहीं रहता इसलिए पुलिस को लगता है कि इधर के लोगों को आसानी से पीटा जा सकता है. सो वो पीट देती है. जब हिंसा हुई तो कुछ लोगों की गलती थी लेकिन कुछ पुलिस की जिद भी थी.’ वहीं, उनके मित्र आरके गुप्ता इससे असहमत होने के साथ-साथ प्रदर्शन को बेजा भी ठहराते हैं. गुप्ताजी का कहना है कि ‘पुलिस को अगर कुछ गड़बड़ लगे तो वह मारती ही है. इन लोगों को तो नहीं मारा. और फिर सरकार ने बिल्कुल सही फैसला किया है. ये विरोध प्रदर्शन वगैरह करने का भी कोई फायदा नहीं होगा.’ पुलिस का जिक्र आया तो हमने नोटिस किया कि उस समय वहां पर कोई पुलिसकर्मी मौजूद नहीं था. कुछ प्रदर्शनकारी महिलाएं बताती हैं कि पुलिस दोपहर बाद तब आती है जब भीड़ बढ़ने लगती है.

सीलमपुर से खुरेजी के बीच करीब साढ़े पांच किलोमीटर का सफर तय करने के दौरान हमारी बातचीत माधव से होती है. माधव उस ऑटो के चालक हैं जिस पर हम यह सफर तय करते हैं. प्रदर्शनों के बारे में पूछने पर वे हमसे उल्टा सवाल करते हैं कि ‘आप मोदी-भक्त हैं क्या?’ नहीं में जवाब देने पर माधव अपने बिहारी अंदाज में कहते हैं कि ‘प्रदर्शन तो ठीक ही हो रहा है. हिंदु-मुस्लिम सबको मिलकर रहना चाहिए. सौ बात का एक बात है.’ यह खटकने वाली बात है कि एक साधारण से सवाल का जवाब देने के पहले वे सामने वाले का राजनीतिक रुझान जाने लेने की सावधानी बरतते हैं. ऐसा क्यों है, यह जानने के लिए उतरते हुए हमने उनसे कई सवाल पूछे जिनका मिला-जुला जवाब वे कुछ इस तरह देते हैं - ‘अपनी सेफ्टी के लिए पूछना ठीक रहता है. भक्त लोग कुछ सुनता नहीं है. इस चक्कर में हमारा एगो दोस्त भी छूट गया तो पहले ही पूछ लेते हैं. इसलिए कह देते है कि हम कुछ नहीं जानते. जाइए. मोदीएजी से पूछिए. वैसे हम मोदीजी को ही वोट दिए थे.’

गीता कॉलोनी की तरफ जाने वाली सिंगल लेन सड़क के एक किनारे पर, खुरेजी खास में आयोजित धरने की झलक दिखाई देती है. लेकिन यहां सड़क किनारे प्रदर्शन की तस्वीरें और प्लेकार्ड ही दिखाई देते हैं, महिलाओं का पता नहीं चलता है. पूछने पर इंडिया गेट के रेप्लिका की तरफ इशारा करते हुए बताया जाता है, ‘इंडिया गेट से अंदर चले जाइए.’ बमुश्किल बीस मीटर की इस दूरी में एक सज्जन हमें रोककर पूछते हैं, मीडिया से हो? हां, कहने पर वे कहते हैं, ‘लिखना, तिवारीजी ने भी कहा है कि धरना बंद नहीं होगा.’ तिवारी जी इस इलाके में दूध बेचते हैं.

खुरेजी खास में धरने पर बैठी महिलाएं

इस छोटे से इंडिया गेट के बगल में, 13-14 साल का एक किशोर कुछ किताबें, जिनमें महात्मा गांधी की ‘हिंद स्वराज’ की प्रतियां सबसे ज्यादा हैं, और अलग-अलग भाषाओं के कई अखबार लेकर बैठा है. आगे एक व्हाइट बोर्ड रखा है जिस पर लिखा है ‘नॉट फॉर सेल. पढ़कर वापस रख दें.’ आगे बढ़ने पर, एक मैदान में तिरपाल लगाकर धरने पर बैठी महिलाएं दिखती है. रात में बारिश होने के चलते प्रदर्शन स्थल पर बैठने के इंतज़ाम दोबारा किए जा रहे हैं. लेकिन इस दौरान भी महिलाओं की नारेबाज़ी जारी है. करीब 15 मिनट तक चली नारेबाज़ी के बाद बच्चों का कार्यक्रम शुरू होता है. वे मंच पर आकर कविताएं सुनाते हैं, गाने गाते हैं और नारे भी लगवाते हैं. इनमें से कुछ बच्चों से जब पूछा गया कि वे स्कूल जाने की बजाय यहां क्यों आएं हैं तो एक ने मस्ती में जवाब दिया कि ‘अरे आपा, डेढ़ बज रहे हैं. स्कूल जाके आ गए.’

खुरेजी में लोगों के पढ़ने के लिए रखे गए अखबार और किताबें

यहां पर प्रदर्शनकारियों में से एक नासिरा बताती हैं कि ‘रात में बारिश हो गई तो ठंड बढ़ गई लेकिन उसका कोई असर हममें नहीं दिख रहा है. बस, जो बोलने वाले मेहमान आते थे, उनमें से कोई अभी तक नहीं आया है.’ यहां पर बैठी शहनाज़ हमें अपने पास बुलाती हैं और बड़े मसखरे अंदाज़ में कहती हैं कि ‘मोदीजी से कहिएगा. शुक्रिया मोदीजी, आपने तो ठंड से मेरा डर ही खत्म कर दिया. नहीं तो मैं कभी लिहाफ से निकलती ही नहीं थी. 500 रुपए देने पर भी नहीं.’ दिलचस्प है कि इस जिक्र के अलावा कहीं पर 500 रुपए का कोई नामलेवा नहीं दिखता है. हां, इस बातचीत को आधे घंटे बाद यहां बिरयानी खाने-खिलाने का वह प्रोग्राम ज़रूर होता है जो पिछले दिनों मीडिया और सोशल मीडिया पर खासा सुर्खियां बटोरता रहा है.

अब हम खुरेजी खास के दुकानदारों की ओर रुख करते हैं. उनसे प्रदर्शन के बारे में पूछते हैं तो वे उससे किसी तरह की दिक्कत होने से इनकार करते हैं. लेकिन इनमें से कई ऐसे हैं जो इसे बेकार की कवायद मानते हैं. पेशे से इलेक्ट्रीशियन रवि कहते हैं कि ‘11 सालों से यहां पर मेरी दुकान है. कभी सड़क पर मुसलमान औरतों की ऐसी भीड़ मैंने नहीं देखी थी. लेकिन इस गज़ब के बाद भी सरकार पर कोई असर होगा, मुझे इसकी उम्मीद नहीं लगती है.’

नाउम्मीदी भरी इस टिप्पणी के बाद हम निज़ामुद्दीन इलाके में चल रहे विरोध प्रदर्शन के लिए मेट्रो पकड़ते हैं. इस सफर के दौरान देखने वाली बात यह रही कि छब्बीस जनवरी बीतने के कई दिन बाद भी दिल्ली के तमाम इलाकों में खासी पुलिस तैनात दिखाई देती है. हालांकि वह सुबह उतनी नहीं थी लेकिन धीरे-धीरे पुलिस वालों की संख्या बढ़कर किसी आम दिन से ज्यादा दिखाई देने लगती है. यह दिल्ली में हो रहे प्रदर्शनों के अलावा शायद यहां हो रहे चुनाव की वजह से भी है.

इसके अलावा, एक और चीज़ जो आपका ध्यान खींचती है, वह है तिरंगा झंडा. दिल्ली घूमते हुए यह तिरंगा अब किसी के भी हाथ में, चेहरे पर, कपड़ों में नज़र आ सकता है. और ऐसा करने वाला हिंदू या मुसलमान कोई भी हो सकता है. इंद्रप्रस्थ मेट्रो स्टेशन पर हमसे कुछ छात्र टकराते हैं जिनके चेहरे पर तिरंगा पुता हुआ है. छात्र बताते हैं कि वे किसी विरोध प्रदर्शन में नहीं बल्कि कोचिंग क्लास गए थे. लेकिन उन्हें सीएए-एनआरसी पर अपना विरोध दर्ज करवाना है इसलिए वे अक्सर ऐसा करते हैं. कुछ लोगों को यह आश्चर्यजनक लग सकता है कि सात छात्रों के इस समूह में कोई भी मुसलमान नहीं था.

निज़ामुद्दीन दरगाह के पास धरना स्थल पर महिलाएं

निज़ामुद्दीन दरगाह पर हो रहा विरोध प्रदर्शन असल में दरगाह के पीछे और शिव मंदिर के आगे चल रहा है. इस विरोध प्रदर्शन को अपनी लोकेशन के चलते साम्प्रदायिक सौहार्द्र का एक उदाहरण भी कहा जा सकता है. जब हम यहां पहुंचे तो यहां पर सौ से ज्यादा महिलाएं किसी अतिथि वक्ता को सुनती हुई मिलीं. पूछने पर बस इतना पता चलता है कि बोलने वाले एक रिटायर्ड फौजी अधिकारी हैं. 26 जनवरी से शुरू हुए इस धरना प्रदर्शन को अभी कुछ ही दिन हुए हैं इसलिए यहां की व्यवस्थाएं उतनी चाक-चौबंद नहीं दिखती हैं. लेकिन चाय और फल के इंतज़ाम यहां पर भी दिखाई देते हैं.

इसके अलावा, मंदिर की तरफ जाने वाला रास्ता भी एकदम चालू दिखता है जबकि प्रदर्शनकारियों की दरियां इसके किनारे तक बिछी हुई हैं. इस रास्ते जाने वाले या प्रदर्शन स्थल के समांतर जाने वाली, लाला लाजपत राय सड़क से गुजरने वाले लोग कभी अपनी गाड़ियों की रफ्तार धीमी कर तो कभी ठहरकर यह समझने की कोशिश करते दिखते हैं कि यहां आखिर चल क्या रहा है. दिलचस्प यह है कि यहां पर जब राष्ट्रगान गाया जाता है तो चलती गाड़ियों के अलावा सबकुछ थम जाता है. खुरेजी और सीलमपुर से अलग इस प्रदर्शन स्थल पर दस से ज्यादा पुलिसकर्मी तैनात दिखते हैं. साथ ही पुलिस मेहमानों के भाषण की रिकॉर्डिंग करती हुई भी नज़र आती है.

निज़ामुद्दीन विरोध प्रदर्शन में भाषण रिकॉर्ड करती पुलिस

इस प्रदर्शन के बारे में, दसवीं कक्षा में पढ़ाई कर रहीं फरहत कहती हैं, ‘मुझे सीएए की बारीकियां नहीं पता हैं लेकिन धार्मिक आधार पर भेदभाव संविधान के खिलाफ है. मैं मुसलमानों के लिए नहीं संविधान के लिए आती हूं. बाकी बातें बड़े जानें.’ उन्हीं की तरह पहले दिन से यहां आने वाली समीना अहमद का कहना है कि ‘कई लोगों को कहते सुना यह आज़ादी की दूसरी लड़ाई है तो मैं भी यहां आ गई.’ पिछले साल अपनी सरकारी नौकरी से वीआरएस लेने वाली समीना कहती हैं, ‘मुझे अर्थराइटिस है इसलिए मैं एक ही दिन शाहीन बाग जा पाई. अगर हम यहां पर नहीं बैठते तो मुझे बड़ा अफसोस रहता कि जब मुल्क को हमारी ज़रूरत थी तो हम बीमारी का बहाना किए पड़े थे.’

हमारा अगला पड़ाव शाहीन बाग ही है जहां से इस तरह के विरोध-प्रदर्शनों की शुरुआत हुई थी. दुनिया भर में मशहूर हो चुके शाहीन बाग के मेट्रो स्टेशन पर पहुंचते ही आपको प्रदर्शन के चिन्ह दिखाई देने लगते हैं. मेट्रो स्टेशन से निकलते हुए ही कई सामाजिक कार्यकर्ता-समाजसेवी सरीखे लोग आपको प्रदर्शन स्थल की तरफ बढ़ते या वहां से लौटते दिखते हैं. इसके अलावा, कई ऐसे लोग भी नज़र आते हैं जिन्हें देखकर यह अंदाजा लग जाता है कि ये इन इलाकों के बाशिंदे नहीं है और शायद केवल विरोध में शामिल होने या उसे देखने के लिए यहां पहुंचे हैं. थोड़ी मसखरी करने की इज़ाजत मिले तो, हम कहना चाहेंगे कि इसके लिए हमने कपड़ों से लोगों को पहचानने वाली नरेंद्र मोदीजी तकनीक का इस्तेमाल नहीं किया था.

मुद्दे पर लौटें तो मेट्रो स्टेशन की सीढ़ियों के आस-पास कई ऑटो और ई-रिक्शॉ उतरने वालों को घेरते हुए ‘धरना 40 रुपए, धरना 40 रुपए’ की रट लगाते दिखते हैं. मेट्रो स्टेशन से धरना स्थल की दूरी बमुश्किल एक किलोमीटर है, इसलिए यह कीमत वाजिब नहीं कही जा सकती है. लेकिन प्रबंधन का कोई कोर्स न करने के बावजूद इन रिक्शे वालों को मांग और आपूर्ति के सिद्धांत का पता है. धरने की तरफ पैदल बढ़ते हुए हमें ऐसे कई लोग आते-जाते दिखाई देते हैं जिनके हाथ में तिरंगे झंडे हैं या चेहरे पर तीन रंग का पेंट लगा हुआ है. इसके अलावा सड़क के किनारों पर भी तोरण की तरह तिरंगे लगे हुए दिखाई देते हैं. कुल मिलाकर, अगर आपको प्रदर्शन स्थल का रास्ता नहीं भी मालूम है तो भी इन तिरंगों का पीछा करते हुए आप वहां तक पहुंच सकते हैं. प्रदर्शन स्थल के एकदम पास कई जगह पर व्हाइट पाउडर की मदद से भी दिशा बताने का का इंतज़ाम किया गया है.

घड़ी में शाम के छह बज रहे हैं और प्रदर्शन स्थल के आसपास काफी गहमा-गहमी का माहौल है. आगे जाकर देखने पता चलता है कि कुछ नाश्ता और फल बांटे जा रहे हैं जिसके चलते थोड़ी अव्यवस्था सी हो गई है. इन प्रदर्शनों में महिलाएं लगातार बैठी रहती हैं, इसलिए उनके लिए चाय-नाश्ते का इंतज़ाम लगभग हर जगह देखने को मिलता है और दिन भर में इसके कई दौर आते हैं. इस दौरान मंच से घोषणा होती है कि कुछ देर के लिए यह काम रोक दिया जाए क्योंकि लखनऊ से सामाजिक कार्यकर्ता सदफ जफर यहां महिलाओं को संबोधित करने पहुंची हैं.

शाहीन बाग के मंच से महिलाओं को संबोधित करती सामाजिक कार्यकर्ता सदफ जफर

सदफ जफर के संबोधन के दौरान हमने एक महिला से पूछा कि क्या वे जानती हैं कि मंच पर कौन बोल रहा है. वे इंकार में सिर हिलाते हुए कहती हैं ‘बस ये कोई नेता नहीं है, इतना पता है.’ पास खड़ी एक दूसरी महिला बताती हैं कि ‘ये सदफ जफर हैं जिन्हें सीएए-एनआरसी का विरोध करने के चलते यूपी पुलिस ने पकड़ लिया था और बहुत टॉर्चर किया था.’

शाम गहराने के साथ प्रदर्शन स्थल पर भीड़ बढ़ती जा रही है. इसके आसपास चाय-कॉफी, फल और तमाम तरह के स्नैक्स की रेहड़ियां दिखाई देती हैं जिन पर काफी भीड़ लगी दिखती है. यह इस बात की तरफ इशारा करती हैं कि ऑटो-रिक्शॉ वालों के साथ इस धरने ने कई और लोगों के भी रोज़गार का इंतजाम कर दिया है. हालांकि इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि शाहीन बाग इलाके का वह बाज़ार जहां तमाम बड़े ब्रांड्स के फैक्ट्री आउटलेट्स हैं, डेढ़ महीने से भी ज्यादा वक्त से बंद पड़े हैं.

शाहीन बाग में सीएए-एनआरसी के विरोध प्रदर्शनों की क्रोनोलॉजी बताती फोटो सीरीज

आसपास घूमने पर प्रदर्शन स्थल के समांतर जाने वाली सड़क पर तमाम तरह की कलाकृतियां और रोड आर्ट देखने को मिलते हैं और लोग इनकी या इनके साथ तस्वीरें लेने में व्यस्त नज़र आते हैं. हालांकि पिछले दो दिनों की बारिश के चलते इनमें से ज्यादातर धुलकर धुंधले हो गए हैं. लेकिन फिर भी फुटओवर ब्रिज पर लटके तमाम पोस्टर, भारत का विशालकाय नक्शा, डिटेंशन कैंप का मॉडल और मोमबत्ती लेकर बैठे बच्चों की वजह से यहां के माहौल में इनकी कोई कमी महसूस नहीं होती है.

शाहीन बाग में लगाया गया डिटेंशन कैंप का मॉडल

शाहीन बाग में जाने के बाद यह साफ दिखता है कि महिलाओं के इस प्रदर्शन को छात्रों का साथ मिलने से यह बेहद रचनात्मक हो गया है. इसी के चलते नोएडा से कालिंदी कुंज जाने वाली लेन की तरफ जो बस स्टॉप हुआ करता था, वह अब एक छोटी सी लाइब्रेरी में तब्दील हो चुका है. खुरेजी की तरह यहां पर भी हिंद स्वराज और गांधीजी की बाकी किताबों की प्रतियां और अखबार दिखाई देते हैं. यहां पर मौजूद जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्र बताते हैं कि ये सभी किताबें लोगों ने डोनेट की हैं जिन्हें यहां आने वाला कोई भी व्यक्ति वापस करने की शर्त पर पढ़ सकता है.

लाइब्रेरी में तब्दील हुआ शाहीन बाग बस स्टॉप

यहां पर कुछ लोग जिनमें से कई वॉलंटियर्स हैं, अचानक बैरिकेड्स की ओर भागते हैं और दिल्ली से नोएडा की तरफ जा रही एम्बुलेंस के लिए रास्ता खोल देते हैं. इस पर टिप्पणी करते हुए ओखला से यहां पर प्रदर्शन देखने आए नवीन रैकवार कहते हैं कि ‘मैं यहां पर कई दिन आ चुका हूं. स्कूल के बच्चों और एम्बुलेंस के लिए तो ये लोग रास्ता खोलकर अच्छा काम करते हैं. लेकिन अगर पूरा खोल दें तो शायद इन्हें ज्यादा लोगों का समर्थन मिल सकेगा.’

शाहीन बाग से निकलकर शाम आठ बजे के करीब हम जामिया मेट्रो स्टेशन पर उतरते हैं, प्रदर्शन स्थल का रास्ता खोजते हुए हमें दो बच्चे मिलते हैं जिनकी उम्र तकरीबन 11-12 साल होगी. बातचीत के दौरान उनमें से एक का कहना था कि ‘हमें आज़ादी चाहिए’ और ‘विरोध प्रदर्शन इसलिए हो रहे हैं क्योंकि मुसलमानों को देश से निकाला जा रहा है.’ जोश के साथ आधी-अधूरी बातें समझने-करने वाले इन बच्चों की कुछ बातों को सुनकर बेहद खुशी होती है तो कुछ से उतनी ही चिंता भी होती है. खैर, वे हमें प्रदर्शन स्थल का रास्ता बताते हैं जहां पहुंचने पर सबसे पहले एक टी-स्टाल हमारा ध्यान खींचता है.

इस टी-स्टाल पर हमें अमान मिलते हैं जो एमिटी यूनिवर्सिटी के छात्र हैं. उनके स्टाल पर चाय के कई कप और एक डोनेशन बॉक्स दिखाई देता है. सोशल वर्क में ग्रेजुएशन कर रहे अमान बताते हैं कि ‘यह चाय सबके लिए है. लेकिन अगर कोई हमारी मदद करना चाहता है तो वह अपनी मर्ज़ी के मुताबिक पैसे इस डोनेशन बॉक्स में डाल देता है. इन्हीं पैसों से बाकी लोगों को चाय पिलाने का खर्च निकाला जाता है.’ न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी की तरफ जाने वाली इस सड़क पर ऐसे कई टी-स्टालों के अलावा किताबों का ठीक वैसा ही ठिकाना भी मिलता है, जैसा हम खुरेजी और शाहीन बाग में देख चुके थे. यहां पर कुछ छात्र पोस्टर बनाते हुए भी दिखाई देते हैं. इस दौरान, सड़क पर या सड़क किनारे बिछे इन दरी-गद्दों में युवाओं को पड़े देखकर अगर यह सोचें कि ये भी अपने घरों के लाडले होंगे तो बड़ा अजीब सा अहसास होने लगता है.

जामिया मिलिया इस्लामिया के पास मुफ्त में चाय स्टॉल चला रहे कुछ छात्र

जामिया में चल रहा आंदोलन शाहीन बाग से दो दिन पहले शुरू हुआ था और अब इसमें छात्रों के साथ महिलाएं भी शामिल हो चुकी हैं. बाटला, ओखला जैसे इलाकों से आने वाली ये महिलाएं दिन-रात यहां बैठी रहती हैं. हालांकि यहां पर कोई मंच नहीं बनाया गया लेकिन एक कोने को मंच की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है. यहां एक तरफ बापू की बड़ी तस्वीर लगी हुई है और सामने एक प्रोजेक्टर लगाया गया है जिस पर बापू के ही कुछ दुर्लभ दृश्य दिखाई दे रहे हैं. इसे बहुत ध्यान से देख रहीं रौनक अफरोज़, हमारा परिचय जानने के बाद कहती हैं कि ‘हम भी सत्याग्रह कर रहे हैं. गांधीजी वाला. पुलिस ने हमारे बच्चों को मारा लेकिन हम यहां धरने पर बैठे हैं, किसी को मारने नहीं गए.’

जामिया मिलिया इस्लामिया के पास चल रहे प्रदर्शन में महात्मा गांधी का बड़ा सा पोस्टर और उनके कुछ वीडियो देखते प्रदर्शनकारी

एक अन्य प्रदर्शनकारी शहनाज़ जो अपनी तीन पीढ़ियों यानी बेटियों और नवासे के साथ इस धरने पर बैठी हैं, इस प्रदर्शन की सबसे अच्छी बात पूछने पर कहती हैं कि ‘हमें गलतफहमी थी कि हिंदू हमें देश में नहीं रहने देना चाहते हैं लेकिन अब वह दूर हो गई है. यहां जितने मुसलमान है, उतने ही हिंदू भी हैं.’ आगे वे शाहीन बाग का जिक्र करते हुए कहती हैं कि ‘मैं अपनी तीनों बेटियों के साथ कभी-कभी शाहीन बाग भी जाती हूं और रोज़ाना यहां आकर बैठती हूं. बस बुरा ये लगता है कि प्रेस वाले हमें बदनाम कर रहे हैं. एक तरफ नागरिकता का सबूत देना है और एक तरफ सच्चे होने का, दोनों कैसे करें. कैसे लोगों को बताएं कि हम देश के लिए यहां बैठे हैं. और जब तक सरकार डंडे नहीं मारेगी बैठे रहेंगे.’

शहनाज़ के अलावा यहां पर मौजूद कुछ छात्रों से बात करने पर भी यह महसूस होता है कि जिस सरकार और मीडिया पर लोगों का भरोसा होना चाहिए, वे उसी से सबसे ज्यादा डरते हैं और निराश भी हैं.