निर्देशक - विधु विनोद चोपड़ा
लेखक - विधु विनोद चोपड़ा, राहुल पंडिता, अभिजात जोशी
कलाकार - आदिल खान, सादिया, जम्मू के रिफ्यूजी कैंप में रहने वाले तमाम पंडित परिवार
रेटिंग- 2.5/5

नोएडा के एक मल्टीप्लेक्स में शुक्रवार की सुबह नौ बजे का शो लगभग पूरा भरा हुआ मिलता है. ऐसा हमेशा नहीं होता इसलिए कहा जा सकता है कि ज़रूर कुछ खास दर्शक इस फिल्म को देखने पहुंचे थे. ये खास दर्शक वे कश्मीरी पंडित थे जिनकी कहानी कहने का वादा ‘शिकारा’ करती है. यह छोटा सा संयोग ही था कि फिल्म के नायक का नाम शिव धर है और हमारी बगल की सीट पर बैठे शख्स का नाम था संजय धर. कश्मीर के काज़ीगुंड इलाके से संबंध रखने वाले संजय अपनी मां के साथ यह फिल्म देखने पहुंचे थे. और, शायद यह कहने की ज़रूरत नहीं है कि जो त्रासद कहानी सिनेमाघर के परदे पर दिखती है, उसके असली पात्र संजय धर जैसे लोग ही हैं.

इंटरवल के दौरान हुई बातचीत में संजय की मां बताती हैं, ‘ आप जो परदे पर देख रही हैं, वो बिल्कुल सच है. लेकिन ये तो कश्मीर के एक कोने की कहानी है. जरा सोचिए, क्या हालात रहे होंगे जब कश्मीर के हर कोने से कभी किसी का घर फूंके जाने, कभी किसी को गोली मारने या ज़िंदा जला देने जैसी वारदातें रोज़ाना हो रही होंगी.’ थोड़ा भावुक होकर वे यह भी कहती हैं कि ‘कश्मीरी पंडितों के हाल कहने लगोगे तो सौ फिल्में भी कम पड़ेंगी.’

इंटरवल के दौरान, फिल्म के पहले हिस्से से काफी संतुष्ट नज़र आने वाली श्रीमती धर इसके खत्म होने तक अपने रुख पर कायम नहीं रह पाती हैं. उनका परिवार बीते महीने दिल्ली में आयोजित ‘शिकारा’ की स्पेशल स्क्रीनिंग का भी हिस्सा रहा था. यह स्क्रीनिंग 19 जनवरी को रखी गई थी क्योंकि इसी दिन कश्मीरी पंडितों के साथ हुई त्रासदी को तीस साल पूरे हुए थे. इसके बाद इस फिल्म ने मीडिया और सोशल मीडिया पर काफी सुर्खियां बटोरीं थीं. धर परिवार का कहना था कि स्क्रीनिंग के दौरान फिल्म का थोड़ा-सा हिस्सा देखकर उन्हें उम्मीद जगी थी कि उनकी पूरी कहानी परदे पर आएगी. लेकिन फिल्म देखने के बाद लगता है कि वह उम्मीद आधी ही पूरी हुई है. इसके अलावा, उन्हें यह शिकायत भी है कि फिल्म में मुस्लिम किरदारों को दिखाते हुए अति का संतुलन बरतने की कोशिश की गई है.

फिल्म पर आएं तो विधु विनोद चोपड़ा ‘शिकारा’ में कश्मीर को वादी-शहज़ादी कहकर संबोधित करते हैं और इसकी शुरूआत और अंत कुछ ऐसे रचते हैं मानो यह फिल्म नहीं बल्कि एक शहजादी के नाम लिखा कोई प्रेम पत्र हो. फिल्म के शुरूआती चार दृश्यों में जब वे कश्मीरी पंडितों के रीति-रिवाजों, पहनावे और संगीत का बेहद रंगीन खाका खींचते हैं तो इन्हें देखते हुए आप इस दुख से भर जाते हैं कि अब यह सब खत्म हो चुका है.

इसके बाद, फर्स्ट हाफ में शिकारा उन परिस्थितियों को दिखाती हैं जिनमें पंडितों को कश्मीर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा था. इसमें मुसलमान समुदाय के अलग-अलग तबके का खाका खींचा जाना खास तौर पर ध्यान खींचता है. इनके जरिए फिल्म बताती है कि उस दौर में कुछ मुसलमान ऐसे थे जो पंडितों की जान के दुश्मन हो चुके थे, तो कुछ ऐसे भी थे जो उनके लिए जान हथेली पर लेकर खड़े थे. और कुछ इस तरह के भी थे जो पंडितों की धन-संपत्ति लूटने के इरादे से दोनों तरफ हाथ मार रहे थे.

अफसोस की बात है कि फिल्म अपने पहले हिस्से वाली बारीकी और ईमानदारी दूसरे हिस्से में कायम नहीं रख पाती. इंटरवल के कुछ दृश्यों के बाद ही शिकारा एक विशुद्ध प्रेमकथा हो जाती है और देखने वालों को बुरी तरह निराश करने लगती है. इसका ऐसा हो जाना यह भी बताता है कि बॉलीवुड में मुख्यधारा के सिनेमा का मतलब घूम-फिरकर प्रेमकहानी बनाना-दिखाना ही है. फ़िल्म के इस हिस्से में कश्मीर से जुड़े दूसरे जो प्रसंग आते भी हैं, वे काफी उथले और नकली लगते हैं.

अभिनय पर आएं तो ‘शिकारा’ में मुख्य भूमिकाएं निभाने वाले दोनों कलाकारों, आदिल खान और सादिया ने इस फिल्म से डेब्यू किया है. दोनों ही कलाकार अपने चेहरे, चाल और बोलने के खास अंदाज से पूरे कश्मीरी लगते हैं. ज्यादातर वक्त कानों में अट्टाहूर (एक तरह का झुमका) पहने दिखाई देने वाली सादिया हर समय सुंदर दिखती हैं और अपने कच्चे-पक्के काम से खुद के प्रतिभाशाली अभिनेत्री होने का परिचय देती हैं.

सादिया की तुलना में आदिल खान आपको कुछ डिग्री ज्यादा प्रभावित कर सकते हैं. खासकर कश्मीर छूटने के सदमे को वे जिस तरह से परदे पर लेकर आते हैं, मानो कश्मीरी पंडितों की बेचारगी को एक सूरत दे देते हैं. इसके साथ ही उनका बढ़िया तलफ़्फ़ुज़ भी उनकी संवाद अदायगी में वजन पैदा कर देता है. इन दोनों के अलावा, जम्मू के शरणार्थी कैंप में रहने वाले तमाम पंडित परिवार भी शिकारा का हिस्सा बने हैं. इन पर आपकी नज़र तो नहीं टिक पाती लेकिन इस फिल्म को वास्तविकता के करीब रखने में वे भरपूर मदद करते हैं.

बेशक, ‘शिकारा’ की कहानी पत्रकार और लेखक राहुल पंडिता की किताब ‘अवर मून हैज ब्लड क्लॉट’ से प्रेरित है. लेकिन फिल्म के निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा की मां शांति देवी चोपड़ा भी एक कश्मीरी पंडित ही थीं और शिकारा की नायिका का नाम भी शांति ही है. ऐसे में यह गले उतार पाना मुश्किल लगता है कि इतनी व्यक्तिगत त्रासदी होने के बाद भी उनके जैसा फिल्मकार यह नहीं समझ सका कि कश्मीरी पंडितों का किस्सा सिर्फ उन्हें कश्मीर से निकाले जाने तक सीमित नहीं है. इसके चलते, फर्स्ट हाफ में क्लासिक लग रही ‘शिकारा’ सेकंड हाफ में कामचलाऊ हो जाती है.

कुल मिलाकर ‘शिकारा’ कश्मीर की पृष्ठभूमि वाली एक ठीक-ठीक प्रेम कहानी तो बन जाती है लेकिन जो बन सकती थी वह बनने से चूक जाती है. वह कश्मीरी पंडितों की त्रासदी का ईमानदार दस्तावेज नहीं बन पाती है. और, ऐसे में धर परिवार का सह दावा सही लगता है कि ‘पहले राजनीति ने हमारा भरपूर फायदा उठाया और अब शायद सिनेमा भी ऐसा ही करने का इरादा रखता है.’