महाराष्ट्र की सरकार ने भीमा-कोरेगांव हिंसा का मामला राज्य की पुलिस से लेकर राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को सौंपने का अदालत में विरोध किया है. इसके बाद पुणे की एक स्थानीय अदालत ने इस मामले की जांच एनआईए को सौंपे जाने पर अपना फैसला 14 फरवरी तक के लिए सुरक्षित रख लिया है.

केंद्र सरकार के भीमा कोरेगांव मामले की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को सौंपे जाने के बाद एनआईए ने पुणे सेशंस अदालत में सभी रिकॉर्ड्स और कार्यवाहियों को मुंबई की एक विशेष एनआईए अदालत को हस्तांतरित करने की मांग की थी. जिसका महाराष्ट्र की राज्य सरकार ने विरोध किया. महाराष्ट्र पुलिस ने भी भीमा-कोरेगांव मामले के दस्तावेज एनआईए को सौंपने से इनकार कर दिया था.

महाराष्ट्र के राज्य गृहमंत्री अनिल देशमुख ने कहा कि उन्हें भीमा-कोरेगांव मामले की जांच एनआईए को सौंपने की बात मीडिया से पता चली है. उन्होंने कहा कि इस बारे में केंद्र सरकार की ओर से कोई औपचारिक बातचीत नहीं की गई है. महाराष्ट्र के गृहमंत्री ने यह भी कहा कि जब तक उनकी केंद्र सरकार से इस पर कोई आधिकारिक बात नहीं होती तब तक राज्य की पुलिस एनआईए के साथ सहयोग नहीं करेगी. गृहमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार ने इसपर कानूनी राय मांगी है जिसके बाद ही कोई फैसला होगा.

एक जनवरी 2018 को पुणे के पास भीमा-कोरेगांव लड़ाई की 200वीं वर्षगांठ पर एक समारोह आयोजित किया गया था, जहां हिंसा होने से एक व्यक्ति की मौत हो गई थी. भीमा-कोरेगांव के विजय स्तंभ में कार्यक्रम चल रहा था. अचानक भीमा-कोरेगांव में विजय स्तंभ पर जाने वाली गाड़ियों पर किसी ने हमला बोल दिया. इसी घटना के बाद दलित संगठनों ने दो दिनों तक मुंबई समेत नासिक, पुणे, ठाणे, अहमदनगर, औरंगाबाद, सोलापुर सहित अन्य इलाकों में बंद बुलाया था, जिसमें तोड़फोड़ और आगजनी हुई थी. पुणे की पुलिस इस मामले में हिंसा के पीछे माओवादी कनेक्शन की जांच कर रही थी. लेकिन, महाराष्ट्र में शिवसेना-राकांपा और कांग्रेस की सरकार बनने के बाद केंद्र ने एकाएक इसकी जांच एनआईए को सौंप दी थी. जिसका शिवसेना और राकांपा के वरिष्ठ नेता विरोध कर रहे हैं.