रूमी की यह उक्ति अगर किसी हिंदी लेखक पर मौजूं बैठती है तो वे रहे हैं कृष्ण बलदेव वैद, जिनका हाल में न्यूयार्क में देहावसान हुआ. उनसे परिचय और नज़दीकी के लगभग साठ बरस हो गये. उनसे ही मैने सबसे अधिक सीखा कि विफलता महत्वपूर्ण होती है, कई बार सफलता से कहीं अधिक. उनसे पहला परिचय तो उनकी रचनाओं से हुआ था, जिनमें उनका क्लैसिक ‘उसका बचपन’शामिल था. पर मुलाकात 1961 में हुई जब वे दिल्ली में अध्यापक थे और हमें विश्वविद्यालय में हेनरी जेम्स पर व्याख्यान देने आते थे. वे हार्वर्ड विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में पीएचडी पाने वाले पहले भारतीयों में से एक थे. उन्होंने अपने लिए एक नयी और कई अर्थों में हिंदी में अब तक अमान्य कथा भाषा रची और उनके जैसा कथा में लगातार प्रयोग करने वाला दूसरा नहीं हुआ. उनके अलावा किस और ने कभी हमें बताया कि कई बार नैतिक भी मानवीय होने में विफल हो जाता है? वैद-भाषा हिंदी में अनोखी रही है. वे हिंदी गद्य में सबसे उर्दू लेखक थे.

अन्धाकर, हिंसा, क्रूरता, विडंबना, अतिचार, अतिक्रमण आदि की मानवीय अंतर्जगत में मौजूदगी और सक्रियता की जैसी निर्मम पड़ताल वैद ने की, शायद ही किसी और ने. इस कोशिश में उन्होंने भाषा, अभिव्यक्ति, शिल्प आदि को बिलकुल ध्रुवांत तक पहुंचा दिया. भद्रता, शिष्टता आदि का लगभग भंडाफोड़ है उनका कथा-संसार. अगर उन्होंने दुनिया, समाज, समय को नहीं बख़्शा तो अपने को भी नहीं. अपने प्रति जितना निर्मम वैद रहे हैं, उतने शायद ही कोई और. यह ‘मुनासिब बेरहमी’उनका कलाधर्म थी. अगर उन्हें वह मान्यता नहीं मिली जिसके कि वे सर्वथा सुपात्र थे तो यह उनकी कोई कमी या चूक नहीं, हिंदी प्रतिष्ठान की कुंदजहनी और संकीर्णता का प्रमाण है.

वैद शब्द-क्रीड़ा के अद्भुत खिलाड़ी थे. उनके विनोद, विट ने कभी उनका साथ नहीं छोडा़. हिंदी की मूर्धन्य कथा तिकड़ी जिसमें कृष्णा सोबती, वैद और निर्मल वर्मा थे, कथाभाषा के प्रति बेहद सजग त्रयी थी. तीनों ने कथाभाषा का हिंदी में विस्तार किया, उसे सूक्ष्म बनाया और अनेक जटिल मानवीय संवेगों और अनुभवों का संवाहक बनाया. वैद में बाक़ी दो की तरह लालित्य नहीं था पर एक तरह का बीहड़ स्थापत्य था. एक तरह से वे बीहड़, बियाबान और अंधेरे में अकेले चलने का जोखिम उठानेवाले पथिक थे. उन्होंने हमारे अंधेरों की जैसी बेबाक शिनाख़्त की हैं उससे यह नतीजा निकाला जा सकता है कि उनके लिए अंधेरा ही कंदील था. बिना अंधेरों का सामना किये हम किसी उजाले तक पहुंच ही नहीं सकते.

बेहद पढ़ाकू, यारबाश, युवा असहमत लेखकों को बढ़ावा देने हमेशा उत्सुक और तैयार, बहुत उदार आतिथेय, युवा कलाकारों की कृतियां खरीदकर उन्हें सहारा देने वाले वैद के मित्रों में लेखकों के अलावा दार्शनिक, रंगकर्मी, चित्रकार, संगीतकार, नर्तक, सामाजिक बुद्धिजीवी आदि सभी शामिल थे. पर उन्होंने कभी अपने लिए न कोई रियायत चाही-मांगी, न किसी और को रियायत दी. ऐसे लेखक कम हैं जिन्होंने उनकी तरह अपने को भी रियायत कभी न दी हो. उपन्यास और कहानी के शिल्प में अकेले जितने प्रयोग उन्होंने किये उतने किसी और कथाकार ने नहीं. उन्होंने अंधेरों में रहने का जोखिम उठाकर हमारी आत्मा के कोने-अंतरे प्रकाशित किये. उन्हें कथाकार के बजाय हमारा बड़ा विडंबनाकार कहा जा सकता है.

कला-मेला

जयपुर साहित्य समारोह से लौटा कि दिल्ली में होने वाले आर्ट फ़ेयर की गतिविधियों में व्यस्त हो गया. मेरी बरसों से यह धारणा रही है कि इस समय सर्जनात्मकता सबसे प्रखर और नवाचारी रूपों में स्त्रियों द्वारा की जा रही कृतियों में प्रगट हो रही है. शाहीन बाग़ में स्त्रियां परिवर्तन का अग्रगामी दस्ता बन कर उभरी है, साहित्य और कलाओं में यह काफ़ी पहले से हो रहा है. कला-मेला के दौरान दिल्ली की अनेक वीथिकाओं में नयी प्रदर्शनियां लगती हैं. उनमें से एक इस समय किरण नाडार संग्रहालय में शुरू हुई है. उसमें सात स्त्रियों की कलाकृतियां संग्राहक रूबीना करोड़े ने बहुत जतन-समझ-कल्पनाशीलता से संग्रहीत कर प्रदर्शित की हैं. उसमें जानी-मानी कलाकार ज़रीना हाशमी, मृणालिनी मुखर्जी और जयश्री चक्रवर्ती के अलावा चार अपेक्षाकृतकम विख्यात आयशा सुलताना, प्रभावती मेप्पायिल, लाला रुख़ और सुमाक्षी सिंह शामिल हैं. सभी अमूर्तन में सक्रिय कलाकार हैं. सभी ने कला में रूढ़ हो गयी सामग्री से अलग हटकर नयी सामग्री का उपयोग किया है जिनमें काग़ज़-धागे, रस्सियां, कसीदा आदि हैं.

अमूर्तन कला में सूक्ष्मता और जटिलता दोनों की मांग करता है. उसमें रंग अकसर अपनी स्वतंत्र सत्ता पर इसरार करता है और किसी आकृति में विजड़ित होने से इनकार. अमूर्तन को देखने के लिए थोड़ा धीरज और जतन चाहिये. उसकी अर्थ-रचना में स्वयं दर्शक को शामिल होना पड़ता है. उसके अनेक अर्थ संभव हैं. वह अर्थ की संभावनाओं का परिसर है, जिसमें उसे मुक्त भाव से विचरने की छूट मिली हुई होती है. इसका यह आशय क़तई नहीं है कि अमूर्तन के मनमाने अर्थ निकाले या उस पर थोपे जा सकते हैं. उसकी अनेक अर्थों की सम्भावना मर्यादित होती है और यह मर्यादा रसिक और समझदार दर्शक पहचान लेता है. यह स्पष्ट न हो पर अराजक या अनुपस्थित नहीं होती.

अकसर हम ज़ल्दी में होते हैं. हमारे पास समय और धीरज दोनों की कमी होती है. हम चाहते हैं कि हमें फ़ौरन अर्थ मिल जाये और हम उसे जल्दी ही गह लें. हमारे पास बने-बनाये अर्थों की एक संपदा होती है और हम उसी में एक निकालकर अपनी अधीरता में उसे थोप कर यह संतोष पाना चाहते हैं कि हमने कृति को समझ लिया. यह कलानुभव नहीं कहा जा सकता. सच्चा कलानुभव आपकी संपदा में कुछ जोड़ता है और ऐसा कुछ जो पहले उसमें नहीं था. अमूर्तन, अगर धीरज-जतन में देखा-समझा न जाये तो, वह कोरे दिमाग़ को कोरा ही रहने देता है- उस पर कुछ आंक नहीं पाता.

कला मेले में लोग जाते बड़ी संख्या में हैं और अकसर कुछ तकलीफ़ उठाकर. फिर भी, वे उसमें एक वीथिका से दूसरी में जिस तेज़ी से जाते हैं उसे देखना कम, टहलना ज़्यादा कहा जा सकता है. वहां सब कुछ ठहर-ठिठक कर देखने के योग्य नहीं होता पर जो होता है उसे भी लोग अनदेखा करते हैं, मेले में जाते हैं जो संयोगवश कला का भी है.

95 के कृष्ण खन्ना

उनके इधर के काम को देखें, या उनके साथ बैठकर उनकी बातें सुनें, या उनसे यीट्स या किसी अल्पज्ञात अमरीकी कवि कोनरैड एकन की कोई कविता सुनें तो कहीं भी यह नहीं लगता कि उनकी उमर 95 वर्ष की हो रही है. उनकी ज़िन्दा दिली, उनका विनोदभाव, उनका अपने आसपास हो रहे का आकलन कहीं से थका-ऊबा या शिथिल नहीं लगता. वे 70 से अधिक बरस आधुनिक भारतीय कला के एक प्रमुख कलाकार और कला-संवर्द्धक रहे हैं. तबके भारत और अबके पाकिस्तान के फ़ैसलबाद में जन्मे-बढ़े कृष्ण खन्ना 1948 में, बंटवारे के बाद, भारत आ गये थे. उन्होंने एक बड़े बैंक की बड़ी नौकरी कलाकार होने के लिए छोड़ दी और उन्हें उसे लेकर कभी कोई पछतावा नहीं हुआ. भारत के श्रेष्ठ कलाकार हुसेन, रज़ा, रामकुमार, तैयब मेहता, बाल छाबड़ा, बोयतोण्डे, अकबर पदमसी से लेकर स्वामीनाथन, विवान सुंदरम, मनजीत बाबा, अर्पिता सिंह, मृणालिनी मुखर्जी आदि उनके घनिष्ठ मित्र रहे हैं.

कृष्ण खन्ना ने अपने समय की मानवीय स्थिति को अपनी कला में बार-बार संबोधित किया है और बेहद उदात्त से लेकर बेहद साधारण को चित्रित किया है. उनके यहां ईसा मसीह, महात्मा गांधी से लेकर बैंडवाले और ट्रकवाले लोग सभी हैं. उनकी कला का कमाल यह है कि वह महान और सामान्य को समान शिद्दत और लगाव से देख-दिखा पाती है. उन्होंने चित्र बनाने के अलावा फ़ोटोग्राफ़ी की है और मूर्तिशिल्प भी बनाये हैं. तरह-तरह के प्रयोग करने में उनकी रुचि और सक्रियता रही है. उनका इधर का काम एक प्रदर्शनी में लगाया गया है और उसे देखना उनकी सृजन-क्षमता, जिजीविषा और कौशल पर चकित होना है.

कृष्ण का अपने मित्रों आदि से लंबा पत्राचार होता रहा है और उनके पास भारत के अनेक कला-मूर्धन्यों की स्मृतियों और प्रसंगों का एक पूरा पिटारा है जिसे वे जब-तब अनायास खोल देते हैं। उनका अपना अन्दाज़े-बयां है और वे जो कुछ भी याद करते हैं उसकी निपट मानवीय गरमाहट और महत्व हमेशा ही ताज़ातरीन लगते हैं. उनका और रज़ा का पत्राचार रज़ा फ़ाउंडेशन ने कुछ बरस पहले मूल अंग्रेज़ी में पुस्तककार छापा था और अब राजकमल से रज़ा पुस्तकमाला के अन्तर्गत ‘मेरे प्रिय’ नाम से हिन्दी में प्रकाशित है. उम्मीद है कि जल्दी ही हाल में दिवंगत अकबर पदमसी के साथ उनका पत्राचार हम पुस्तकाकार प्रकाशित कर पायेंगे.

कृष्ण खन्ना की अनेक सार्वजनिक संस्थाओं जैसे ललित कला अकादेमी, गढ़ी स्टूडियोज़, भारत भवन आदि में सक्रिय भूमिका रही है. वे युवतर पीढ़ियों के कई कलाकारों के उन्नयन में सहायक रहे हैं. इस समय वे भारतीय परिदृश्य में सबसे जेठे चित्रकार हैं जो सशक्त रूप से सक्रिय और अपनी सारी उदात्तता में बने हुए हैं. अभी भी हर रोज़ अपने गुड़गांव स्थित घर में वे रोज़ सीढ़ियां उतरकर अपने स्टूडियो में काम करते हैं. कला में अदम्य जिजीविषा का, इस समय, दूसरा नाम कृष्ण खन्ना है.