दिसंबर 2019 में उत्तर प्रदेश के कई शहरों से सीएए-एनआरसी के विरोध में उतरे प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस की हिंसा की खबरें आईं. चार जनवरी को इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा कि शहर के निवासियों ने स्थानीय पुलिस पर उन्हें साज़िश के तहत हिंसा का निशाना बनाने का आरोप लगाया. इसी तरह की खबरें कुछ दूसरे राष्ट्रीय अख़बारों में भी दिखीं.

22 जनवरी को देश के कई प्रमुख विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियों की एक मिली-जुली टीम ने दिल्ली में एक प्रेस वार्ता की. इसमें उसने बताया कि 20 दिसंबर को उत्तर प्रदेश के लगभग 15 शहरों में पुलिस ने मुस्लिम आबादी को सीधे निशाना बनाते हुए हिंसा की. इस हिंसा में करीब 23 जानें गईं. मरने वालों में सात लोग फ़िरोज़ाबाद से थे. विद्यार्थियों की फैक्ट फ़ाइंडिंग टीम का आरोप था कि पुलिस का यह व्यवहार प्रदर्शनकारियों के उग्र होने के खिलाफ नहीं था, बल्कि प्रदर्शनों की आड़ में बीजेपी-आरएसएस के समर्थकों ने मुस्लिम बस्तियों पर हिंसा की.

19 दिसंबर को वामपंथी पार्टियों की तरफ से देश भर में एनआरसी-सीएए के खिलाफ बंद का आह्वान था. इस वजह से उत्तर प्रदेश में धारा 144 लागू कर दी गई थी. विरोध प्रदर्शन के दौरान कई शहरों में हिंसा हुई और राज्य की संपत्ति को नुक़सान पहुंचाया गया. इसी तारीख़ को प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को यह कहते सुना गया कि उपद्रवियों से बदला लिया जाएगा. अगले दिन 20 तारीख़ को शुक्रवार की नमाज़ के समय से प्रदेश के कई शहरों में कथित तौर पर पुलिस की मौजूदगी में हिंसा की घटनाएं हुईं.

पुलिस का आरोप था कि भीड़ के पास बंदूक और तमंचे थे और उसके हिंसक हो जाने के कारण उसे आंसू गैस और गोलियां दागनी पड़ीं. जबकि शहर के निवासियों के पास बिलकुल दूसरी ही कहानी थी. उनके पास अपनी इस कहानी के पक्ष में वीडियो और तस्वीरों जैसे सबूत थे जबकि पुलिस ने गिरफ्तार किए गए लोगों के खिलाफ लिखी गई एफ़आइआर की कॉपी भी साझा करने से इनकार कर दिया. सत्याग्रह ने कुछ समय पहले फ़िरोज़ाबाद में जाकर सच्चाई जानने की कोशिश की.

फ़िरोज़ाबाद के मोहम्मद गंज इलाके के आज़ाद लकड़ी के व्यापारी हैं. पुलिस की मौजूदगी में उनके लकड़ी के गोदाम में तोड़-फोड़ और आगज़नी के कथित वीडियोज़ न सिर्फ शहर में और सोशल मीडिया पर बल्कि राष्ट्रीय मीडिया में भी देखे गए. लेकिन वे बताते हैं कि सबूत होने के बाद भी पुलिस या प्रशासन ने उनकी कोई मदद नहीं की बल्कि उनके 19 साल के भतीजे को उपद्रव का आरोपित बनाकर गिरफ़्तार कर लिया. वीडियो और आज़ाद के मुताबिक़, 20 दिसंबर को पौने दो बजे की नमाज़ खत्म होने से पहले ही सड़क पर शोर और पथराव शुरू हो गया था. “मैं अपने भतीजे के साथ गोदाम के अपने ऑफिस में था. कुछ महिलाएं लकड़ी लेने आई हुई थीं, मुझे उन्हें सुरक्षित निकालने की फ़िक्र थी. उनके जाने के बाद में दफ़्तर के कमरे में ही रहा. सीसीटीवी कैमरे पर पुलिस नज़र आ रही थी, तो मैं निश्चिंत था कि कुछ देर में सब संभाल लिया जाएगा.”

वे आगे बताते हैं कि ऐसा नहीं हुआ. मॉनिटर पर उन्होंने देखा कि पुलिस वाले कुछ लोगों को हाथ से इशारा करके बुला रहे हैं. आज़ाद के मुताबिक इसके बाद पास ही काम करने वाला एक लड़का, कुछ और लड़कों के साथ गोदाम के सामने खड़ी मोटरसाइकिल को तोड़ने की कोशिश करने लगा. “कुछ देर बाद जब वे मोटरसाइकिल को गोदाम की तरफ लाए तो मैं समझ गया कि वो क्या करने वाले थे. उन्होंने लकड़ियों में आग लगा दी. और जब देखा कि गोदाम में सीसीटीवी कैमरे लगे हुए हैं तो उन्होंने कैमरे भी तोड़ डाले. डीवीआर, जिसमें कैमरों की रिकॉर्डिंग होती है, उसे निकालने के लिए उन्होंने मेरे दफ़्तर का दरवाज़ा तोड़ा. मैंने फ़राज़ को बाथरूम में छुपा दिया और खुद फ्रिज के पीछे जा छुपा.” वे बताते हैं कि डीवीआर निकालने वालों ने उन्हें देख लिया और पीटते हुए बाहर ले जाने लगे. बाहर किसी ने ये भी कहा कि इसे भी लकड़ियों में डाल कर जला दो. इसी तरह वे फ़राज़ को भी मारते हुए बाहर ले आए. आज़ाद किसी तरह लकड़ियों पर चढ़कर भाग निकले लेकिन फ़राज़ वहीं रह गया.

आजाद के ऑफिस की एक तस्वीर

फिलहाल फ़राज़ को 20 दिसंबर के उपद्रव का मुख्य आरोपित बनाकर, 14 धाराओं में उसके ख़िलाफ़ एफ़आईआर दायर की गई है. एफ़आईआर के मुताबिक़ फ़राज़ को नालबंद चौकी के सामने से गिरफ़्तार किया गया. जबकि गोदाम के पड़ोस के घरों से शूट किए गए वीडियोज़ में फ़राज़ को गोदाम से ले जाते हुए देखा जा सकता है.

पुलिस की एफ़आईआर के मुताबिक़ फ़राज़ के पास से देसी तमंचे और कारतूस बरामद हुए हैं. आज़ाद का कहना है कि उसके पास दो लाख रुपए का चेक था जिसे वह क्लाइंट से लेकर लौटा था. इस चेक, एटीएम और उसकी घड़ी का रिकॉर्ड पुलिस थाने में उन सामानों में दर्ज़ है जो फ़राज़ की गिरफ़्तारी के बाद उनके परिवार को लौटाया गया.

आज़ाद हमें अपने गोदाम के पड़ोस का एक घर दिखाते हैं फिर उसी घर की एक तस्वीर दिखाते हैं जिसमें एक लड़के को टिन शेड पर चढ़कर सीसीटीवी कैमरा तोड़ते हुए देखा जा सकता है. वे बताते हैं कि यह तस्वीर पुलिस ने खुद जारी की. मगर क्योंकि वह लड़का हिंदू है और इसने पुलिस का साथ दिया था, इसलिए बाद में वांछितों की तस्वीरों में से इसे हटा लिया गया. पास ही काम करने वाला यह लड़का इस समय आस-पास नज़र नहीं आ रहा है.

अपने घर के बाहर चस्पा कुर्की के नोटिस के साथ आज़ाद के भाई अखलाक़

फ़राज़ के साथ जिस दूसरे व्यक्ति को इस एफ़आईआर में मुख्य आरोपित बनाया गया है, उनका नाम अहमद नबी है. अहमद की उम्र 50 साल से अधिक है, और वे एक कैंसर रोगी हैं. अहमद के भाई क़मर नबी बताते हैं कि वे अपनी दुकान से घर लौटते वक्त अपनी दवाइयां ख़रीदने के लिए रुके थे तभी उन्हें पुलिस ने पीटना शुरू कर दिया. मौक़े पर ही उनके हाथ और पैरों की हड्डियां टूट गईं. “कुछ समय पहले कैंसर के कारण उनके जबड़े की सर्जरी हुई थी. इसमें उनके पैर की हड्डी का एक हिस्सा इस्तेमाल हुआ था जिसके चलते उन्हें यूं भी चलने-फिरने में परेशानी होती थी” क़मर बताते हैं.

वे कहते हैं, “मेरा भाई चिल्लाता रह गया कि वो मरीज़ है, मगर किसी ने नहीं सुना. उसे इतना दर्द झेलना पड़ रहा है जितना ऑपरेशन की वजह से भी नहीं हुआ. जब हम थाने में उनसे मिले, हमसे देखा नहीं गया. उनके कपड़े खून से भरे हुए थे, हड्डियां टूटी हुई थीं. दूसरे दिन जाकर हमें उनसे मिलने दिया, और तब तक भी उन्हें किसी तरह की कोई फ़र्स्ट एड नहीं दी गई थी.”

अख़बारों में अहमद के कैंसर पेशेंट होने और उनके साथ हुई हिंसा का ज़िक्र छपने के बाद उन्हें आगरा के एसएन मेडिकल कॉलेज ले जाकर उनकी टूटी हुई हड्डियों का इलाज कराया गया. अहमद नबी के भाई के मुताबिक़ जनवरी में उनकी कीमोथैरेपी होनी थी जो कि उनके जेल में होने की वजह से नहीं हो सकी है. इसके अलावा अभी तक उन्हें बेल भी नहीं दी गई है. उन पर भी तमंचा रखने और भीड़ को हिंसा के लिए उकसाने के आरोप हैं.

अहमद के दूसरे भाई वकील नबी बताते हैं कि मीडिया कवरेज की वजह से उनके भाई को तो फिर भी इलाज मिल गया मगर बाकी गिरफ्तार लोगों को वह भी नहीं मिला है. वे बताते हैं, “शुरुआत में हमें बताया नहीं जा रहा था कि अहमद भाई को कहां रखा गया है. जब हम उन्हें ढूंढते हुए थाने गये तो देखा कि एक लड़के की मां भी उसे ढूंढती हुई वहां पहुंची थी. अपना नाम सुनने के बाद वो लड़का कुहनियों के बल घिसटते हुए मां से मिलने आया. उसके हाथ और पांव तोड़ दिए गए थे. इस हालत में उसे देखकर उसकी मां ने कहा था कि इससे तो अच्छा इसे गोली ही मार देते.” क़मर इस दंगे की बाबत कहते हैं कि यह सब बीजेपी के इशारे पर हुआ है. क्योंकि यह सीट समाजवादी पार्टी को मिलती रही है, इसे हथियाने के लिए बीजेपी यहां सांप्रदायिकता फैलाने की कोशिश कर रही है.

हमने उन लोगों से भी बात की जिनके परिवार में मौतें हुई हैं. अधिकतर मौतें शहर के नैनी ग्लास चौराहे के नज़दीक की बस्तियों से हुई हैं. करीब 60000 की मुसलमान आबादी वाला यहां का बीपीएल ग्राउंड इलाका, बेहद गरीब, मैला और पिछड़ा हुआ है. यहां के निवासी बताते हैं कि यहां कोई सरकारी स्कूल तक नहीं है. जिस मैदान को बीपीएल ग्राउंड कहा जाता है उसमें पानी की निकासी की कोई व्यवस्था नहीं है और इसके चलते आसपास के इलाके का गंदा पानी इसमें जमा हुआ है.

भीतर गली में घुसने पर दोनों तरफ खुली हुई नालियां और पुराने ढंग के खुले शौचालय हैं, जिनकी गंदगी खुली नालियों में जाती है. यहां के छोटे-छोटे मकानों में चूड़ी फैक्ट्रियों और बाकी जगह काम करने वाले मज़दूर रहते हैं. ये मज़दूर सुबह छह बजे नैनी ग्लास चौराहे पर आकर खड़े होते हैं जहां अलग-अलग फैक्ट्रियों, मिलों और अन्य व्यवसायों के लोग उन्हें दिन भर के काम के लिए ले जाते हैं.

20 दिसंबर को मौके पर ही मारे गए मुक़ीम (18) का किराए का घर यहीं एक गली के भीतर है. घर में उसकी मां शम्सुन, पिता और छह भाई बहन रहते हैं. मुक़ीम भाई-बहनों में सबसे बड़ा था और 10 की उम्र से ही काम कर रहा था. उसके परिवार में कोई पढ़ा-लिखा नहीं है. शम्सुन बताती हैं, “वो काम से घर लौट रहा था. जब उसने दंगा होते देखा तो वो वापस उसी तरफ भागा जहां से आ रहा था, तभी उसे गोली लगी. वहां से मेरे देवर और उनके साथ काम करने वाले लोग उसे अस्पताल लेकर गए.”

शम्सुन के मुताबिक़ आगरा में इलाज़ से इन्कार कर दिया गया जिसके बाद उसे दिल्ली ले जाया गया. यहां 23 तारीख़ को उसने दम तोड़ दिया. उन्हें अब तक मुकीम की पोस्टमार्टम रिपोर्ट नहीं दी गई है. हमें शम्सुन के घर तक ले जाने वाले एक समाजसेवी कहते हैं कि पुलिस ने सभी गोलियां कमर के ऊपर मारी हैं. जिन्हें गोलियां लगीं स्थानीय अस्पतालों में उनका इलाज़ करने से भी मना कर दिया गया.

हाइवे के दूसरी तरफ रहने वाले अबरार (26) के साथ भी लगभग यही हुआ. उसके पिता बताते हैं कि जब वो काम से लौटा तो डाक बंगले के पास उसे गोली लग गई. “गोली लगने के बाद वो वहीं पड़ा रहा. किसी ने उसके मोबाइल से फ़ोन कर हमें बताया कि क्या हुआ. जब हम उसे लेने गए तो वहां कई ऐसे लोग ऐसे लोग पड़े थे जिन्हें गोली लगी थी. हमने एंबुलेंस को बुलाया मगर कोई जवाब नहीं मिला. फिर हम बाइक से उसे टूंडला में एफएएच अस्पताल ले गए.” वे बताते हैं कि यहां से उसे आगरा रेफ़र कर दिया गया. वहां भी कोई इलाज नहीं मिला तो हम उसे जीजी अस्पताल ले गए. यहां उसका इलाज तो हुआ मगर उसके भीतर से गोली नहीं निकाली गई. हम उसे दूसरे अस्पताल ले गए वहां भी इलाज नहीं हुआ. फिर उसे दिल्ली के सफ़दरजंग, एम्स हर जगह ले गए. मगर कहीं इलाज नहीं हुआ. वे कहते हैं, “आखिर में अपोलो में उसका इलाज हुआ मगर यहां भी गोली नहीं निकाली गई.” आखिर में 12 जनवरी को सैप्टीसीमिया के कारण उसकी मौत हो गई.

कश्मीरी गेट, क़ादरी मस्जिद के राशिद (26) के बारे में भी अख़बारों में लिखा गया. राशिद एक हाथ से विकलांग था और चूड़ी फ़ैक्ट्री में पानी पिलाने का काम करता था. काम से लौटते वक्त उसे गोली लगी. जब वो वक्त पर नहीं लौटा तो उसका परिवार परेशान हुआ. शाम 7:30 के लगभग उन्होंने सुना कि एक हाथ से विकलांग एक लड़का गोली लगने से मारा गया है. उसके पिता नूर मोहम्मद कहते हैं, “हमें वो डाक बंगले के पास मरा हुआ मिला. उसके सर में गोली लगी थी, जो आगे से जाकर पीछे पार हो गई थी. पोस्टमॉर्टम में ये कह रहे हैं कि पत्थर से चोट लगी है. कोई मुझे ऐसे पत्थर से मार कर दिखाए जो आगे से घुसकर पीछे से पार निकल जाए.”

नूर मोहम्मद बताते हैं कि पुलिस ने एक घंटे के भीतर उन पर अंतिम क्रिया करने के लिए दबाव बनाया. कहा गया कि कम से कम लोगों के साथ मिलकर तुरंत उसे दफ़ना दिया जाए. अगर तुरंत ऐसा न किया गया और सुबह लाश को पुलिस से लिया गया तो उन्हें उसे शहर के बाहर दफ़नाना होगा. राशिद के पिता ने इस हत्या पर पुलिस के खिलाफ ऑनलाइन एफ़आइआर दर्ज की है. वे बताते हैं कि घटना के बाद पुलिस कई बार उनके घर आई है, उन पर दबाव बनाया जा रहा है कि वे स्वीकार कर लें कि उनके बेटे की मौत गोली से नहीं बल्कि पत्थर लगने से हुई है. राशिद शादी-शुदा था और उसकी एक पांच साल की बेटी भी है.

नैनी ग्लास चौराहे के नज़दीक ही रहमत नगर के अरमान (24) की भी गोली लगने से मौक़े पर ही मौत हो गई. उसके पिता बताते हैं कि पुलिस का कहना है कि उसके किसी दुश्मन ने उस पर गोली चलाई होगी. वे बताते हैं, “हत्या की रात डीएम ने खुद हमें फ़ोन कर पोस्टमॉर्टम कराने को कहा, उन्होंने गाड़ी भी भेजी. रात के दो बजे हमें बॉडी दी गई और कहा गया कि बिना शोर मचाए हम उसे दफ़ना दें.” उन्होंने रसूलपुर थाने में इस हत्या की रिपोर्ट दर्ज़ कराई है.

हम मोहम्मद गंज के नबी जान (20) के पिता से भी मिलते हैं. नबी की मां बीमार हैं और पिता अयूब सदमे में हैं. वे भी यही बताते हैं कि काम के बाद घर लौटते हुए उनके बेटे को गोली लग गई. नबी आज़ाद के पड़ोसी थे. आज़ाद की मां बताती है कि चार भाइयों में सबसे शरीफ़ और मेहनती नबी, पूरे मुहल्ले का प्यारा था. “उनका हीरा बेटा चुनकर ले लिया गया है.” नबी का एक भाई विकलांग है, एक स्कूल जाता है और सबसे बड़ा अपने परिवार के साथ रहता है.

इस बाबत हमने एसओ रसूलपुर, फ़तेहबहादुर सिंह भदौरिया से बात की. हालांकि वे घटना के बाद छह जनवरी को ही इस थाने के प्रभारी बनाए गए हैं. वे कहते हैं कि पुलिस ने गोली नहीं चलाई बल्कि नैनी ग्लास के पास पांच लोगों को असलाह और कारतूस के साथ गिरफ्तार किया गया. बाकी जगहों से छह और भी लोगों को इसी तरह असलाह के साथ गिरफ़्तार किया गया. वे कहते हैं कि हमारे लोगों को चोटें लगीं हैं. मारे गए लोगों के बारे में उनका कहना है कि वे आपस में लड़कर मारे गए.

पुलिस के संरक्षण में हिंदू नागरिकों के मुसलमान बस्तियों में हिंसा करने के सवाल पर वे कहते हैं ऐसा कुछ नहीं हुआ. इसी तरह वीडियो का ज़िक्र करने पर वे बात बदल जाते हैं. वे कहते हैं कि नालबंद थाने में भीड़ ने आग लगा दी. हालांकि स्थानीय निवासियों का कहना है कि यह आग खुद पुलिस ने लगाई ताकि लोगों को फंसाया जा सके.

कुल मिलाकर पुलिस की कहानी लोगों की कहानी के बिलकुल उलटी नज़र आती है. जब एसएचओ भदौरिया से घटना के बाद पुलिस द्वारा लिखी गई एफ़आईआर की कॉपी मांगी जाती है, तो वे आला अधिकारियों से मिलने की बात कहकर अपनी असमर्थता जता देते हैं. रिपोर्ट लिखे जाने तक किसी भी मृतक के परिवार को कोई सरकारी सहायता या मुआवज़ा नहीं मिला है, न ही किसी भी अभियुक्त को बेल दी गई है.