एक अहम फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सरकारी नौकरियों में नियुक्तियों और प्रमोशन के लिए आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है. शीर्ष अदालत ने कहा कि सार्वजनिक सेवाओं में कुछ समुदायों के प्रतिनिधित्व में असंतुलन दिखाए बिना राज्यों को आरक्षण देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता. सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक आरक्षण देने या न देने का फैसला पूरी तरह से राज्यों के विवेक का विषय है. सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उत्तराखंड से जुड़े एक मामले में आया. उसने उत्तराखंड हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए ये व्यवस्था दी है.

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद आरक्षण को लेकर राजनीति एक बार फिर गरमा गई है. इस मुद्दे को लेकर आज लोकसभा में काफी हंगामा हुआ. सत्ताधारी भाजपा ने कहा कि यह सुप्रीम कोर्ट का फैसला है. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का कहना था कि सरकार का इसमें कोई हाथ नहीं है और जल्द ही इस बारे में बयान जारी किया जाएगा. उन्होंने कांग्रेस को भी कटघरे में खड़ा किया. राजनाथ सिंह ने कहा कि जब 2012 में उत्तराखंड में सरकारी पदों को अनूसूचित जाति और जनजाति को आरक्षण दिए बिना भरा गया तो राज्य में उसकी ही सरकार थी. उधर, विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि भाजपा और उसका पितृसंगठन बुनियादी रूप से आरक्षण के खिलाफ हैं. शोर-शराबे के चलते लोकसभा की कार्यवाही भी रोकनी पड़ी.

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर भाजपा के सहयोगी दलों ने भी असहमति जताई है. एलजेपी ने केंद्र सरकार से अपील की है कि वह अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के अलावा अनुसूचित जाति और जनजाति को दशकों से मिलते आ रहे आरक्षण के लाभों को इसी तरह से जारी रखने को सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाए.