करीब छह महीने तक अलग-अलग जगहों पर बंद रहने के बाद कश्मीर के मुख्यधारा के नेताओं को एक-एक करके अब रिहा किया जा रहा है. इन लोगों को पिछले साल अगस्त में अनुच्छेद 370 हटाये जाने से एक दिन पहले नज़रबंद कर दिया गया था.

लेकिन यहां के छह दिग्गज नेताओं पर, जिनमें दो पूर्व मुख्यमंत्री भी शामिल हैं, कुछ दिन पहले पब्लिक सेफ़्टी एक्ट (पीएसए) लगाकर उनके बाहर आने की संभावनाएं घटा दी गयी हैं. इन लोगों में उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ़्ती के अलावा नेशनल कॉन्फ्रेंस के दिग्गज नेता, अली मुहम्मद सागर और मुफ़्ती के मामा और जम्मू-कश्मीर विधानसभा के अध्यक्ष रहे, सरताज मदनी भी शामिल हैं.

जहां देश भर में अलग-अलग विपक्षी दलों के राजनेताओं ने भारत सरकार के इस कदम की निंदा की है, वहीं कश्मीर में इस पर लोगों की राय बटी हुई है. कुछ लोग इन नेताओं के बाहर न आ पाने से काफी निराश हैं तो कुछ “जैसे को तैसा” वाला भाव रखते हुए इससे खुश भी हैं. लेकिन इसके बारे में और तफसील से जानने से पहले यह जान लेते हैं कि पब्लिक सेफ़्टी एक्ट (पीएसए) है क्या?

इस कानून को जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और उमर अब्दुल्ला के दादा, शेख मुहम्मद अब्दुल्ला ने कश्मीर में लागू किया था. इस कानून को असल में लकड़ी की तस्करी करने वाले लोगों के लिए बनाया गया था और इसके अंतर्गत किसी भी व्यक्ति को दो साल तक बिना किसी मुक़दमे के जेल में रखा जा सकता है.

1978 में बना यह कानून कश्मीर में लगातार लागू होता रहा है. पिछले कई सालों से इसको पथरबाजी में पकड़े जाने वाले लोगों, मिलिटेंसी से जुड़े लोगों और अलगाववादियों को जेल में रखने के लिए भी इस्तेमाल किया जा रहा है.

उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ़्ती के इस कानून के अंतर्गत बंद होने को इसलिए कुछ लोग ‘जैसे को तैसा’ मानते हैं क्योंकि इन दोनों के शासन में हजारों लोग इस कानून के अंतर्गत बंद किए गए. इनमें से कई लोग अभी भी सलाखों के पीछे ही हैं.

सत्याग्रह ने बीते हफ्ते कश्मीर में दर्जनों लोगों से बात की जिनमें से ऐसे लोग कम नहीं थे जो उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ़्ती के पब्लिक सेफ़्टी एक्ट (पीएसए) में बंद होने पर खुश हैं. ये जो बताते हैं उससे समझ में आता है कि ऐसा क्यों है. सबसे पहले बात 32 साल के ज़ुबैर हसन (बदला हुआ नाम) की.

जुबैर हसन को अभी तक कई बार पीएसए के अंतर्गत बंद किया गया है और वे इसके चलते कई-कई महीने तक जेल में बंद रहे हैं. ऐसे ही एक समय उनके यहां एक बेटी हुई थी और और चल बसी थी.

“जब वो पैदा हुई थी मैं तब भी बंद था और जब वो गुज़र गयी में तब भी बंद था. में उसका चेहरा भी नहीं देख पाया था. ये सब उमर के राज में हुआ था” हसन सत्याग्रह को बताते हैं.

जुबैर हसन कहते हैं वे खुश इसलिए हैं क्योंकि जिन लोगों को खुश करने के लिए उमर और महबूबा कश्मीरी लोगों को जेलों में बंद करते थे अब उन्हीं लोगों ने इनको ही बंद कर दिया है. “ये तो वो वाली बात हो गयी न कि जैसा बोओगे वैसा ही काटोगे” हसन कहते हैं, “में उमर और महबूबा के साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ भी प्रदर्शन करता लेकिन इन्हीं लोगों ने मुझे ऐसा न करना सिखाया है. तो रहें जेल में, मेरी बला से.”

उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती जैसे नेताओं पर पीएसए लगने और उनके अंदर ही रहने से कुछ लोग इसलिए भी खुश हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे उनकी बात सही साबित होती है. “हम तो हमेशा से यही कहते थे कि भारत सरकार कभी हमारी दोस्त नहीं हो सकती है. लेकिन ये लोग कश्मीर में भारत सरकार के ठेकेदार बने फिरते थे. अब जब ये सारे बंद हैं तो हम क्यूं शोक मनाएं” हाल-फिलहाल में ही जेल से छूटे एक अलगाववादी कार्यकर्ता ने सत्याग्रह से बात करते हुए कहा.

वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जो कहते हैं कि नजरबंद नेता अपने “नाखूनों को कटाकर, शहीदों में अपना नाम लिखवाना’ चाह रहे हैं.” इनमें से कुछ लोग ऐसे भी हैं जो इसे कश्मीर में नजरबंद नेताओं और भारत सरकार के बीच एक सोची-समझी साजिश के रूप में देखते हैं. इनका कहना है हैं कि यह इन दोनों की मिलीभगत है.

कश्मीर मुद्दे पर दिल्ली के एक विश्वविध्यालय में अनुसंधान कर रहे बशारत अली कहते हैं कि यह बिलकुल मुमकिन है इन लोगों को सोच-समझ के पीएसए के अंतर्गत बंद किया गया हो, “इनको शहीदों का दर्जा देने के लिए.”

“हमने देखा है कि जो नेता अभी तक बरी हुए हैं उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया है अभी तक जिसकी वजह से भारत सरकार उमर और महबूबा पर पीएसए लगाने पर मजबूर हो जाती” अली कहते हैं कि इसकी साफ सी वजह यह समझ में आती है कि इन लोगों को कल बाहर निकलकर लोगों को अपना मुंह दिखाना है और यह सब उसी की तैयारी हो रही है.

“हमें इस बात को लेकर खुश नहीं होना चाहिए कि इन नेताओं को सज़ा मिल रही है. इन सब ने कश्मीर के लोगों को छला है और सज़ा भी इनको कश्मीर के लोगों द्वारा मिलनी चाहिए, भारत सरकार के द्वारा नहीं” अली कहते हैं.

अली की ही तरह श्रीनगर में काम कर रहे एक वरिष्ठ पत्रकार इस सब को एक ड्रामे के रूप में देखते हैं. “हमेशा भारत के गुण गाने वाले ये लोग कल को लोगों के पास क्या मुंह लेके जाएंगे. इन्होंने ये माहौल बना रखा था कि 370 हट गया तो ये भारत के खिलाफ जंग छेड़ देंगे. अब जंग तो छेड़ नहीं सकते, वोट ही मांगने जाना है सो उसी बात की तैयारी हो रही है” ये पत्रकार सत्याग्रह से बात करते हुए कहते हैं.

अब बात उन लोगों की जो मानते हैं कि हमें कश्मीरी नेताओं के हिरासत में होने पर खुश नहीं होना चाहिए और न ही इन लोगों को ऐसी शक की निगाहों से देखना चाहिए:

इन लोगों का मानना है कि कश्मीर के लोगों को इस बात की बिलकुल खुशी नहीं मनानी चाहिए क्यूंकि, “हम सब पीड़ित हैं और ये लोग भी हम सब में से ही हैं.” “ऐसा कैसे हो सकता है कि एक पीड़ित दूसरे पीड़ित की मुश्किलों की खिल्ली उड़ाए” श्रीनगर के एक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक टिप्पणीकार, वसीम खालिद, अपने एक लेख में लिखते हैं.

खालिद लिखते हैं कि इन लोगों ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि जिन लोगों के लिए इन्होंने अपने ही लोगों को दुख और तकलीफ दिये, वही इनके साथ ऐसा करेंगे. “लेकिन हमें हमेशा लोगों को सुधरने का मौका देना चाहिए और छोटी-छोटी चीजों से ऊपर उठकर बड़ी चीजों का खयाल करना चाहिए.”

कुछ और लोग जिनसे सत्याग्रह ने इस बारे में बात की तो उनका भी यही मानना था कि अब जब इन लोगों को सबक मिल गया है तो हो सकता है कि इनका हृदय परिवर्तन हो और अब ये कश्मीर के लोगों के बारे में सोचें. ये लोग कहते हैं कि सुबह का भूला अगर शाम को घर लौट आए तो उसको भूला नहीं कहते.

“जब तक ये लोग बंद हैं तब तक हमें कैसे पता चलेगा ये क्या सोचते हैं. हमें धैर्य रखना होगा और देखना होगा कि अब ये लोग क्या करते हैं” श्रीनगर के एक वकील सत्याग्रह से बात करते हुए कहते हैं.

फिलहाल लोग जो भी सोचते हों लेकिन राजनीति को लेकर लोगों की याददाश्त उतनी लंबी भी नहीं होती है. ऐसे में उमर और महबूबा जैसे लोगों के आगे के राजनीतिक व्यवहार पर ही निर्भर करता है कि उनके बारे में उनके बाहर आने पर लोग क्या सोचेंगे.