20 दिसंबर 2019 को उत्तर प्रदेश में सीएए-एनआरसी के प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की हिंसा और गिरफ्तारियों के बाद कुछ विश्वविद्यालयों के छात्र-छात्राओं ने मिलकर कई फैक्ट-फाइंडिंग टीम बनाई थी. इस टीम ने शहर-शहर जाकर पीड़ितों से बातचीत की और सच पता करने की कोशिश की. इन प्रदर्शनों के दौरान कुल 23 मौतें हुई थीं और इन मरने वालों में से कुछ विवाहित भी थे, जिनमें से चार की पत्नियां मां बनने वाली थीं.

इनके सामने अगला सवाल था कि अब क्या किया जाए. हिंसा की कहानियां इतनी मार्मिक थीं कि उन्हें सुनने के बाद वापस आम ज़िंदगी में लौट जाना आसान नहीं था. तय किया गया कि हम उत्तर प्रदेश जाएंगे, लोगों से मिलेंगे और उन्हें बताएंगे कि हमें हिंदू-मुसलमान में बंटने से बचना होगा. इस तरह नागरिक सत्याग्रह पदयात्रा का विचार बना. जब मुझे इस यात्रा के बारे में पता चला तो मैंने भी इसमें शामिल होने का निर्णय कर लिया.

पहली फरवरी को मैं दिल्ली से बस लेकर गोरखपुर पहुंची. यात्रा चौरी चौरा से शुरू होकर राज घाट पर खत्म होनी थी. चौरी-चौरा से इसलिए क्योंकि यही वह जगह थी जहां 1922 में यानी लगभग सौ साल पहले अंग्रेजों के खिलाफ हुई हिंसा के बाद गांधीजी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया था. उस दिन ऐसे आज़ाद हिंदुस्तान की तासीर तय हो गई थी जहां हिंसा के लिए कोई जगह नहीं थी, फिर चाहे हिंसा करने वाला हमारा शोषक, हमारा दुश्मन ही क्यों न हो. उन दिनों बहस यह भी चली कि अगर वह आंदोलन वापस न लिया जाता तो शायद हमें आज़ादी के लिए 25 साल और इंतज़ार न करना पड़ता. लेकिन गांधीजी का कहना था कि आज जो हिंसा हम अपने शोषक पर करेंगे, कल हम एक-दूसरे पर करेंगे.

इस तरह यह यात्रा चौरी चौरा से शुरू हुई जिसका गंतव्य दिल्ली में गांधी स्मृति, राजघाट तय किया गया. यात्रा के कुछ नियम रखे गए. जैसे कि इन दिनों कोई विलासिता का जीवन नहीं जियेगा, सिर्फ शाकाहारी रहेगा और जहां-जैसी व्यवस्था होगी, वैसे रहेगा. यात्रा का एक नक्शा भी बनाया गया. पहले चरण में गोरखपुर से आज़मगढ़ और फिर मऊ गाज़ीपुर होते हुए बनारस पहुंचना तय हुआ. हम छह लोगों ने यह यात्रा शुरू की. मध्य प्रदेश से मनीष शर्मा इस यात्रा के सूत्रधार बने. हमारे साथ विकास हैं जो बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के शोध छात्र हैं, मुरारी और प्रियेश हैं जो बीएचयू में ही एमए के छात्र हैं और अक्षय हैं जो इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हैं.

पहले दिन पहुंचने में साथियों को देरी हुई तो यात्रा देर से शुरू हो सकी. हम सब चौरी चौरा रेलवे स्टेशन के नजदीक उस स्मारक पर पहुंचते हैं जहां महात्मा गांधी, चंद्रशेखर आज़ाद, सुभाष चंद्र बोस और इंदिरा गांधी के अलावा उन क्षेत्रीय ग्रामीणों की मूर्तियां हैं, जिन्हें चौरी चौरा पुलिस स्टेशन जलाने के अपराध में अंग्रेजी सरकार ने फांसी दी थी. स्मारक की हालत काफी खराब है. जिस इमारत में मूर्तियां हैं उसके नजदीक एक और नई इमारत बन रही है. लेकिन पहले से मौजूद इमारत में कोई व्यवस्था, कोई रख-रखाव नहीं है.

यात्रा के कुछ नियम रखे गए. जैसे कि इन दिनों कोई विलासिता का जीवन नहीं जियेगा, सिर्फ शाकाहारी रहेगा और जहां-जैसी व्यवस्था होगी, वैसे रहेगा.

यहां हमें कमल बाबू मिलते हैं जो कि सफाई कर्मचारी हैं. कमल बताते हैं कि उनके दादा भी उन अभियुक्तों में से एक थे जिन पर अंग्रेजी हुकूमत ने मुकदमा किया था पर उन्हें सजा नहीं मिली. इसी नाते वे यहां सफाई कर्मचारी हैं पर उन्हें नियमित वेतन नहीं मिलता. कमल को उम्मीद है कि वे एक दिन सरकारी नौकर हो जाएंगे और उन्हें समय पर वेतन मिलने लगेगा. स्मारक और स्टेशन के बीच की जमीन में खूब गंदा पानी भरा है और किनारों पर पॉलीथीन, इस्तेमाल किए हुए प्लास्टिक के कप और थर्मोकोल की तश्तरियों का कचरा पड़ा है.

कोई 15 साल के दो लड़के सामने से गुज़र रहे हैं. मैं उन्हें करीब बुलाकर उनके नाम पूछती हूं. हरिंदर का नाम तीन बार बताए जाने पर समझ आता है और दूसरे का नाम राहुल है. हरिंदर ईमानदारी से बताते हैं कि वे पढ़ते नहीं हैं, बस ऐसे ही घूमते रहते हैं. कुछ देर में दो बच्चियां हाथ पर मेहंदी लगाकर आती दिखती हैं. इनमें से एक चौथी क्लास में पढ़ती है, उसका नाम प्राची चौधरी है और वह डॉक्टर बनना चाहती है. छोटी दूसरी में हैं, उसे पुलिस बनना है क्योंकि उसे देश की रक्षा करनी है.

मैं समझना चाहती हूं कि उसका देश क्या है? लेकिन यह अभी उसे नहीं पता.

देखती हूं कि गांव की सड़क पर जो सबसे बड़ी गाड़ियां निकल रही हैं, वे राजनीतिक दलों की हैं. कुछ किलोमीटर बाद हम एक चाय की दुकान पर रुकते हैं, लोग पूछते हैं कि इस यात्रा का उद्देश्य क्या है, आपकी मांग क्या है. जब उन्हें बताया जाता है कि यह बस जागरुकता और सौहार्द बढ़ाने के लिए है तो वे हैरान रह जाते हैं. उनके चेहरे पर ख़ुशी और हैरानी एक साथ दिखती है. वे कहते हैं कि यह ज़रूरी है. एक बूढ़े बाबा कहते हैं कि यह तो बड़ी निस्वार्थ यात्रा है. शाम का सूरज पेड़ों के झुरमुट के पीछे डूब जाता है. मैं जगह-जगह चूल्हों से उठता धुआं देखती हूं. इस धुएं के धीरे-धीरे उठने में एक सुकून है. मवेशियों को चारा डाल दिया गया है, या कूटा जा रहा है.

साढ़े छह बजे अंधेरा हो चुका है. किसी नई जगह सड़क किनारे एक दुकान के बाहर बैठकर पीछे से आ रहे साथियों का इंतज़ार करना एक अनभुव है. एक के बाद एक गाड़ियां सड़क पर से गुज़र रही हैं. इक्का-दुक्का मोटरसाइकल दुकान के सामने रुक रही हैं. लोग सामान ख़रीदकर, दुआ-सलाम कर आगे बढ़ जाते हैं. मैं बैठे देख रही हूं, निस्पृह. लगता है जैसे मैं सदियों से यहीं बैठी हूं, निरुद्देश्य. अनजान जगह पर अनजान लोगों को जानी-पहचानी चीज़ करते देखना मुझे एक अबूझ जड़ता से भर देता है. न जाने क्या है जो मुझे यहां ले आया है.

रात हमने नेकवार में ठहरना था. यात्रा का पहला पड़ाव वहीं था. लेकिन वहां ठहरने का कोई पक्का इंतज़ाम नहीं हो सका. हमारे साथ गाड़ी लेकर चल रहे अजय यादव स्थानीय हैं. वे हमें अपने घर पर चलकर रहने के लिए कहते हैं. साथियों का कहना था कि नेकवार ही रुकेंगे मगर सड़क पर अब अंधेरा है, बाज़ार ख़त्म हो चुका है और किसी ने खाना भी नहीं खाया है, इसलिए अजय जी का सुझाव मान लिया जाता है.

लोग पूछते हैं कि इस यात्रा का उद्देश्य क्या है, आपकी मांग क्या है. जब उन्हें बताया जाता है कि यह बस जागरुकता और सौहार्द बढ़ाने के लिए है तो वे हैरान रह जाते हैं. उनके चेहरे पर ख़ुशी और हैरानी एक साथ दिखती है.

पास के गांव में अजय जी की ससुराल है. हम यहीं रुकने वाले हैं. साढ़े सात बजे हम घर पहुंचते हैं. गांव के बाहर ही दो घर हैं. इनमें से एक के बाहर दूध उबल रहा है. परिवार के बच्चे खाना-पीना खाकर बिस्तरों में घुस चुके हैं. हमारे लिए दोबारा चूल्हा जलाया जाता है. पड़ोस के घर से एक चाची ताज़ा बना खोया और पनीर आग्रह से खिलाती हैं. दसवीं में पढ़ने वाली बेबी दो कमरे और एक बरामदे, जिसमें एक रसोई भी है, के इस घर में छह अजनबी मेहमानों के लिए सोने-खाने की व्यवस्था में दौड़ती फिर रही है. घर में फर्नीचर के नाम पर दो तख्त और प्लास्टिक की कुछ कुर्सियां हैं. एक कमरे में अल्मूनियम का एक बड़ा बक्सा और एक-दो छोटे बक्से हैं. एक प्लास्टिक के बक्से में बच्चों की दसवीं-बारहवीं की मार्कशीट पड़ी हैं. बड़े बक्से से रज़ाई निकाली जाती है.

बेबी बताती है कि परिवार में पिछले दिनों उनके एक बुज़ुर्ग की मृत्यु हो गई थी. अभी मेहमान गए हैं, इसलिए घर बिखरा हुआ है. चाय पीते, खाना बनाते हुए बातचीत होती है. घर के लोग गांव की दुर्दशा के बारे में शिकायत करते हैं. वे बताते हैं कि ग्रामसभा बिसवां के भगवती दुबे टोला में यानी जहां हम ठहरे हैं, वहां स्कूल की ज़मीन तो पड़ी है पर स्कूल नहीं है. साथ के घर में रहने वाले लालमन यादव जानना चाहते हैं कि हम क्या कर रहे हैं. वे अपने गांव के बारे में बताना चाहते हैं, बताना चाहते हैं कि यहां कितना भ्रष्टाचार है. उनकी चाची पास में बैठी हैं, वे बताने लगती हैं कि ‘प्रधान को काम से कोई मतलब नहीं है, उसे बस पैसा खाने और नशा करने से काम है.’ वहीं लालमन बताते हैं कि ‘गांव में शौचालय बनाने के लिए पैसा आया. हमने भी अपने घर में शौचालय बनाया. बनाने में मुझे चालीस हज़ार का खर्चा आया. ग्रामसभा से मुझे बारह हज़ार मिलने थे. मगर नहीं मले. प्रधान कहता है कि बीडीओ साहब ने कहा है कि दो हज़ार उन्हें दो तो 12000 का चैक पास हो जाएगा.’

लालमन आगे कहते हैं ‘हर काम में यही हो रहा है. प्रधानमंत्री आवास योजना में ग़रीब के लिए मकान की व्यवस्था होनी थी. दो लाख मिलना होता है. लेकिन 20 हजार प्रधान को चाहिए, उतना ही बीडीओ को और फिर उतना ही बैंक वालों को. जो साठ हज़ार दे सकता है उसे मकान मिल जाता है.’ वे बताते हैं कि उनके गांव में रामबदन गुप्ता की पत्नी अकेली हैं. उनके पति की मौत हो चुकी है और तीन-चार बच्चियां हैं. उनके पास रहने की भी जगह नहीं हैं. बाहर कहीं जाकर रह रही हैं. उन्हें मकान नहीं दिया गया. लेकिन जिनके पास सरकारी नौकरियां हैं, धन-बल सब है, उन्हें वे सारी सुविधाएं मिल रही हैं जो गरीबों के लिए हैं.

भ्रष्टाचार पर लालमन यादव कहते हैं कि ‘यहां एक किलो तेल लो तो पौन किलो तोलते हैं, पांच किलो गेहूं का चार किलो तोलते हैं, खाद लो पचास किलो तो 45 किलो मिलेगी. इस गांव में नालियों की, सड़क की, एक पोखर की सख्त ज़रूरत है. मगर प्रधान कहता है कि यह सब बनाने का प्रस्ताव पास ही नही हो रहा है.’ गांव के बुद्धू यादव लगभग 80 साल के हैं. वे अपनी पत्नी के साथ अकेले रहते हैं और एक पैर से विकलांग भी हैं. उनके पास रहने के लिए बस झोपड़ी है. वे चाहते हैं कि प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत कुछ मिल जाए तो मकान थोड़ा रहने लायक बन जाए. उनका यह भी कहना है कि जब उन्होंने प्रधान से इस बारे में बात की तो वहां से जवाब मिला कि अब कोई आवास योजना नहीं आ रही है.

ये सब शिकायतें सुनते हुए मुझे पी साईनाथ, हरिशंकर परसाई और अदम गोंडवी सब एक साथ याद आ जाते हैं. बेबी की मां गुड्डी देवी सब बातों को बड़े ध्यान से सुनती हैं और कहती हैं कि हम भी मैडम जी के साथ पदयात्रा में चलेंगे. इस परिवार के पास साधन नहीं है, पर मोहब्बत है. वे छह अजनबियों को न सिर्फ अपने घर में जगह देते हैं बल्कि देर रात उस वक्त उनके लिए खाना तैयार करते हैं, जब वे सोने के लिए अपने बिस्तरों घुस चुके होते हैं. बेबी की खिलाई आलू-गोभी की तरकारी, दाल, रोटियों औऱ चावल का स्वाद भूला नहीं जा सकता है.