‘आपने तीसरी बार अपने बेटे पर भरोसा किया. ये दिल्ली के हर उस परिवार की जीत है, जिसने मुझे अपना बेटा समझकर वोट दिया… ये देश के लिए बहुत शुभ संदेश है. यही राजनीति हमारे देश को 21 वीं सदी में ले जा सकती है. ये केवल दिल्ली के लोगों की जीत नहीं है. ये हमारी भारत माता की जीत है. ये पूरे देश की जीत है. आज मंगलवार है, हनुमान जी का दिन है. हनुमान जी ने आज दिल्ली पर अपनी कृपा बरसाई है… हमारे कार्यकर्ताओं के साथ मेरे परिवार ने भी जमकर मेहनत की. आज मेरी पत्नी का जन्मदिन भी है… भारत माता की जय, वंदे मातरम, इंकलाब जिंदाबाद…’

ये लाइनें उस संबोधन का अंश हैं, जो दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी (आप) की एकतरफा जीत के बाद दिया. विश्लेषकों की मानें तो यदि इस संबोधन से कुछ शब्दों को हटा दिया जाए या उन्हें बदल दिया जाए तो इसकी विषयवस्तु कुछ वैसी ही थी जैसी कि अब तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषणों में देखने-सुनने को मिलती रही है. इस बात को वे लोग अच्छे से समझ सकते हैं जिन्होंने गुजरात में पिछले तीन विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की जीत के बाद (प्रधानमंत्री) मोदी के संबोधन सुन रखे हों.

जानकारों के मुताबिक न सिर्फ़ केजरीवाल के इस भाषण के शब्द, बल्कि पूरे दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान उनकी रणनीतियां भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके समय की भाजपा से काफी हद तक प्रभावित दिखती हैं. हालांकि एक वरिष्ठ पत्रकार तंज भरे लहजे में कहते हैं कि इसकी शुरुआत तो 2015 में दिल्ली में आप की सरकार के साथ ही हो गई थी. नाम न छापने के अनुरोध के साथ वे कहते हैं, ‘अरविंद केजरीवाल अपनी हर नाकामी के लिए बार-बार दिल्ली के उपराज्यपाल और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उसी तरह जिम्मेदार ठहराने लगे थे, जैसे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कांग्रेस या देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को ठहराते हैं. यह बात और है कि मोदी से उलट केजरीवाल के शिकायतों की पोटली बन जाने ने कई लोगों को खिजाने का काम किया.’

लेकिन बीते करीब आठ महीनों से अरविंद केजरीवाल के अंदाज में बड़ा बदलाव देखने को मिला. हर छोटी-बड़ी बात के लिए धरने पर बैठने या विरोधियों से उलझने वाले केजरीवाल ख़ुद पर होने वाले हमलों को नज़रअंदाज करने लगे. इससे भी ज़रूरी बात यह कि उन्होंने ख़ुद पर लगने वाले आरोपों को बड़ी ही चतुराई से अपने उत्पीड़न के तौर पर पेश कर लोगों की सहानुभूति हासिल करने का हुनर सीख लिया. यह ठीक वैसा ही था जैसा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अब तक करते रहे हैं.

2017 के गुजरात विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के नेता मणिशंकर अय्यर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नीच आदमी कहा था. स्पष्ट तौर पर अय्यर ने यह बात व्यक्तिगत तौर पर मोदी के लिए कही थी. लेकिन मोदी ने पहले तो इसे अपनी पिछड़ी जाति और गरीब होने से और बाद में गुजरात की अस्मिता से जोड़ दिया. अय्यर के बहाने कांग्रेस पर पलटवार करते हुए मोदी ने कहा कि ‘यह मेरा नहीं, बल्कि गुजरात का अपमान है जिसका जवाब जनता देगी.’ उस चुनाव में हार के मुहाने पर खड़ी भाजपा जीत हासिल करने में सफल रही थी. इससे पहले 2007 के गुजरात विधानसभा चुनाव में भी कुछ ऐसा ही हुआ था जब कांग्रेस की अध्‍यक्ष और यूपीए प्रमुख सोनिया गांधी ने मोदी को मौत का सौदागर बताया था. प्रधानमंत्री मोदी अब तक कई बार इस बात को अलग-अलग ढंग से भुना चुके हैं.

कुछ ऐसा ही वाकया दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले देखने को मिला जब भाजपा सांसद प्रवेश वर्मा और केंद्रीय मंत्री व भारतीय जनता पार्टी के दिल्ली चुनाव प्रभारी प्रकाश जावड़ेकर ने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को आतंकवादी करार दिया था. इस पर केजरीवाल ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में भावुकता भरे लहजे में कहा, ‘मैंने देश के लिए तन-मन-धन कुर्बान कर दिया. शिक्षा-स्वास्थ्य के लिए इंतजाम करने वाला आतंकवादी होता है? बुजुर्गों को तीर्थयात्रा पर भेजा तो क्या मैं आतंकवादी बन गया? शहीद के परिवार का ख्याल रखा, तो मैं आतंकवादी हूं? आज तक अपने और अपने परिवार के लिए कुछ नहीं सोचा… मैं डायबिटीज का मरीज हूं. लेकिन दो बार देश के भ्रष्टाचारियों के खिलाफ़ बड़े अनशन किए. मेरी जान तक जा सकती थी, देश के लिए जान तक दांव पर लगा दी...’

इस कॉन्फ्रेंस में मुख्यमंत्री केजरीवाल ने अपने बूढ़े मां-बाप और उनकी फ़िक्र का भी ज़िक्र किया. उन्होंने आगे जोड़ा, ‘मैंने पिछले पांच साल में दिल्ली वालों का बेटा बनकर उनकी जिम्मेदारी उठाई है. मैं ये निर्णय दिल्ली के लोगों पर छोड़ता हूं कि वे मुझे भाई मानते हैं या बेटा मानते हैं या फ़िर आतंकवादी.’ इस सब के बीच केजरीवाल की बेटी हर्षिता भी अपने पिता के बचाव में मैदान में उतर पड़ी थीं. विश्लेषकों के अनुसार मध्यमवर्गीय मतदाताओं की पारिवारिक संवेदनाओं को छूने से जुड़ा यह दांव कुछ वैसा ही था, जैसा कि हर चुनाव से पहले प्रधानमंत्री मोदी का मीडिया की मौजूदगी में अपनी मां हीराबेन से आशीर्वाद लेना या नोटबंदी के दौरान उनका एटीएम की कतार में खड़े होना.

इसके अलावा अरविंद केजरीवाल ने एक सोची-समझी रणनीति के तहत हालिया विवादित मुद्दों से जुड़े सवालों को या तो घुमा दिया या फ़िर उन पर कुछ वैसी ही चुप्पी साधे रखी जैसा कि अक्सर प्रधानमंत्री मोदी करते हैं. इसके उदाहरण के लिए नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) को लिया जा सकता है. इसे लेकर भाजपा ने कई बार केजरीवाल को घेरने की कोशिश की, लेकिन नाकाम रही. मीडिया ने भी जब-जब केजरीवाल समेत आप ब्रिगेड के सभी बड़े नेताओं की राय इस मुद्दे पर जाननी चाही तो उसे अक्सर बड़े नपे-तुले बयान ही सुनने को मिले. ऐसे कि जिनके आधार पर सीएए-एनआरसी पर आम आदमी पार्टी का रुख अब तक भी स्पष्ट तौर पर परिभाषित नहीं किया जा सका है.

कुछ मौकों पर अरविंद केजरीवाल ने सीएए-एनआरसी पर सवाल तो उठाए, लेकिन इस ढंग से कि भाजपा को ऐसा कोई मौका नहीं मिला कि वह आप को प्रो-मुस्लिम पार्टी साबित कर सके. बल्कि केजरीवाल ने सीएए-एनआरसी को गरीबों और दिल्ली में बिहार और उत्तर प्रदेश से आकर बसने वाले पूर्वाचलियों को नुकसान पहुंचाने वाला साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. इस बात से भी भाजपा को बड़ा नुकसान हुआ. जानकारों के अनुसार दिल्ली में पच्चीस फीसदी से ज्यादा पूर्वाचलियों को ही मुख्य तौर पर साधने के लिए भाजपा ने दिल्ली में मनोज तिवारी को अपना अध्यक्ष चुना था.

शाहीन बाग पर तो आम आदमी पार्टी का रुख और भी एक कदम आगे का रहा. एक तरफ़ आप के विधायक अमानतुल्ला खान जैसे नेता लगातार शाहीन बाग के आंदोलनकारियों के संपर्क में बने रहे थे ताकि मुसलमान पार्टी से दूर न छिटक जाएं. दूसरी तरफ़ पार्टी सार्वजनिक तौर पर सिर्फ़ विकास की लाइन पर चुनाव लड़ने की बात पर अड़ी रही. ऐसा करके उसने हिंदुओं को भी नाराज़ नहीं होने दिया. ज़रूरत पड़ने पर अरविंद केजरीवाल ने दोनों पक्षों को साधते हुए बयान दिया कि ‘प्रदर्शनकारियों को विरोध करने का अधिकार है लेकिन इसकी वजह से छात्र और एम्बुलेंस उस सड़क पर फंस जाते हैं और इसलिए रास्ते पर आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए उसे फिर से खोल दिया जाना चाहिए.’

इस दौरान एक मौका ऐसा भी आया जब दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने शाहीन बाग़ के आंदोलनकारियों को समर्थन दे दिया. लेकिन केजरीवाल समेत पार्टी के अन्य नेताओं ने इस बयान से दूरी बनाते हुए अपनी तमाम प्रतिक्रियाएं आर्थिक मुद्दों पर केंद्रित कर दीं. यह भी कुछ वैसा ही था जैसा कि एक तरफ़ गृहमंत्री अमित शाह सीएए-एनपीआर-एनआरसी को लेकर क्रोनोलॉजी समझाते रहे. और दूसरी तरफ़ इस पर विरोध बढ़ता देख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बात को सिरे से नकार दिया कि एनआरसी को लेकर सरकार में कोई चर्चा भी हुई थी!

यही नहीं, मौका मिलते ही मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने बड़े-नपे तुले शब्दों में इस पूरे घटनाक्रम का दोष केंद्र की भाजपा सरकार के ही माथे मढ़ दिया. उन्होंने कहा कि ‘अभी बिना ज़रूरत वाले सीएए-एनआरसी को भाजपा की केंद्र सरकार ही लाई थी. पुलिस भी उसी के अधिकार में है. और शाहीन बाग के आंदोलनकारियों को हटाने की भी जिम्मेदारी उसी की है जिसे वह जानबूझकर नहीं निभा रही है. अगर दिल्ली पुलिस हमारे अधिकार में होती तो दो घंटे में शाहीन बाग को खाली करा दिया जाता.’ विश्लेषकों के मुताबिक केजरीवाल इस बात को आम मतदाताओं के मन में बिठाने में काफी हद तक सफल रहे थे.

ऐसा ही कुछ जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) वाले मामले में भी हुआ. आप के राज्यसभा सांसद संजय सिंह तो जेएनयू छात्रों पर हुए हमले के बाद एम्स में घायलों से मिलने तुरंत पहुंच गए, जबकि केजरीवाल ने ऐसा नहीं किया. जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय वाले प्रकरण में भी केजरीवाल और आप की प्रतिक्रिया कुछ ऐसी ही रही थी. हालांकि आम आदमी पार्टी के इस रुख ने दिल्ली के शिक्षाविदों और संबुद्ध वर्ग के मतदाताओं को खासा निराश किया था.

इस पूरे चुनाव में केजरीवाल ने भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी की तरह ही हिंदुत्व को भी भुनाने की हरसंभव कोशिश की. ख़ुद पर भाजपा द्वारा लगाए जा रहे देश विरोधी आरोपों से जुड़े पत्रकारों के सवाल पर केजरीवाल का कहना था, ‘मैं हिंदू विरोधी कैसे हो सकता हूं, मैं तो हनुमान जी का कट्टर भक्त हूं.’ इसके बाद केजरीवाल ने एक न्यूज़ चैनल पर बाकायदा हनुमान चालीसा का पाठ भी किया था. इसका भी आम आदमी पार्टी को बड़ा फायदा मिला. इसे शाहीन बाग वाली ओखला विधानसभा सीट के नतीजे से समझा जा सकता है, जहां न सिर्फ़ मुस्लिम बल्कि कई हिंदू बहुल मतदान केंद्रों पर भी आम आदमी पार्टी को भाजपा की तुलना में ज्यादा या करीब-करीब बराबर के ही वोट मिले.

इस चुनाव में अरविंद केजरीवाल ने चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर को साथ लेकर भी बिल्कुल वही दांव खेला जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव में बेहद सफलतापूर्वक आजमाया था. केजरीवाल के बदले अंदाज में प्रशांत किशोर की अहम भूमिका मानी जा रही है. जानकारों के मुताबिक प्रशांत किशोर यह तो समझते ही हैं कि किस चुनाव में किसी नेता या राजनीतिक दल को क्या करना चाहिए, लेकिन इसके बनिस्बत वे इस बात को कहीं ज्यादा अच्छे से समझते हैं कि किस नेता को, कब, क्या नहीं करना या नहीं कहना चाहिए! शायद यही कारण था कि एक बड़बोले नेता के तौर पर अपनी छवि स्थापित कर चुके केजरीवाल इस पूरे चुनाव के दौरान बेहद संजीदगी से पेश आए.

इस सबके बावजूद एक मामले में अरविंद केजरीवाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बिल्कुल अलग रहे. वह यह कि मोदी समेत भाजपा के तमाम नेताओं से जब भी विकास और उनके चुनावी दावों के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने बात को राष्ट्रवाद, हिंदू-मुसलमान, कश्मीर और पाकिस्तान पर घुमा दिया. और जब केजरीवाल पर इन मुद्दों से जुड़े सवाल दागे गए तो उन्होंने खुलकर दिल्ली के विकास और आप द्वारा पूरे किए गए चुनावी वायदों का जिक्र किया. भाजपा ने जब-जब आप को दिल्ली में स्कूल, बिजली और कैमरों की कमी के लिए घेरना चाहा, केजरीवाल ब्रिगेड ने बड़े दिलचस्प ढंग से मीडिया में अपनी उपलब्धियों के वीडियो दिखा-दिखाकर उन आरोपों को मौकों के तौर पर भुनाया.

हालांकि यह बात और है कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी की बड़ी जीत के बाद भी यह सवाल ख़त्म नहीं होता कि यदि मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को अपनी उपलब्धियों और नीतियों पर इतना ही भरोसा था तो उन्होंने चुनावी रणनीतिकार से ज्यादा इवेंट मैनेजर के तौर पर पहचाने जाने वाले प्रशांत किशोर को अपने साथ क्यों लिया?