दिल्ली विधानसभा चुनावों के नतीजे आ चुके हैं. यहां पर आम आदमी पार्टी ने एक बार फिर भारी बहुमत हासिल किया है. इस पर आई कई टिप्पणियों में कहा जा रहा है कि यह नतीजा नफरत फैलाने वाली राजनीति की हार है. यह कहना कितना सही है, इस आलेख में हम इस पर भी चर्चा करेंगे लेकिन इससे पहले ऐसा कहे जाने की वजह बने एक नारे की बात कर लेते हैं. असल में दिल्ली चुनाव प्रचार के दौरान भारतीय जनता पार्टी लगातार पाकिस्तान और हिंदु-मुसलमान को चुनाव का मुद्दा बनाने की कोशिश करती दिखी थी. इस क्रम में भाजपा की तरफ से कई ऐसे बयान दिए गए जिसके लिए उसे आलोचनाओं का सामना करना पड़ा. विवादों के घेरे में भाजपा नेता अनुराग ठाकुर द्वारा लगवाया एक नारा भी आया जो कुछ यूं था - ‘देश के गद्दारों को, गोली मारो सा** को.’

पिछले कुछ वक्त से लगातार चर्चा बटोर रहा ‘देश के गद्दारों...’ नारा कहां से शुरू हुआ, इस बारे में कोई ठोस जानकारी तो नहीं हैं. लेकिन भाषाई जानकार बताते हैं कि बहुत संभावना है कि इसकी शुरूआत उस बेहद प्रचलित नारे से हुई हो जिसमें कहा जाता कि ‘अ ब स के दलालों को, जूते मारो सा** को.’ जूते मारकर अपमानित करने की बात करने वाला यह नारा अक्सर ही छिटपुट विरोध प्रदर्शनों की आवाज बनता रहा है. मसलन, अगर विरोध प्रदर्शन स्कूलों में बढ़ती हुई फीस को लेकर हो रहा है तो प्रदर्शनकारी कहते मिल जाएंगे कि ‘शिक्षा के दलालों को, जूते मारो सा** को.’ और यह नारा हिंदी पट्टी की उस सामाजिकता से जुड़ा हुआ है जिसमें जूतों से पीटने की बात करना अक्सर आम बोलचाल का हिस्सा हुआ करता है. शायद यही कारण है कि जब ‘अ ब स के दलालों को...’ अपनी बदली हुई शब्दावली के साथ राजनीतिक मंच पर आया तो आसानी से लोगों का ध्यान खींच सका.

वैसे, अगर हिंसा-अहिंसा का तर्क छोड़ दें और इस बदले हुए नारे के शाब्दिक अर्थों पर जाएं तो इसमें ज्यादातर लोगों को आपत्ति करने की कोई वजह नहीं दिखाई देगी. इसमें देश से गद्दारी करने वालों को गोली मार देने की बात ही तो कही जा रही है! फिर यह विवादित क्यों हुआ? इस पर जामिया मिलिया इस्लामिया के भाषा विभाग की फैकल्टी मेंबर रोहिणी कुमारी कहती हैं, ‘जहां तक इसकी शुरूआत की बात है तो साल 2016 में जब कथित तौर पर टुकड़े-टुकड़े गैंग ने जेएनयू में देशविरोधी नारे लगाए थे तब मैं उसी कैंपस में रह रही थी. उस दौरान मैंने छात्र संगठनों को ये नारा लगाते हुए सुना था. स्पष्टता से कहूं तो एबीवीपी का खेमा इसका इस्तेमाल कर रहा था. अब क्योंकि बीजेपी ने देशभक्ति और देशद्रोह की नई परिभाषाएं तय कर दी हैं तो यह समझना बहुत मुश्किल नहीं है कि इस पर आपत्ति क्यों जताई जानी चाहिए.’

अगर कोई रोहिणी की बात से पूरी तरह सहमत नहीं भी हो तो भी उसे यह स्वीकार करने में कोई ऐतराज़ नहीं होगा कि यह नारा छात्र संगठनों के गलियारे से होते हुए राजनीति की मुख्य सड़क पर पहुंचा है. इस बात की पुष्टि भोपाल की बरकतुल्ला यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन और दिल्ली यूनिवर्सिटी से पोस्ट ग्रेजुएशन करने वाले आदित्य पांडेय भी करते हैं. वे कहते हैं कि बीते दो-तीन सालों में उन्होंने अपनी दोनों यूनिवर्सटीज में इन नारों का इस्तेमाल होते हुए देखा है.

वहीं, सोशल मीडिया पर इस नारे की उपस्थिति के सबूत फरवरी 2019 से मिलते हैं. 14 फरवरी, 2019 को जब पुलवामा हमला हुआ तो उस पर गुस्सा जताते हुए तमाम लोगों ने इस नारे के साथ टिप्पणियां की थीं. सत्याग्रह ने जब इन टिप्पणियों की पड़ताल की तो पाया कि इसे पोस्ट करने वाले ज्यादातर यूजर्स दक्षिणपंथी राजनीतिक रुझान वाले थे. इसके अलावा, फेसबुक पर कई ऐसे वीडियो भी मौजूद हैं जिनमें पुलवामा हमले पर आक्रोश दिखाने के लिए निकाली गई रैलियों में इस नारे का इस्तेमाल किया गया था. ऐसा करने वालों में भाजपा के निचले स्तर के पदाधिकारी भी शामिल थे.

यह नारा नेशनल मीडिया का हिस्सा तब बना जब बीते साल दिसंबर में कपिल मिश्रा ने इसका इस्तेमाल किया. सीएए-एनआरसी के समर्थन में निकाली गई एक रैली में कपिल मिश्रा दिल्ली की सड़कों पर यह नारा लगाते हुए नज़र आए थे. यह पहला मौका था जब इस नारे ने मीडिया और सोशल मीडिया पर सुर्खियां बटोरीं और भाजपा ने इसके लिए आलोचना. इसके बाद, दिल्ली चुनावों के दौरान जब वित्त राज्यमंत्री अनुराग ठाकुर मंच से यह नारा लगवाते दिखाई दिए तो यह चुनावी मुद्दा बनकर भी उभरा.

अब आते हैं उस बात पर जिसमें कहा जा रहा है कि दिल्ली में भाजपा की हार, नफरत की राजनीति की हार है. इसे जरा दूसरी तरह से कहें तो पूछा जा सकता है कि क्या दिल्ली में भाजपा को ‘देश के गद्दारों...’ नारे से कोई फायदा नहीं हुआ है? राजनीति के जानकारों की मानें तो इसका जवाब नहीं में है. वे बताते हैं कि भाजपा का वोट प्रतिशत 2015 की तुलना में इस बार लगभग पांच फीसदी बढ़ा है. यानी लगभग चालीस फीसदी जनता ने तमाम विवादों के बाद भी भाजपा को वोट देना चुना है.

राजनीति विश्लेषक कहते हैं कि दिल्ली में भाजपा सरकार भले ही न बना पाई हो लेकिन उसने इस चुनाव में आप के प्रत्याशियों को कड़ी टक्कर दी. यहां तक कि केजरीवाल सरकार के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया भी बहुत कम अंतर से जीत हासिल कर सके. दिल्ली में भाजपा के सरकार बनाने के करीब न पहुंच पाने की दो वजहें बताई जा रही हैं. इनमें से पहली यह है कि आप विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ने वाली एक बेहत मजबूत प्रतिद्वंदी थी और दूसरी यह कि इस चुनाव में कोई भी तीसरा मोर्चा नहीं था. जानकार मानते हैं कि अगर कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय पार्टियां दिल्ली में अपनी उपस्थिति दर्ज करवा पाने लायक भी प्रदर्शन करतीं तो वे आप का वोट बैंक शेयर करतीं और ऐसे में भाजपा के लिए नतीजे बेहतर हो सकते थे. और ऐसी हालत में ‘देश के गद्दारों को...’ इस नतीजे को और बेहतर बना सकता था.

कुछ राजनीतिक विश्लेषक यह भी मानते हैं कि नफरत वाली राजनीति की हार होने की बात, भले ही धरातल पर उतनी ठोस ना हो लेकिन इससे देश भर में भाजपा के खिलाफ यह संदेश तो चला ही गया है कि अब हिंदू वोटर उसे नकार रहा है. यानी एक परसेप्शन बन गया है जिसका इस्तेमाल कोई चतुर विपक्षी दल भाजपा के खिलाफ माहौल बनाने के लिए कर सकता है.

ऐसे में सवाल उठता है कि भाजपा इस तरह की राजनीति, बयानों या नारों का आगे कितना इस्तेमाल करती हुई दिखाई दे सकती है? इसके जवाब में देश के जाने-माने कार्टूनिस्ट और राजनीतिक टिप्पणीकार राजेन्द्र धोड़पकर कहते हैं कि ‘छवि कुछ भी बनी हो लेकिन बीजेपी को इस नारे से फायदा ही हुआ है. दिल्ली के चुनावों में अगर उसे कोई नुकसान हुआ है तो यह कि इससे पता चल गया है कि वह एक पार्टी के तौर पर कमजोर हो रही है और विधानसभा चुनावों में मोदी मैजिक अब काम नहीं आ रहा है. ऐसे में उसके पास ध्रुवीकरण करने के अलावा और कोई चारा भी नहीं बचता है.’

इसके अलावा धोड़पकर यह भी जोड़ते हैं कि ‘अगर आप जमीन पर जाकर देखेंगे तो पता चलेगा कि भाजपा के पास कार्यकर्ता ही नहीं है. पार्टी के वर्तमान नेतृत्व ने इसके स्ट्रक्चर को काफी कमजोर किया है जिसके चलते वे नेता जो जमीन से जुड़े रहते थे, पार्टी से दूर होते जा रहे हैं. छत्तीसगढ़, हरियाणा और महाराष्ट्र इसके उदाहरण हैं. इसीलिए आगे भी भाजपा को स्टार प्रचारकों और इस तरह के हाईपिच मुद्दों की जरूरत बनी रहेगी.’

इसका सीधा सा मतलब यह है कि इस तरह के नारों का इस्तेमाल आगे भी और बहुत जोर-शोर से होता दिख सकता है.