भाषा में जो दर्ज़ होता है वह काफ़ी देर तक बना रहता है. साहित्य की उत्तरजीविता का मूलाधार उसका भाषा में होना है. इस दर्ज़ होने का अर्थ तत्कालीन समय, समाज, व्यक्ति का दर्ज़ होना है. यह तो मानी हुई सचाई है. पर इस दर्ज़ होने के बरक़्स चुप्पियां होती हैं जो खुद तो शायद दर्ज़ हो जाती हैं पर बाक़ी कुछ दर्ज़ नहीं करतीं. मनुष्य अपने लंबे इतिहास में भाषा और चुप्पी के बीच कहीं फंसा रहा है. चुप्पी, किसी दौर में, कितनी भयानक और कायर, अन्यायपूर्ण और अमानवीय होती है इसका विशद विश्लेषण, नाज़ियों के दौर के विश्लेषण से जिस महान आलोचक और चिंतक जार्ज स्टाइनर ने दशकों पहले किया था, उसका हाल में देहावसान हुआ.

हमारे एक बड़े कवि ने कभी चुप्पी के दहाड़ होने का ज़िक्र किया था. ऐसा संयोग हो सकता है कि लोग चुप रहकर भी अपना विरोध या इनकार दर्ज़ करें. पर अगर किसी समय में आप बा़की सब कुछ दर्ज़ कर रहे हों, जिनमें मानवीय संबंध और मनोभाव, प्रकृति, प्रेम, लगाव-अलगाव आदि शामिल हों पर सार्वजनिक जीवन में जो घट रहा है उसके बारे में आप चुप्पी साध लें तो यह न तो अलक्षित जा सकता है और न ही उसका कोई मानवीय बचाव हो सकता है. साहित्य अपनी प्रकृति से सुरक्षाकामी कर्म नहीं है. वह इसी संसार में घटता और अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाता रहता है. उसकी असली सुरक्षा साहस, कल्पनाशीलता और अपने को सदा वेध्य बनाये रखने में होती है. हमारे ही एक दूसरे कवि ने दशकों पहले कहा था, ‘जो बचेगा, कैसे रचेगा?’

एक बात और ध्यान देने की है. हमारे समय में भाषा में दर्ज़ करने का एक अधिक लोकव्यापी अधिक प्रभावशाली, अधिक दूरगामी माध्यम मीडिया है. उसका बहुत बड़ा हिस्सा गोदी में, सत्ता और धन-दौलत की गोदी में बैठा मीडिया है जो झूठों-अफ़वाहों को ख़बर की तरह दर्ज़ कर सच की तरह फैला-बढ़ा रहा है. हमारे लोकतंत्र में मीडिया का इतना व्यापक अधःपतन एक बड़ी दुर्घटना है. वह भाषा में किया गया सबसे बड़ा और अथक चल रहा प्रदूषण है. इसका एक अभागा अर्थ यह भी है कि इस समय जो सचमुच हो रहा है उसे दर्ज़ करने के लिए अधिकांश मीडिया पर भरोसा नहीं किया जा सकता. और भाषाओं का पता नहीं, पर हिंदी मीडिया इस समय व्यापक रूप से अप्रामाणिक और अविश्वसनीय हो चुका है. इसके सैकड़ों उदाहरण हर रोज़ दिये जा सकते हैं जिनकी प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया दोनों में ही भरमार है. यह भयानक है कि हिंदी का लगभग एक भी बड़ा अख़बार इस अधःपतन से बच नहीं पाया है. जो थोड़े बहुत हैं उनके साहस की प्रशंसा की जाना चाहिये पर उनका प्रभाव सीमित है और वे परिदृश्य को निर्णायक रूप से नहीं बदल पाते.

ऐसे भयावह समय में साहित्य की भाषा संबंधी ज़िम्मेदारी दोहरी हो जाती है. उसे भाषा को उसकी मानवीयता में सजीव रखना है और उसे हर हालत में सत्यवादी बनाये रखना है. बाद में, यह कहा जा सकना चाहिये कि ऐसे समय में साहित्य ने भाषा और सच दोनों को बचाया.

साहित्य और विचारधारा

साहित्य और विचारधारा के संबंध पर बहुत चर्चा और विवाद हुए हैं. वे लगभग छह दशक पुराने हैं. यह बहस ज़्यादातर वाम विचारधारा पर केंद्रित रही है. अरसे तक तो विचाराधारा का अर्थ वाम विचारधारा ही लिया जाता था. एक तरह का युग्म प्रचलन में था- वाम और वाम-विरोध. यह मानने में बड़ी हिचक या वैचारिक अड़चन थी कि इन दोनों से अलग या इनके बीच की भी कोई धारा हो- बह सकती है. वाम विचारधारा का यह थोड़ा संदिग्ध सौभाग्य था कि उसके कई संगठन और मंच थे जो आक्रामक रूप से उस पर इसरार करते थे. इसका एक नतीजा यह भी हुआ कि ऐसे संगठनों के सदस्य होने का अर्थ वाम विचारधारी हो गया, भले अपने साहित्य-कर्म में वह इतना प्रगट या स्पष्ट न हो. इन संगठनों ने दशकों तक कई वर्जनाएं भी प्रचारित कीं. लेखकों और कृतियों का, आयोजनों और संस्थाओं का बहिष्कार किया गया. इनकी संख्या, हिन्दी में तीन थी. उनमें आपस में भी कई मतभेद और विवाद होते रहे. यह उनका वाम लोकतंत्र रहा.

वाम-विरोधी उतने संगठित नहीं रहे, न ही उतने आक्रामक होने की उन्हें कोई ज़रूरत लगी. पर उनमें से अनेक अपनी ज़िद पर अड़े रहे और कई बार अपने विरोध में ध्रुवान्त पर भी ले जाते रहे. थोड़े परस्पर घुसपैठ दोनों तरफ़ होती रही. मध्यवर्ती उदार कहे जा सकते हैं- वे वाम के कुछ मूल्यों से सहमत रहे और कई से असहमत. वे वामविरोधी के ध्रुवान्तों पर भी विचलित होते रहे. इस घमासान भरे परिदृश्य के कुछ दुष्परिणाम भी हुए. पहला विचारधारा की सारी बहस विचार पर कम, धारा पर अधिक हुई. दूसरा, तथाकथित विचार या वैचारिक दृष्टि को साहित्य में ज़रूरत से कहीं अधिक महत्व दिया जाने लगा. तीसरा, इसकी लगभग अनदेखी होने लगी कि साहित्य की अपनी वैचारिक सत्ता है और उसे अनिवार्य या वांछित रूप से किसी विचार या विचारधारा का उपनिवेश नहीं होना चाहिये. चौथे, ऐसे बहुत सारे लेखक उपेक्षित होने लगे जो इन खांचों से बाहर थे. पांचवां, अनेक लेखकों और कृतियों के बारे में व्यापक दुराग्रह फैल गये.

यह दिलचस्प है कि इस दौरान साम्प्रदायिकता, धर्मान्धता, संकीर्णता आदि की व्याप्ति पर विचार तो हुआ पर यह बात इस विमर्श से बाहर ही रही आयी कि हिंदी समाज का एक बड़ा हिस्सा धीरे-धीरे, वाम और उदार दृष्टियों की सक्रियता के बावजूद, हिंदुत्व जैसी भेदभाव फैलाने और घृणा उपजाने वाली प्रवृत्ति को मानने और पोसने लगा है. यह नहीं कि साहित्य ने इसका पूर्वाभास और चेतावनी न दिये हों, यही कि उसके पोषक तत्वों का विश्लेषण नहीं हुआ. पिछले लगभग सात दशकों

से व्यापक रूप से मनुष्य की आध्यात्मिक वृत्ति की जो उपेक्षा हुई साहित्य में उसका एक परिणाम यह है कि उस आध्यात्मिक शून्य को भरने एक छद्म वृत्ति हिंदुत्व घुस गयी. हिंदू लेखकों ने मिलकर एकजुट होकर हिंदू धर्म की भयानक दुर्व्याख्या और सतही समझ पर आधारित हिंदुत्व का विरोध आज जक नहीं किया. हमारे समय का यह एक केन्द्रीय द्वन्द्व है और वाम के अलावा उदार दृष्टिवाले लेखकों को भी अपनी चुप्पी तोड़ना चाहिये. और चुप रहे तो देर हो जायेगी। यह क्षण निर्णय और कर्म दोनों का है: इसमें चूक भारी पड़ेगी.

सिविक स्पेस में

पिछले कुछ बरसों से लग रहा था कि सिविक स्पेस पर उन शक्तियों ने कब्ज़ा कर लिया है जो लोकतंत्र और उसके मूल्यों में विश्वास नहीं करतीं. एक सर्वग्रासी मानसिकता राजनीति-धर्म-मीडिया-बाज़ार के गठबन्धन से इस स्पेस पर लगातार हावी हो रही है और उसके चंगुल से असहमति और संवाद के लिए जगह निकालना लगभग असम्भव हो गया है. विशेषतः राजनीति में भाषा से भद्रता और सौम्यता को लगभग देश निकाला दे दिया गया है. इधर, ख़ासकर शाहीन बाग़ के बाद और छात्र-आन्दोलनों से, लगने लगा है कि भद्रता, सौजन्य और अहिंसक विरोध-प्रतिरोध बचे हुए हैं और सिविक स्पेस में कुछ घुसपैठ कर पा रहे हैं.

‘सिविक स्पेस में समाज-विज्ञान’ विषय पर एक फ्रेंच-भारतीय परिसंवाद में कुछ समय जाने का सुयोग जुटा. अकसर समाज-विज्ञानी इस सचाई को नज़रन्दाज़ करते हैं कि साहित्य और कलाएं भी सिविक स्पेस का अनिवार्य हिस्सा होती हैं और इस स्पेस को बनाने और सक्रिय रखने में उनकी भूमिका होती है। अगर आज भारत में ऐसा स्पेस फिर से स्पन्दित होता लगता है तो यह याद रखना चाहिये कि कविता, संगीत, कला आदि उसमें महत्वपूर्ण ढंग से सक्रिय हैं.

एक दिक्कत शायद इस बात से आती है कि समाज-विज्ञान कुछ सामान्य अवधारणाएं या तो लेकर चलता है या फिर ज्ञात तथ्यों-ब्यौरों के आधार पर ऐसी अवधारणाएं गढ़ता-तलाशता है. सामान्यीकरण में हमेशा कुछ-न-कुछ ब्यौरे हिसाब से बाहर हो जाते हैं क्योंकि वे सामान्यीकरण की सीमाओं में अंटते नहीं हैं. साहित्य और कलाओं की प्रकृति ऐसे सामान्यीकरण में सरलीकृत किये जाने के विरुद्ध होती है. दूसरे, समाज-विज्ञान में समाज का प्रभुत्व है, व्यक्ति का महत्व अपने आप में नहीं समाज के अंग के रूप ही होता है। इसके बरक़्स साहित्य और कलाओं में व्यक्ति का अपने आप में भी महत्व होता है. साहित्य का देवता ब्यौरों में बसता है पर समाजविज्ञान का बड़ी सांख्यिकी और अवधारणाओं में. साहित्य और कलाओं में छोटे से छोटा सच भी ख़राब नहीं जाने दिया जाता जबकि ऐसा सच समाजविज्ञान का ध्यान नहीं खींच पाता.

सिविल नाफ़रमानी पर एक परचा था और उसमें उसका आधुनिक संसार में इतिहास ट्रेस किया गया था. एक आपत्ति यह उठी कि राजनैतिक-सामाजिक होने के बावजूद सविनय अवज्ञान नैतिक कर्म होती हैं और उससे नैतिक तत्व को अलग नहीं किया जा सकता. मुझे यह कहना उचित लगा कि जहां तक हिंदी साहित्य का सवाल है पिछली एक सदी में साहित्य ने औपनिवेशिक काल और लोकतंत्र में भी सत्ता के बरक़्स सविनय अवज्ञा की ही भूमिका निभायी है. यह और बात है कि इसे समाज-विज्ञान में लक्ष्य और विश्लेषित नहीं किया गया है.