सुप्रीम कोर्ट ने वोडाफोन-आइडिया की याचिका खारिज कर दी है. इसमें अनुरोध किया गया था कि उसे एजीआर बकाया मामले में 2500 करोड़ रुपये सोमवार को और 1000 करोड़ रुपये शुक्रवार तक चुकाने की इजाजत दे जाए. लेकिन जस्टिस अरुण मिश्र की अगुवाई वाली बेंच ने इसे खारिज कर दिया. कंपनी को कुल 50 हजार करोड़ रु की रकम चुकानी है.

वोडाफोन-आइडिया का कहना है कि अगर उसे एक साथ इतने सारे पैसे चुकाने पड़े तो उसके पास दुकान बढ़ाने के अलावा कोई रास्ता नहीं होगा. कंपनी के वकील मुकुल रोहतगी ने एनडीटीवी से बातचीत में कहा, ‘वोडाफोन-आइडिया को पिछले एक दशक में दो लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का नुकसान हुआ है. अगर उन्होंने रातोंरात अपना सारा बकाया सरकार को चुकाया तो उन्हें अपना कारोबार बंद करना होगा.’

इसका असर समूचे दूरसंचार कारोबार पर होगा. 10 हजार लोग बेरोजगार हो जाएंगे और 30 करोड़ यूजर्स को असुविधा होगी. इसका मतलब यह भी है कि भारतीय बाजार में केवल दो कंपनियां रह जाएंगी और एकाधिकार का खतरा पैदा हो जाएगा. मुकुल रोहतगी ने कहा, ‘सभी कंपनियां दूरसंचार विभाग से कहती आ रही हैं कि उनके पास रातोंरात इस रकम का भुगतान करने के लिए कोई रास्ता नहीं है. सरकार को कुछ पहल करनी चाहिए.’

वोडाफोन-आइडिया के अधिकारी कई बार दोहरा चुके हैं कि अगर कंपनी पर अचानक से पैसे चुकाने का भार पड़ेगा तो उसे भारत में अपना कारोबार बंद करना पड़ेगा. इनमें कंपनी के चेयरमैन कुमार मंगलम बिड़ला भी शामिल हैं. हाल में उन्होंने कहा था कि कंपनी की हालत खराब है और डूबते पैसे में और पैसा लगाने का कोई मतलब नहीं है. इससे पहले इस संयुक्त उपक्रम में सबसे बड़े हिस्सेदार ब्रिटेन के वोडाफोन समूह की तरफ से भी ऐसा ही बयान आया था. समूह के मुखिया निक रीड ने कहा था कि वोडाफोन-इंडिया बंद होने के कगार पर है.

हालिया तिमाही में वोडाफोन-आइडिया को 50 हजार करोड़ रु से ज्यादा का घाटा हुआ है. भारत के इतिहास में किसी कंपनी को एक तिमाही में हुआ यह सबसे ज्यादा घाटा है. कंपनी की खराब हालत के चलते कुमार मंगलम बिड़ला की संपत्ति में भी बड़ी गिरावट देखने को मिली है. पिछले दो साल में उनकी संपत्ति 21500 करोड़ रुपये घटकर करीब 43 हजार करोड़ रु पर आ गई.

बिड़ला समूह ने आइडिया को वोडाफोन के साथ मिलाकर के देश की सबसे बड़ी दूरसंचार कंपनी बनाई थी. ब्लूमबर्ग के मुताबिक वोडाफोन-आइडिया में 45 फीसदी हिस्सेदारी वोडाफोन की है. इसके अलावा कंपनी में ग्रासिम इंडस्ट्री की 12 फीसदी, बिड़ला टीएमटी की एक फीसदी, हिंडाल्को की तीन फीसदी और 11 फीसदी बिड़ला समूह की अन्य कंपनियों की हिस्सेदारी है.

मामला क्या है?

एजीआर यानी समायोजित सकल राजस्व को लेकर दूरसंचार कंपनियों और सरकार के बीच लंबे समय से विवाद चला आ रहा है. कंपनियों को अपनी कमाई का एक हिस्सा टैक्स के रूप में देना पड़ता है. वे चाहती हैं कि केवल दूरसंचार कारोबार से होने वाली कमाई को ही इस उद्देश्य के लिए गिना जाए. उधर, सरकार का कहना है कि गैर दूरसंचार कारोबार जैसे कि परिसंपत्तियों की बिक्री या डिपाजिट्स पर मिलने वाले ब्याज को भी इसमें शामिल किए जाए. एक दशक से भी पुराने इस विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के पक्ष में फैसला सुनाया है. यानी दूरसंचार कंपनियों को अब सरकार को 12.5 अरब डॉलर की रकम चुकानी होगी.