दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजों से देश की राजनीति पर किसी तरह का प्रत्यक्ष प्रभाव पड़े या न पड़े, इन नतीजों ने उत्तर प्रदेश विधानसभा के भावी चुनावों को लेकर बीजेपी की चिताएं जरूर बढ़ा दी हैं.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को दिल्ली चुनावों में स्टार प्रचारक के तौर पर पेश किया गया था. योगी ने कई सभाओं में अपने अंदाज से आग उगलने की कोशिश भी की. लेकिन दांव उल्टा पड़ गया. उन्होंने जिन सीटों पर प्रचार किया उनमें से सिर्फ रोहतास नगर और करावल नगर सीट पर ही भाजपा को जीत हासिल हुई. करावल नगर सीट की जीत में भी पूर्व विधायक कपिल मिश्रा का बड़ी भूमिका रही थी.

योगी आदित्यनाथ के चुनाव भाषण का वोटरों पर तो खास असर हुआ नहीं मगर चुनाव आयोग पर उसका खासा असर हो गया. आयोग ने योगी के करावल नगर में दिये गये विवादित भाषण पर उनसे जवाब तलब कर लिया. योगी ने अपने भाषण में कहा था, ‘आज आतंकवादियों को बिरयानी नहीं खिलाई जा रही है, ये बिरयानी खिलाने का शौक या तो कश्मीर के अंदर कांग्रेस को था या फिर बिरयानी खिलाने का शौक शाहीन बाग जैसी घटनाओं में केजरीवाल को है, भारतीय जनता पार्टी को नहीं है. लेकिन पाकिस्तान का एक मंत्री केजरीवाल के समर्थन में अपील कर रहा है यानी इसे दिल्ली की जनता पर विश्वास नहीं है. वो अपने पाकिस्तान के आकाओं से कहकर अपने पक्ष में बयान दिलवा रहे हैं. भाइयो-बहनो इन चेहरों को पहचान लीजिए, बहुत ठीक से पहचान लीजिए.’’

चुनाव आयोग ने योगी आदित्यनाथ के इस बयान को चुनाव आचार संहिता का खुला उल्लंघन माना. उन पर एक अन्य सभा में ‘‘बोली से नहीं माने तो गोली से मान जाएंगे’’ जैसा बयान देने का आरेाप भी ‘आप’ ने लगाया था.

दिल्ली नतीजों के बाद बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष व गृह मंत्री अमित शाह की इस स्वीकारोक्ति से कि ‘गोली’ जैसे बयानों से बचा जाना चाहिए था, यह पता चलता है कि भड़काऊ भाषणों के मामले में पार्टी शायद अपनी रणनीति पर पुनर्विचार कर रही है. पार्टी के राज्य व राष्ट्रीय स्तर के कुछ नेताओं को पार्टी की ओर से इस तरह के भड़काऊ बयानों के लिए चेताया भी गया है.

बीते रविवार को लखनऊ में एकल अभियान द्वारा आयोजित परिवर्तन कुम्भ के उद्घाटन के मौके पर आदित्यनाथ के बयान की भी बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व में प्रतिक्रिया हुई है. योगी ने कहा था कि ‘‘पिछले वर्षो में दी गई सुविधाओं की गति अगर 1947 से होती तो आज कोई ऐसा व्यक्ति नहीं होता जिसे इन योजनाओं की जरूरत होती. पूर्व की सरकारों के पास विजन नहीं था.’’

योगी आदित्यनाथ के इस बयान की लपेट में कल्याण सिंह व राजनाथ सिंह की सरकारें भी आ गई हैं, इसलिए इस बयान को खुद बीजेपी के नेता तक सहजता से पचा नहीं पा रहे हैं. पार्टी नेताओं का मानना है कि इस तरह के बयानों से खुद भाजपा के लिए असहजता की स्थिति पैदा हो जाती है. यही वजह है कि पार्टी अब योगी की बयानबाजी को जीत की गारंटी मानने से हिचकने लगी है.

बीजेपी की चिन्ता की वजह यह भी है कि योगी सरकार के तीन साल पूरे होते-होते भी राज्य सरकार अब तक यह तय नहीं कर पाई है कि 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों मे वह किन उपलब्धियों और किन कार्यक्रमों के बूते जनता के सामने जाएगी. उत्तर प्रदेश में योगी सरकार अपनी पहचान बनाने और चुनावी एजेंडा तय करने के लिए अपने अब तक के कार्यकाल में ऐसा कुछ भी नहीं कर पाई है जिसे वह अपनी उपलब्धि बताकर जनता के बीच आत्मविश्वास से खुद को प्रस्तुत कर सके. राज्य सरकार के अब तक के सारे कार्यक्रम सिर्फ तीन प्रमुख अवधारणाओं पर केन्द्रित रहे हैं:

पहली तरह की योजनाएं वे हैं जो पूर्ववर्ती सरकारों के कार्यकाल में भी जारी थीं. योगी सरकार ने उन्ही योजनाओं को पूरा करने, जारी रखने या उसी तरह की योजनाएं स्वयं चलाने का काम किया है. इन योजनाओं में इनवेस्टर्स समिट जैसे बड़े कार्यक्रम हैं, जो पहली सरकारों की तुलना में अधिक भव्यता से आयोजित तो हुए हैं लेकिन इनके जरिए निवेश को आकर्षित करने में अभी भी सफलताओं का इन्तजार है. वैसे भी उत्तर प्रदेश में कारोबारी सुगमता के लिए जो सबसे बड़ी बाधा मानी जाती है, योगी सरकार उसमें कुछ भी सुधार नहीं कर पाई है. यह बाधा है राज्य की कानून-व्यवस्था की खराब होती जा रही स्थित. योगी सरकार अपनी रामराज्य की कल्पनाओं को अपराधमुक्त उत्तर प्रदेश बनाने की दिशा में जमीन पर नहीं उतार पा रही है.

इसी तरह ‘गंगा एक्सप्रेस-वे’ और ‘पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे’ जैसी बड़ी लागत वाली निर्माण योजनाएं हैं जो ‘आगरा एक्सप्रेस-वे’ और ‘यमुना एक्सप्रेस-वे’ का विस्तार या नकल भर हैं. इन योजनाओं के दीर्घकालीन प्रभाव चाहे कितने ही सकारात्मक हों, फिलहाल तो राज्य की मौजूदा आर्थिक-सामाजिक स्थितियों में इनके कारण कोई बड़ा परिवर्तन अभी भी होता नहीं दिख रहा है. इस तरह के आयोजनों और योजनाओं से नौकरशाही और निर्माण तंत्र से जुड़े लोगों की आर्थिक स्थितियां तो सुधरती होंगी पर शेष समाज के लिए अभी इनका शायद ही कोई महत्व है.

दूसरी तरह की योजनाएं वे हैं जो केन्द्र सरकार द्वारा चलाई जा रहीं हैं और जिनमें राज्य सरकार की जिम्मेदारी सिर्फ क्रियान्वयन और स्थानीय स्तर पर वित्तीय प्रबन्धन तक ही सीमित है. दीवाली के वक्त प्रदेश सरकार द्वारा शुरू की गई ‘मुख्यमंत्री कन्या सुमंगला योजना’ ऐसी ही एक योजना है. तीन लाख से कम वार्षिक आय वाले परिवारों की बेटियों के लिए पैदा होने से माध्यमिक शिक्षा तक आर्थिक मदद की इस योजना को देश के किसी भी राज्य की अपनी तरह की अलग योजना के तौर पर प्रचारित किया गया था. लेकिन खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसे लागू करते वक्त स्वीकार किया कि ‘‘प्रधानमंत्री की प्रेरणा से सरकार की नारी सशक्तिकरण की तीन दर्जन से अधिक योजनाओं की कड़ी में आज एक और योजना जुड़ गई है.’’

इसी प्रकार 12वीं कक्षा मेरिट के साथ पास करने वाली छात्राओं के लिए उत्तर प्रदेश कन्या विद्याधन योजना, मुफ्त बिजली कनेक्शन योजना, किसान ऋण योजना, मुख्यमंत्री किसान सर्वहित बीमा योजना, उत्तर प्रदेश भाग्य लक्ष्मी योजना जैसी दर्जनों योजनाएं हैं जिन्हे योगी सरकार चलाने की कोशिश कर रही है, लेकिन इनका राजनीतिक लाभ उसके खाते में नहीं जा पा रहा है.

योगी सरकार की तीसरी तरह की योजनाएं खालिस हिन्दुत्व से जुड़ी हैं. इन योजनाओं को शुरू करने या जारी रखने के पीछे सरकार का अपना एजेंडा है जो कहीं-कहीं जनता के एक हिस्से में प्रतिक्रिया भी पैदा करता है. इसका उदाहरण ‘‘उत्तर प्रदेश साधु पेंशन योजना’’ है. 21 जनवरी को राज्य सरकार ने साधुओं के लिए 500 रूपये प्रतिमाह की इस योजना की घोषणा की. सरकार का इस घोषणा के पीछे का मकसद बिलकुल साफ था. इस पर तुरन्त राजनीतिक प्रतिक्रया हुई तो सरकार के पक्ष में भी समर्थन और बयानों की झड़ी लग गई. वैसे यह भी कोई नई योजना नहीं है. उत्तर प्रदेश में 60 वर्ष से ऊपर के बुजुर्गों के लिए वृद्धावस्था पेंशन योजना बहुत पहले से जारी है.

इसी तरह योगी सरकार के गौ प्रेम के चलते राज्य में कांजी हाऊसों का नाम बदलकर गौ संरक्षण केन्द्र पर दिया गया. गौ संरक्षण के लिए शराब पर भी 0.5 फीसदी गौ कल्याण उपकर लागू करना हो या मुख्यमंत्री बेसहारा गौवंश सहभागिता योजना शुरू करना, सबका मकसद पार्टी के भगवा एजेंडे को ही आगे बढ़ाना था. योगी सरकार ने गौ हत्या रोकने के लिए जो कठोर योजनाएं शुरू कीं उनके चलते सूबे में छुट्टा पशुओं की तादाद 10-15 लाख हो चुकी है. यह ग्रामीण किसानों के लिए एक बड़ी समस्या बनती जा रही है. सरकारी प्रयासों के तहत इन छुट्टा पशुओं की देख-रेख मे सफलता न मिलती देख योगी सरकार ने इन पशुओं की जिम्मेदारी लेने वाले लोगों को 900 रूपये प्रति पशु प्रति माह देने की घोषणा की. इस पर उन्हें एक खास तबके से वाहवाही तो मिली लेकिन जमीनी हकीकत कुछ नहीं बदली. क्योंकि ऐसे पशुओं की देखभाल के लिए आगे आने वाले लोगों को यह रकम बहुत अपर्याप्त लगी.

इसी तरह ‘नमामि गंगे’ और नदी संरक्षण की अनेक योजनाओं के अपेक्षित परिणाम न मिलने के बावजूद योगी सरकार ने 27 से 31 जनवरी तक बलिया और बिजनौर से जो अति प्रचारित ‘गंगा यात्रा’ आयोजित की थी वह भी विशुद्ध रूप से पार्टी के एजेंडे से जुड़ी हुई थी. गंगा को स्वच्छ करने या प्रदूषण मुक्त करने का कोई लक्ष्य उससे जुड़ा नहीं था.

इस यात्रा में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, दोनों उपमुख्यमंत्री व 30 से अधिक मंत्री शामिल हुए थे. 27 जिलों की 1026 ग्राम पंचायतों से होकर यह गंगा यात्रा गुजरी और इस पर कई करोड़ रुपयों का खर्च भी हुआ. इसकी शुरूआत से ठीक पहले कानपुर के बिठूर क्षेत्र से भाजपा विधायक अभिजीत सिंह सांगा ने नमामि गंगे के तहत कानपुर में गंगा घाटों की सफाई का काम करने वाली कंपनी पर कई अफसरों के साथ मिलकर लम्बे घोटाले का आरोप लगा दिया. इसके अलावा योगी के शहरों और संस्थाओं के नाम बदलने का अभियान भी आम वोटरों में कोई उत्साह पैदा नहीं कर पाया.

जाहिर है कि इस तरह के कार्यक्रमों से उत्तर प्रदेश को खुशहाली बढ़ने वाली नहीं, पार्टी के नेताओं का संकुचित हिन्दुत्व भले ही संतुष्ट होता रहे. बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व की चिन्ता इसी बात से बढ़ रही है कि अगर योगी का केसरिया रंग इसी तरह से फीका पड़ता रहा तो उत्तर प्रदेश में 2022 के विधानसभा चुनाव में उसका खेवनहार कौन बनेगा और बीजेपी का प्रमुख मुद्दा क्या होगा?

अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर निर्माण कार्य अगले विधानसभा चुनाव के दौरान पूरे जोर-शोर से चल रहा होगा, मगर उत्तर प्रदेश के चुनाव में अब यह मुद्दा भाजपा को बड़ा लाभ दिला पाएगा इसमें संदेह है. क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब यह कोई राजनीतिक मुद्दा रह ही नहीं गया है.