बीते दिनों प्रशांत किशोर को जनता दल यूनाइटेड से निकाल दिया गया. जेडीयू अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 2018 में उन्हें पार्टी उपाध्यक्ष बनाया था. इससे पहले तक प्रशांत किशोर की पहचान चुनावी रणनीतिकार की थी. लेकिन जेडीयू उपाध्यक्ष बनाए जाने के बाद वे औपचारिक तौर पर राजनीति में आ गए.

हालांकि इसके बाद भी प्रशांत किशोर चुनावी रणनीति बनाने की अपनी सेवाएं अलग-अलग दलों को देते रहे. दूसरी तरफ वे जेडीयू को भी बतौर पार्टी उपाध्यक्ष अपनी सेवाएं दे रहे थे. उनके बारे में जेडीयू के अंदर और बाहर यही धारणा थी कि वे नीतीश कुमार के चहेते हैं. लेकिन हाल के दिनों में न सिर्फ नीतीश कुमार से उनकी तनातनी बढ़ी बल्कि सार्वजनिक तौर पर दोनों एक-दूसरे पर तीखे हमले भी बोलने लगे. इसी वजह से प्रशांत किशोर को जेडीयू से बाहर जाना पड़ा.

प्रशांत किशोर ने भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के लिए भी काम किया है. लेकिन वे इन दोनों पार्टियों के साथ भी नहीं टिक पाए और यहां से भी उन्हें विदा होना पड़ा. ऐसे में अब सवाल यह उठता है कि आखिर प्रशांत किशोर कहीं भी टिक क्यों नहीं पाते हैं?

प्रशांत किशोर बतौर चुनावी रणनीतिकार पहली बार तब चर्चा में आए जब 2012 के गुजरात विधानसभा चुनावों में वे तब के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ काम कर रहे थे. उस समय पहली बार किसी चुनाव में सोशल मीडिया और अत्याधुनिक तकनीक का प्रयोग किया गया था. 2013 में जब भाजपा ने नरेंद्र मोदी को अपना प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया तो उस समय भी उनके प्रचार अभियान का नेतृत्व प्रशांत किशोर ने ही किया. अगली साल लोकसभा चुनाव में सोशल मीडिया और तकनीक का जिस तरह से इस्तेमाल किया गया वह अभूतपूर्व था.

उस समय जब लोकसभा चुनावों के परिणाम आए तो ज्यादातर लोगों को इस बात पर हैरानी हुई कि भाजपा ने अपने दम पर बहुमत का आंकड़ा पार कर लिया. उस वक्त तक लोगों को यह तो लग रहा था कि कांग्रेस की वापसी नहीं हो पाएगी. लेकिन ऐसी उम्मीद नहीं की जा रही थी कि भाजपा अपने दम पर ही 272 का आंकड़ा पार कर लेगी. जब ये नतीजे आए तो इसका श्रेय नरेंद्र मोदी को दिया गया. एक चुनावी रणनीतिकार के तौर पर प्रशांत किशोर को भी इसका श्रेय मिला और नए जमाने के चुनावी रणनीतिकार के तौर पर वे स्थापित हो गए.

लेकिन भाजपा के साथ वे बहुत दिनों तक टिके नहीं. कहा गया कि नरेंद्र मोदी के सबसे विश्वस्त माने जाने वाले अमित शाह जब भाजपा अध्यक्ष बने तो उन्होंने प्रशांत किशोर को भाजपा से विदा करा दिया. भाजपा के ही कुछ लोग बताते हैं कि अमित शाह और प्रशांत किशोर के संबंध कभी अच्छे नहीं रहे, इनके मुताबिक 2012 में जब पहली बार प्रशांत किशोर नरेंद्र मोदी के लिए काम कर रहे थे तब से ही दोनों खुद को नरेंद्र मोदी का सबसे विश्वस्त बनने की होड़ में शामिल हो गए थे.

जब प्रशांत किशोर भाजपा खेमे से विदा हुए तो उस वक्त पार्टी नेताओं का यह कहना था कि जिस तरह से उन्होंने 2014 में भाजपा की कामयाबी का श्रेय लेने की कोशिश की, वह अमित शाह समेत पार्टी के कुछ और नेताओं को भी खटका. ऐसे में जब प्रशांत विदा होने लगे तो उन्हें बचाने के लिए कोई आगे नहीं आया.

वह ऐसा दौर था जब लंबे समय तक भाजपा के साथ रहे नीतीश कुमार, नरेंद्र मोदी के नाम पर गठबंधन तोड़कर अपनी अलग राह ले चुके थे. बिहार में अपने धुर विरोधी लालू प्रसाद यादव की राष्ट्रीय जनता दल से उनकी नजदीकी बढ़ रही थी. नीतीश कुमार कांग्रेस के भी धुर विरोधी रहे हैं. लेकिन समय की नज़ाकत को देखते हुए उस वक्त वे कांग्रेस के नजदीक आ गए थे. उसी दौर में नीतीश कुमार की नजदीकी बिहार से ही आने वाले प्रशांत किशोर से बढ़ी.

नीतीश कुमार 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव की तैयारी कर रहे थे. भाजपा से अलग होकर 2014 का लोकसभा चुनाव लड़ने वाले नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू बिहार में दो संसदीय सीटों पर ही सिमटकर रह गई थी. इसके बाद उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बना दिया था जो उन्हें लगातार परेशान कर रहे थे. इस पृष्ठभूमि में नीतीश कुमार जब 2015 के विधानसभा चुनावों की तैयारी में जुटे तो फिर से मुख्यमंत्री बनने के लिए जरूरी था कि वे एक असंभव सा लगने वाला गठबंधन तैयार करें. इस गठबंधन में जेडीयू के अलावा कांग्रेस और आरजेडी को शामिल होना था. उस वक्त प्रशांत किशोर ने इन तीनों पार्टियों के बीच पुल का काम किया. कहना गलत नहीं होगा कि इस काम में वे सफल रहे और इस गठबंधन ने बिहार विधानसभा चुनावों में जबर्दस्त जीत हासिल की.

इस कामयाबी के बाद नीतीश कुमार से प्रशांत किशोर की नजदीकी और बढ़ गई. बिहार की बड़ी कामयाबी के बाद नीतीश कुमार को राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी के विकल्प के तौर पर भी देखा जा रहा था. यही वजह थी कि जब 2015 में जब नीतीश कुमार मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहे थे तो उस वक्त विपक्ष के तमाम बड़े नेता उस कार्यक्रम में शामिल हुए थे.

अब प्रशांत किशोर अन्य भाजपा विरोधी पार्टियों के साथ काम करने लगे थे. माना जा रहा था कि 2019 के लोकसभा चुनावों के लिए वे नीतीश कुमार को नरेंद्र मोदी के मुकाबले पेश करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं. इसी कड़ी में प्रशांत किशोर राहुल गांधी से मिलने-जुलने लगे और यह बात आई कि 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के लिए वे कांग्रेस के साथ काम करेंगे. दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित को यहां से कांग्रेस का मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कराने में प्रशांत किशोर की ही भूमिका बताई गई. उन्होंने उत्तर प्रदेश में कई जगहों पर कांग्रेस नेताओं से बातचीत की. लेकिन लंबे समय तक उनका कांग्रेस से तालमेल बना नहीं रह सका और पार्टी ने उत्तर प्रदेश में उनकी सेवाएं लेनी बंद कर दीं. हालांकि, उसी वक्त वे पंजाब विधानसभा चुनावों में कैप्टन अमरिंदर सिंह के साथ काम करते रहे. लेकिन इसके बाद कांग्रेस ने उन्हें कोई नया काम नहीं दिया.

इसके कुछ महीने बाद ही नीतीश कुमार फिर से भाजपा के साथ आ गए और उसके कुछ समय बाद प्रशांत किशोर जेडीयू के उपाध्यक्ष बना दिए गए. लेकिन वे अब भी भाजपा विरोधी पार्टियों के साथ काम कर रहे थे. इस दौरान सबसे पहले वे वाईएस जगन मोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस के साथ जुड़े. फिर पश्चिम बंगाल में वे ममता बनर्जी के साथ काम करने लगे. हाल ही में उन्होंने दिल्ली में आम आदमी पार्टी के साथ भी काम किया.

इन सबके बीच कई बार यह सवाल उठा कि प्रशांत किशोर की पार्टी जेडीयू तो भाजपा की सहयोगी है लेकिन खुद वे भाजपा विरोधी पार्टियों के लिए काम कर रहे हैं. इस बारे में नीतीश कुमार से भी कई बार सवाल पूछे गए. जाहिर है कि उनके लिए राजनीतिक तौर पर यह सहज स्थिति नहीं थी. उन्हें अधिक परेशानी तब होने लगी जब कुछ मुद्दों पर प्रशांत किशोर पार्टी से अलग लाइन लेने लगे. नागरिकता संशोधन कानून और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर के मसले पर यह मतभेद बढ़ता हुआ एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गया जहां नीतीश कुमार को यह निर्णय लेना पड़ा कि प्रशांत किशोर जेडीयू में नहीं रहेंगे.

पार्टी की ओर से प्रशांत किशोर के अलावा पवन वर्मा को भी निकालने का निर्णय लिया गया. उस वक्त जेडीयू की ओर से जो बयान जारी किया गया, उस पर पार्टी महासचिव केसी त्यागी के हस्ताक्षर थे. इस बयान में प्रशांत किशोर के बारे में कहा गया, ‘पिछले कई महीनों से दल के अंदर पदाधिकारी रहते हुए प्रशांत किशोर ने कई विवादास्पद वक्तव्य दिए जो दल के निर्णय के विरुद्ध एवं उनकी स्वेच्छाचारिता का परिचायक है. श्री किशोर को पार्टी में आने के बाद राष्ट्रीय अध्यक्ष ने सम्मानित किया जिसका इस्तेमाल वे अपनी स्वेच्छाचारिता के रूप में करते हैं. पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने उनके स्वेच्छाचारी वक्तव्यों को दरकिनार करते हुए कहा कि उनकी इच्छा पर निर्भर है कि वे पार्टी में रहें या नहीं रहना हो तो जहां इच्छा हो, जाने के लिए स्वतंत्र हैं. इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप उन्होंने राष्ट्रीय अध्यक्ष के विरूद्ध अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया जो अपने आप में स्वेच्छाचारिता है. श्री किशोर और ज्यादा नहीं गिरें, इसके लिए आवश्यक है कि वे पार्टी से मुक्त हों.’

इस बयान में मूलतः दो बातें हैं. पहली बात यह कि प्रशांत किशोर स्वेच्छाचारी हैं. और दूसरी बात यह कि उन्होंने जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार के खिलाफ अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया. स्वेच्छाचारिता आम बोलचाल का शब्द नहीं है. हिंदी शब्दकोश में इसका अर्थ निरंकुश होना और मनमानी चलाना बताया गया है. अगर किसी संगठन के संदर्भ में स्वेच्छाचारिता का मतलब समझने की कोशिश करें तो यह कहा जा सकता है कि पार्टी का आरोप है कि प्रशांत किशोर संगठन के कायदे में बंधकर रहने वाले व्यक्ति नहीं हैं और वे उपाध्यक्ष रहते हुए भी पार्टी में मनमाना व्यवहार करते हैं. जाहिर सी बात है कि स्वेच्छाचारिता में सहमति की कोई संभावना नहीं बनती.

अगर सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध जानकारियों से इसे जोड़ने की कोशिश की जाए तो पता चलता है कि प्रशांत किशोर ने कुछ मुद्दों पर पार्टी से अलग लाइन ली. पार्टी ने इसे स्वेच्छाचारिता माना. दूसरी तरफ प्रशांत किशोर के दृष्टिकोण से देखने की कोशिश करेंगे तो वे इसे पार्टी में बोलने की आजादी या आंतरिक लोकतंत्र से जोड़ेंगे. साथ ही जिस नागरिकता संशोधन कानून और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर के मसले पर उनका मतभेद हुआ, उन मुद्दों को वे पार्टी की विचारधारा से भी जोड़ते हैं. ऐसा कहकर वे यह संकेत भी देते हैं कि जेडीयू जिस विचारधारा पर बनी थी, उसके प्रति वे अधिक प्रतिबद्ध हैं और नीतीश कुमार इसे राजनीतिक लाभ के लिए कमजोर कर रहे हैं.

प्रशांत किशोर पर दूसरा आरोप है कि उन्होंने नीतीश कुमार के खिलाफ अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया. अब सवाल उठता है कि वे शब्द क्या हैं? दरअसल, जब नीतीश कुमार और प्रशांत किशोर का टकराव बढ़ा तो नीतीश कुमार ने यह कहा कि उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे अमित शाह के कहने पर प्रशांत किशोर को पार्टी में शामिल किया था. इसके जवाब में प्रशांत किशोर ने अंग्रेजी में नीतीश कुमार को संबोधित करते हुए एक ट्वीट किया - ‘आपमें कितनी गिरावट आई है कि मैं क्यों और कैसे जेडीयू में शामिल हुआ उसके बारे में आपको झूठ बोलना पड़ रहा है. आपने अपनी ही तरह मुझे बनाने की गलत कोशिश की है. अगर आप वाकई में सच कह रहे हैं तो कौन इस बात का यकीन करेगा कि आज भी आपमें अमित शाह की सिफारिश पर आए हुए को नहीं सुनने की हिम्मत है?’

प्रशांत किशोर के इसी बयान के बाद जेडीयू को उन्हें पार्टी से बाहर करने का निर्णय तत्काल लेना पड़ा.

पिछले कुछ सालों में चुनाव प्रबंधन के मामले में प्रशांत किशोर ने जो साख बनाई है, उससे उनकी एक छवि यह भी बनी है कि वे राजनीतिक तौर पर बेहद परिपक्व हैं. लेकिन उनके इस बयान से कुछ लोगों की राय बदलती हुई दिखी. जेडीयू के ही एक प्रमुख नेता इस बारे में कहते हैं, ‘पहले भी कई बार पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं को लगता था कि प्रशांत किशोर में वह राजनीतिक परिपक्वता नहीं है जैसी उनकी छवि है. पार्टी की कई आंतरिक बैठकों में और नीतीश कुमार को छोड़कर पार्टी के दूसरे नेताओं से उनके बर्ताव से भी कई बार ऐसा लगता था. लेकिन जिस निचले स्तर पर जाकर उन्होंने नीतीश कुमार पर हमला किया, उससे यह बात साबित हो गई कि उनकी राजनीतिक परिपक्वता और गंभीरता को लेकर जो संदेह थे, वे सही थे. किसी पार्टी में रहना या नहीं रहना, एक अलग बात है लेकिन भाषा की मर्यादा बनी रहनी चाहिए.’

तो क्या प्रशांत किशोर वाकई राजनीतिक तौर परिपक्व नहीं हैं और उनमें राजनीतिक गंभीरता का अभाव है?

जिन लोगों ने पिछले दस सालों में देश में हुए राजनीतिक बदलावों को करीब से देखा है, वे इससे थोड़ी अलग राय रखते हैं. ऐसे लोगों का मानना है कि मर्यादित भाषा में अपने विरोधियों पर हमला करने वाले नेताओं के बजाए पिछले एक दशक में वैसे नेता न सिर्फ उभरे हैं बल्कि मजबूती से स्थापित भी हुए हैं, जिन्होंने अपने विरोधियों पर तीखे शब्दों में सीधा प्रहार किया है. अरविंद केजरीवाल ने बगैर किसी राजनीतिक अनुभव के नई पार्टी बनाई और पार्टी बनाने के कुछ ही महीने के अंदर दिल्ली के मुख्यमंत्री बन गए. नरेंद्र मोदी की शैली भी ऐसी ही रही है. गांधी परिवार, मनमोहन सिंह और कांग्रेस पर उन्होंने सीधा हमला बोलने की ही रणनीति 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान अपनाई थी. आंध्र प्रदेश में वाईएसआर कांग्रेस के जगन मोहन रेड्डी ने भी चंद्रबाबू नायडू के खिलाफ ऐसा ही किया था.

संभव है कि प्रशांत किशोर भी इसी रणनीति पर आगे बढ़ रहे हों. इस बात की संभावना इसलिए भी लगती है कि पार्टी से निकाले जाने के बाद प्रशांत किशोर ने पटना में जो प्रेस वार्ता की, उसमें उन्होंने नीतीश कुमार के बारे में कहा कि वे भाजपा के पिछलग्गू हो गए हैं, गुजरात के नेताओं के कहे मुताबिक पार्टी और सरकार चला रहे हैं, राजनीतिक लाभ के लिए किसी तरह का समझौता करने को तैयार हैं और मुख्यमंत्री बने रहने के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं.

नीतीश कुमार को पितातुल्य बताते हुए भी इस तरह की और भी कई बातें प्रशांत किशोर ने उनके बारे में कहीं. इससे साफ है कि नीतीश कुमार पर हमला करने के मामले में वे नरम पड़ने की रणनीति पर आगे नहीं बढ़ रहे हैं.

अब सवाल यह उठता है कि उनकी आगे की रणनीति क्या होगी? लेकिन इस पर चर्चा करने से पहले उनके अब तक के काम पर बात करना जरूरी है. चुनावी प्रबंधन में प्रशांत किशोर के साथ रहे पेशेवर लोगों और उन्होंने जिन पार्टियों के लिए काम किया है, उनके नेताओं से बात करने पर एक बात स्पष्ट है. वे राजनीतिक महत्वाकांक्षा वाले व्यक्ति हैं और उनके पास अपने राजनीतिक करियर को लेकर एक योजना है. लेकिन सार्वजनिक तौर पर यह अभी स्पष्ट नहीं है.

प्रशांत किशोर की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के बारे में कभी उनके साथ काम करने वाले एक व्यक्ति बताते हैं, ‘कुछ करीबी लोगों के साथ हुई बातचीत में प्रशांत किशोर स्वीकार करते हैं कि जो भी जिम्मेदारी उनके रास्ते में आएगी, उससे वे भागेंगे नहीं. वे साफ कहते हैं कि अगर उन्हें मुख्यमंत्री बनने का या प्रधानमंत्री बनने का अवसर मिलेगा तो वे पीछे हटने की सोच भी नहीं सकते. वे ये मानते हैं कि ऐसी इच्छा रखने में कोई बुराई नहीं है.’

जिन दलों के साथ उन्होंने काम किया है, उनमें से कुछ दलों के नेताओं से बात करने पर पता चलता है कि प्रशांत किशोर अक्सर दूसरे दलों में अपने संपर्कों का इस्तेमाल उस दल में अपनी स्थिति मज़बूत बनाने के लिए करते हैं जिसके लिए वे काम कर रहे होते हैं. यहां पर जेडीयू का एक उदाहरण दिया जा सकता है. जेडीयू के एक नेता मुंबई में ट्रेड यूनियन की राजनीति में सक्रिय हैं. कुछ समय पहले मुंबई में हुई बसों की हड़ताल में उनकी प्रमुख भूमिका मानी जाती है. बताया जाता है कि नीतीश कुमार को जब यह बात पता चली तो वे इससे काफी प्रभावित हुए. इसके बाद प्रशांत किशोर ने उन्हें यह प्रस्ताव दिया कि जेडीयू का तो मुंबई में कुछ नहीं है लेकिन अगर आप लोग चाहें तो मुंबई के उस ट्रेड यूनियन नेता को वे शिव सेना से टिकट दिला सकते हैं.

प्रशांत किशोर पर आरोप लगता है कि वे पैसे के लिए किसी भी पार्टी का काम कर सकते हैं लेकिन साथ ही वे विचारधारा की बात भी करते रहते हैं. इसका जवाब प्रशांत किशोर ने अपनी प्रेस वार्ता में दिया. वे कहते हैं कि 2014 में उन्होंने भाजपा के लिए काम किया लेकिन इसके बाद से वे लगातार भाजपा विरोधी पार्टियों के लिए ही काम करते रहे हैं. हालांकि, उनके इस जवाब को स्वीकार कर पाना उतना आसान भी नहीं है. उनके बारे में कहा जाता है कि वे शिव सेना को तब भी सलाह दे रहे थे जब वह भाजपा की सहयोगी थी. वे उसी जेडीयू के उपाध्यक्ष थे जो भाजपा की सहयोगी है और बिहार में दोनों पार्टियां मिलकर सरकार चला रही हैं.

प्रशांत किशोर के बारे में यह भी कहा जाता है कि वे दूसरों की छवि चमकाने का काम पेशेवर ढंग से तो करते ही हैं लेकिन अपनी छवि चमकाने के मामले में भी पीछे नहीं रहते. यही वजह है कि जिसके लिए भी वे काम करते हैं, उसके साथ अपनी नजदीकी को वे बेहद चतुराई से मीडिया और सोशल मीडिया के जरिए प्रचारित करते हैं. जिस दिन चुनाव के नतीजे आते हैं, उस दिन वे संबंधित पार्टी के शीर्षस्थ नेता के साथ अपनी तस्वीर जारी करते हैं और साथ ही अपनी टीम को बधाई देते हुए सफलता का श्रेय भी लेते हैं. प्रशांत किशोर के बारे में कहा जाता है कि मीडिया में अपनी मित्रता का इस्तेमाल वे इस बात के लिए भी करते हैं.

इस बारे में पटना के एक पत्रकार बताते हैं, ‘प्रशांत किशोर ऐसा सिर्फ चुनाव परिणामों के समय ही नहीं बल्कि और भी कई मौकों पर करते हैं. जिन पत्रकारों से उनके संबंध हैं, उनमें से अधिकांश लोगों की यह राय है कि प्रशांत किशोर सिर्फ काम करने में यकीन नहीं करते बल्कि यह सुनिश्चित करते हैं कि लोगों को यह भी पता चले कि यह काम उन्होंने किया है. इसके लिए वे मीडिया में अपने संबंधों का इस्तेमाल करते हैं. आम तौर पर पटना के पत्रकारों के पास प्रशांत किशोर का फोन तब ही आता है जब उनका कोई काम हो.’

वे आगे कहते हैं, ‘प्रशांत किशोर अपने बारे में चल रही खबरों को लेकर बेहद सजग रहते हैं. एक बार उनके बारे में पटना के एक स्थानीय समाचार चैनल में यह खबर चली कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के साथ काम करने के लिए उन्हें कितने पैसे मिल रहे हैं. प्रशांत किशोर ने उस चैनल के प्रमुख को फोन किया और कहा कि मेरी सेवाएं इतनी सस्ती नहीं हैं कि अगर मैं पैसे के लिए काम करुंगा तो इतने कम पैसे मुझे मिलेंगे. आप जो आंकड़ा चला रहे हैं, उसमें एक जीरो और जोड़ लीजिए.’

मीडिया में प्रशांत किशोर के संबंध दिल्ली के बड़े अंग्रेजी पत्रकारों से लेकर बिहार में जिला स्तर के स्ट्रिंगर्स तक से हैं. इस वजह से उनके पास सूचनाओं को हासिल करने का एक नेटवर्क है. इसका इस्तेमाल वे जिस पार्टी के लिए काम करते हैं, उसमें अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए करते हैं. इसका एक उदाहरण यहां दिया जा सकता है. बिहार के अरवल के एक पत्रकार इस घटना के एक पक्ष की जानकारी देते हैं और दूसरे पक्ष की जानकारी जेडीयू के एक नेता ने मिलती है.

प्रशांत किशोर को जेडीयू का उपाध्यक्ष बने महीने भर से थोड़ा ही अधिक वक्त हुआ होगा. उस समय एनडीए में भाजपा के सहयोगी रहे राष्ट्रीय लोकतांत्रिक समता पार्टी के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा के महागठबंधन में शामिल होने की चर्चा चली. इसी सिलसिले में उपेंद्र कुशवाहा और आरजेडी के तेजस्वी यादव के बीच अरवल के सर्किट हाउस में बैठक तय हुई. इस बैठक के लिए पटना से तेजस्वी यादव के निकलने के बाद इसकी जानकारी स्थानीय स्ट्रिंगर ने प्रशांत किशोर को एसएमएस करके दी. प्रशांत किशोर उस वक्त नीतीश कुमार के साथ थे. उन्होंने यह जानकारी तुरंत ही नीतीश कुमार को दी. इसके थोड़ी देर बाद कुशवाहा और तेजस्वी यादव की बैठक की खबर समाचार चैनलों पर आने लगी.

इन घटनाओं के उल्लेख से प्रशांत किशोर की राजनीतिक क्षमताओं का थोड़ा अंदाज होता है लेकिन यह भी समझना होगा कि राजनीतिक क्षमता और चुनावी प्रबंधन क्षमता में फर्क होता है. प्रशांत किशोर ने अत तक ऐसे नेताओं के लिए काम किया है जिनका जमीनी आधार रहा है. अब उन्हें बिहार में यह काम अपने लिए करना है. प्रशांत किशोर ने पटना की प्रेस वार्ता में जिस तरह की बातें कीं, उससे स्पष्ट है कि वे राजनीति में चुनावी हस्तक्षेप के रास्ते पर बढ़ रहे हैं.

इसके लिए उन्होंने ‘बात बिहार की’ के नाम से एक कार्यक्रम की शुरुआत की है. इसके तहत वे प्रखंड स्तर पर बिहार के विकास के रोडमैप को लेकर संवाद आयोजित करने जा रहे हैं. उनके मुताबिक़ उनकी कोशिश है कि कुछ समय में पंचायत स्तर के कम से कम 1,000 युवाओं की पहचान हो जो बिहार को देश के अग्रणी राज्यों में शामिल कराने के सपने के साथ काम करने के लिए प्रतिबद्ध हों. जून तक उन्होंने अपने अभियान के साथ 50 लाख युवाओं को जोड़ने का लक्ष्य रखा है. हालांकि, अभी उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया है कि वे जिस चुनावी हस्तक्षेप की ओर संकेत कर रहे हैं, वह चुनावी हस्तक्षेप वे 2020 में ही करेंगे या 2025 तक इंतजार करेंगे.

प्रशांत किशोर की बातों से यह भी लगता है कि वे प्रदेश के युवाओं को लक्षित करना चाह रहे हैं. इसके लिए संभवत: वे दो तरह की रणनीति पर काम कर रहे हैं. पहली यह कि जाति आधारित बिहार की राजनीति को ‘जाति न्यूट्रल’ बनाने की कोशिश हो. पिछले कुछ दशकों से बिहार में जो राजनीति चल रही है, उसमें किसी अगड़ी जाति के नेता का मुख्यमंत्री पद तक पहुंचना राजनीतिक तौर पर बेहद मुश्किल लगता है. प्रशांत किशोर जाति से ब्राह्मण हैं. उनके या किसी और अगड़ी जाति के नेता के मुख्यमंत्री पद तक पहुंचने के लिए यह जरूरी है कि बिहार की राजनीति ‘जाति आधारित’ से ‘जाति न्यूट्रल’ की ओर बढ़े.

उनकी दूसरी रणनीति यह है कि बिहार के विकास की तुलना नीतीश राज बनाम लालू राज न होकर बिहार बनाम अन्य राज्यों से हो. अपनी प्रेस वार्ता में उन्होंने यह साबित करने की कोशिश की भी कि भले ही लालू राज के मुकाबले नीतीश राज में बिहार में विकास हुआ हो लेकिन दूसरे राज्यों के मुकाबले यह बहुत कम है.

राजनीतिक जानकारों को लगता है कि इससे प्रशांत किशोर ‘लालू यादव के जंगलराज’ का मुद्दा गौण करना चाहते हैं. इससे एक तरफ तो लालू यादव के समर्थक वर्ग से लोगों को तोड़कर वे अपने साथ लाने की कोशिश कर सकते हैं. वहीं दूसरी तरफ लालू के जंगल राज का भय दिखाकर विकल्पहीनता की स्थिति तैयार करने वाले नीतीश कुमार के विकास की भी पोल खोलते हुए उनके समर्थक वर्ग में भी सेंध लगा सकते हैं.

बिहार के कुछ युवाओं से बात करने पर पता चलता है कि प्रशांत किशोर की बातें उन्हें पसंद आ रही हैं. ये लोग किसी खास जाति से संबद्ध नहीं हैं. लेकिन इन युवाओं के मन में भी यही संदेह है कि चुनावों के जो जमीनी समीकरण हैं, उसे प्रशांत किशोर कितना साध पाते हैं. क्योंकि बिहार के विकास का जो नया सपना वे बिहार के युवाओं और लोगों को दिखाना चाह रहे हैं, उसका पूरा होना इस बात पर निर्भर करेगा कि लोग इस पर यकीन करके इसे पूरा करने के लिए काम करने वाली सरकार बनाने के लिए वोट दें. इस काम में प्रशांत किशोर कितना कामयाब हो पाते हैं, यह अभी देखा जाना है.

इस रिपोर्ट में प्रशांत किशोर के बारे में जिन जानकारियों का जिक्र है, उन पर उनका पक्ष जानने और बिहार में उनकी राजनीतिक योजनाओं पर चर्चा करने के लिए उनसे बातचीत करने की काफी कोशिश की गई. फोन पर हुई बातचीत के बाद वे मिलकर बात करने को तैयार भी हुए. लेकिन जिस दिन मिलने की योजना थी, उन्होंने बताया कि वे किसी काम में व्यस्त हैं. अगर जल्द ही उनसे बात हो पाती है तो उनके पक्ष को एक अन्य रिपोर्ट या साक्षात्कार के रूप में सत्याग्रह पर प्रकाशित किया जाएगा.