इस 22 फ़रवरी पर रज़ा 98 वर्ष के हो गये होते. इस बार ख़ास बात यह है कि मंडला में, जो उनका घरू ज़िला है और जहां वे दफ़्न हैं, ज़िला प्रशासन ने एक कलावीथिका बनायी है जो रज़ा कलावीथिका के नाम से जानी जायेगी और जिसका लोकार्पण उसी दिन किया जा रहा है. रज़ा के नाम पर संसार में कहीं भी यह पहली वीथिका है. यह पहल की है मंडला के कलेक्टर जगदीश चंद्र जटिया ने जो असंग घोष नाम से हिंदी में किंचित् उग्र कवि हैं. इस पर जो भी ख़र्च आया है उसे विकास के लिए निर्धारित राशि से दिया गया है. रज़ा कला वीथिका में छोटी प्रस्तुतियों के लिए भी जगह है और वह जल्दी ही मंडला जैसे शहर में साहित्य और कला का अड्डा बन जायेगी. उसमें थोड़ी सी जगह में रज़ा के कुछ प्रसिद्ध चित्रों की सुंदर प्रतिकृतियां भी स्थायी रूप से प्रदर्शित रहेंगी. अनेक ज़िलों के पास ऐसी राशि होती है. अगर उनके प्रशासक थोड़े संवेदनशील और कल्पना-समृद्ध हों तो उनकी पहल पर ऐसे सांस्कृतिक अड्डे हर ज़िले के सदर मुकाम पर बनाये जा सकते हैं जहां ऐसी सुविधा नहीं है.

नगर पालिका के सहयोग से एक सड़क जिस पर कलेकटोरेट, जिला न्यायलय, कला वीथिका आदि स्थित हैं, रज़ा मार्ग हो गया है. उम्मीद यह भी है कि मंडला में देर-सबेर किसी सार्वजनिक स्थल पर मंडला के इस सपूत की आदमक़द मूर्ति भी लग जायेगी. रज़ा की एक सुंदर और सादी क़ब्र मंडला के मुस्लिम समुदाय के सद्भाव से पहले ही बन गयी है. रज़ा फ़ाउंडेशन ज़िला प्रशासन के सक्रिय सहयोग से वहां नर्मदा जयंती आदि के माध्यम से अनेक युवा शास्त्रीय कलाकारों की प्रस्तुतियां नियमित रूप से कर रहा है. रज़ा ने मंडला लगभग 90 वर्ष पहले छोड़ा था और अब वे दिवंगत होकर वहाँ एक उपस्थिति बन रहे हैं.

इधर दिल्ली में 17 फ़रवरी को रज़ा के अपनी फ्रेंच संगिनी के नाम लिखे मूल फ्रेंच में प्रेमपत्रों का मेधा सिंह द्वारा किया गया अंग्रेज़ी अनुवाद ‘आइ विल ब्रिंग माई टाइम’ भारत में फ्रांस के राजदूत इमेनुएल ल्ना द्वारा लोकार्पित किया गया है. वढ़ेरा गैलरी द्वारा रज़ा फ़ाउंडेशन के लिए प्रकाशित इस पुस्तक में अनेक फ़ोटोग्राफ़, मूल फ्रेंच में रज़ा की हस्तलिपि में कुछ पत्रों की छबियां शामिल की गयी हैं. वरिष्ठ चित्रकार अमिताव दास द्वारा संग्रहीत 9 कलाकारों की एक प्रदर्शनी ‘ज्ञात अज्ञात’ शीर्षक से श्रीधराणी कला वीथिका त्रिवेणी में शुरू हुई है. 25 को लखनऊ में रज़ा उत्सव के अंतर्गत नरेश सक्सेना, अष्टभुजा शुक्ल आदि कवियों का कविता-पाठ आयोजित है. मंडला में ‘मिट्टी के साथ’ शीर्षक से युवा छात्रों के लिए एक कर्मशाला होने जा रही है. दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर एनेक्स में ‘आज कविता’ शीर्षक से कविता पाठ और कृष्णा सोबती पर एक संवाद 18 फ़रवरी को आयोजित है.

रज़ा ने अपने संघर्ष के युवा दिनों को जीवन भर याद रखते हुए अपने साधनों से युवा पीढ़ी के कलाकारों-कवियों को समर्थन और मंच देने का जो सपना देखा था उसे सच बनाने की कोशिश अथक ढंग से चल रही है.

असहमति की विडंबना

असहमति और प्रश्नवाचकता को ज़रूरी लोकतांत्रिक अधिकार मानते हुए सर्वोच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश ने स्पष्ट किया है कि ऐसे अधिकार के प्रयोग को राष्ट्रविरोधी नहीं कहा-माना जा सकता. ऐसे वक्तव्य पहले भी दिये गये हैं पर सत्ताधारी शक्तियों पर उसका कोई प्रभाव पड़ा हो इसका कोई साक्ष्य नहीं है. बल्कि चुनावी उत्तेजना से अलग, उदाहरण के लिए तेज़ी से एक बर्बर प्रदेश बन रहे उत्तर प्रदेश में ऐसी असहमति और प्रश्नवाचकता को लेकर, पुलिस का खुल्लमखुल्ला दुरुपयोग करते हुए, नागरिकों के खिलाफ़ सख़्त कार्रवाई की जा रही है. सर्वोच्च न्यायालय के एक अन्य न्यायाधीश ने यह प्रश्न उठाया है कि क्या देश में क़ानून का शासन नहीं रह गया है? उत्तर प्रदेश के एक प्रशासनिक अधिकारी ने एक अल्पसंख्यक पर अभियोग दर्ज़ किया, खुद गवाही दी और उसे दंडित भी कर दिया. यह सब आकस्मिक नहीं हो सकता. सत्ता को, नागरिकों द्वारा चुनी गयी लोकतांत्रिक सत्ता को यह भयानक आत्मविश्वास हो गया है कि उसे नागरिक अधिकारों को सीमिति, लांछित, उल्लंघित करने की अपार और असीमित छूट है. इस मर्यादाहीन सत्ता के उच्च पदों पर आसीन मंत्री आदि भी भाषा में अभूतपूर्व हिंसा, आक्रामकता, घृणा, भेदभाव आदि बरत रहे हैं और उनको इसके लिए कोई दंड देने का सवाल ही नहीं उठ रहा है.

स्वयं न्यायालयों की भूमिका इस प्रसंग भी बहुत चिंताजनक हो गयी है. ख़ासकर निचले न्यायालय बुरी तरह से सांप्रदायिक हो चले हैं और सत्ता के भक्त भी. उन्हें अपनी स्वतंत्रता, संविधान के लिए प्रतिबद्धता और निष्पक्षता का कोई बोध नहीं रह गया है. कोई लाज-शरम बाक़ी नहीं. न्यायालयों से ऐसे अनेक मामलों में पुलिस को फटकार भी मिलती रहती है पर उससे उसके गर्हित आचरण में कोई सुधार नहीं आता. इस समय पुलिस सत्ता का सबसे घृणित उपकरण हो चुकी है और उसे इस अलोकतांत्रिक भूमिका को लेकर कोई बेचैनी नहीं है. क़ानून और व्यवस्था से निपटने के नाम पर, इन दिनों, पुलिस बर्बरता और बेरहमी कर, स्वयं क़ानून और व्यवस्था का उल्लंघन कर रही है, ऐसी स्थिति बना रही है. दिल्ली पुलिस ने झूठ बोला कि वह जामिया मिलिया के पुस्तकालय में नहीं गयी उसके वहां घुसने और शांति से पढ़ रहे छात्रों पर लाठी बरसाने का वीडियो इन दिनों वायरल हो रहा है.

इसी दिल्ली पुलिस की गृह मंत्री ने प्रशंसा की है. कुछ दिन पहले महाराष्ट्र उच्च न्यायालय ने कहा कि मतदाता पहचान पत्र नागरिकता का सबूत भी है. आज असम न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि ऐसा पहचान पत्र नागरिकता का प्रमाण नहीं है. कर्नाटक में एक नाटक खेलने के लिए पुलिस ने छोटे बच्चों से पूछताछ की और उनमें से कुछ को हिरासत में ले लिया. महाराष्ट्र में किसी स्कूल में बच्चियों को प्रेम-विवाह न करने की शपथ दिलायी गयी है और गुजरात में बच्चियों की माहवारी की जांच करने के लिए उन्हें उघारा गया है. राजनीति, प्रशासन, पुलिस, न्यायालय असहमति की विडंबना को तीख़ा कर रहे, बढ़ा रहे हैं. ऐसे माहौल में असहमत होना जोखिम का काम है पर उसे उठानेवालों की संख्या कम नहीं है.

अफ्रीका की भारतीय समझ

यह कहना ग़लत न होगा कि अफ्रीका को लेकर भारत में जो व्यापक समझ है वह बेहद सतही और ज़्यादातर पश्चिमी समझ से निर्धारित होती रही है. हम अकसर सारे अफ्रीका को एकतान मानते हैं जबकि उसमें 50 से अधिक देश हैं. हमें अपनी बहुलता पर, उचित ही, गर्व होता रहता है पर हमें अफ्रीकी बहुलता की न तो पहचान है, न परवाह. बावजूद इसके कि बीसवीं शताब्दी में, विशेष कर अफ्रीकी संगीत ने, विश्व संगीत को भारतीय संगीत से कहीं अधिक प्रभावित किया है, हमें इसको ख़बर नहीं. आम भारतीयों के अफ्रीकियों के साथ व्यवहार में जब-तब बेरुख़ी या नकारात्मक पूर्वग्रह ज़ाहिर होते रहे हैं. पश्चिम की तरह हम भी उसे कुल मिलाकर अंधेरा महाद्वीप ही मानते रहे हैं.

इन आधारहीन अवधारणाओं का प्रत्याख्यान करने और अफ्रीका की सही तसवीर खींचने के कुछ प्रयत्न भी, सौभाग्य से, बौद्धिक स्तर पर होते रहे हैं. उस कड़ी में एक ताज़ा प्रयत्न पिछले सप्ताह इंडिया इंटरनेशनल सेंटर ने किया जहां तीन दिनों का एक परिसंवाद ‘अंडरस्टेंडिंग अफ्रीका: कन्टीन्युनिटी एंड चेंज’ विषय पर आयोजित किया जिसमें भारत के अलावा कई अफ्रीकी देशों के विशेषज्ञों ने भाग लिया. संगीत, कला और सिनेमा पर एकाग्र एक सत्र की अध्यक्षता का सुयोग मिला. एक कहावत है, अफ्रीकी, जिसमें कहा गया है कि तब तक शेर अपना इतिहास नहीं लिखते तब तक शिकार की कहानी में शिकारी का महिमामंडन किया जाता रहेगा. अनेक अफ्रीकी आवाज़ों को सुनकर लगा कि अब शेर अपना इतिहास लिख रहे हैं.

यूरोप ने अफ्रीका के बहुत बड़े हिस्से को अपना उपनिवेश बनाया. अकसर ऐसे संवादों में उत्तर औपनिवेशिकता का ज़िक्र होता है. मैंने यह याद दिलाने की कोशिश की भारत और अफ्रीका संसार की दो प्राथमिक सभ्यताएं हैं और उन्हें उपनिवेशवाद और उसके पहले और आगे के बारे में सोचना-सुमिरना चाहिये. इसका प्रमाण कई बार मिला कि जब अफ्रीका कई तरह से अपनी जातीय स्मृति जगा-सक्रिय कर रहा है. इसकी अपनी अनेक ज्ञान-परम्पराएं अब ध्यान के केंद्र में आ रही हैं और स्वयं अपनी स्थिति, परम्परा, नियति की उनकी समझ अब नयी दिशाओं में मुड़ रही है. यह बात याद रखने की है कि आधुनिक पश्चिमी संगीत, नृत्य, ललित कलाओं आदि में अफ्रीकी प्रभाव रहा है और उसने इन क्षत्रों में मूलगामी परिवर्तन की ओर इन कलाओं को प्रेरित किया है. अपने एक स्मरणीय वक्तव्य में बेनिन के एक विद्वान् ओलाबीयी बाबालोला जोसेफ़ याई ने परिसंवाद का उद्घाटन करते हुए कहा कि भूमंडल को फिर मानवीय बनाने के लिए, चालू भूमंडलीकरण के विरुद्ध एक नकारात्मक भूमंडलीयता की दरकार है, जो भूमंडल का ग्रामीकरण करे. गांधी आज होते तो इस विचार का समर्थन करते.