अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने पहले भारत दौरे पर पहुंच रहे हैं. दो दिन की उनकी यात्रा की शुरुआत अहमदाबाद से होगी. इसके बाद वे आगरा में ताजमहल का दीदार करने के बाद नई दिल्ली पहुंचेंगे.

भारत और अमेरिका के बीच बीते काफी समय से संबंध (खासकर व्यापारिक संबंध) काफी उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं. इसकी वजह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियां हैं. ट्रंप ने सत्ता में आने के बाद भारत से अपना व्यापार घाटा कम करने के मकसद से उसके आयात पर भारी शुल्क लगा दिया. उन्होंने न केवल भारत से आने वाले स्टील और एल्युमिनियम पर टैक्स लगाया बल्कि उसे तरजीही व्यापार व्यवस्था (जीएसपी) से भी बाहर कर दिया.

कुछ विकासशील देशों के लिए बनायी गयी इस व्यवस्था के तहत भारत को अमेरिका में 2,000 उत्पादों को बिना किसी शुल्क के निर्यात करने की छूट मिली हुई थी. 2017 में इस व्यवस्था के चलते भारत को 5.7 अरब डॉलर के उत्पादों पर शुल्क में छूट मिली थी, और वह अमेरिका की इस विशेष नीति का सबसे बड़ा लाभार्थी बना था.

पिछले सालों में अमेरिका से तनावपूर्ण व्यापारिक संबंधों के चलते ही डोनाल्ड ट्रंप की यात्रा से भारत को उम्मीद थी कि वे अब उसे कुछ रियायत देंगे. लेकिन इस यात्रा से महज दस रोज पहले अमेरिका ने भारत को व्यापारिक मोर्चे पर एक और बड़ा झटका दे दिया. उसने विकासशील देशों की सूची से उसे बाहर कर दिया.

भारत को विकासशील देशों की सूची से बाहर होने का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि इससे उसके जीएसपी की सूची में फिर से शामिल होने की उम्मीदों पर पूरी तरह पानी फिर गया. भारत उम्मीद लगाए बैठा था कि ट्रंप की यात्रा के दौरान वह कम से कम जीएसपी में दोबारा शामिल हो जाएगा. लेकिन अपनी यात्रा से कुछ दिन पहले ही डोनाल्ड ट्रंप ने ऐसा हो पाने की संभालना खत्म कर दी.

इसके बावजूद भारत को अमेरिकी राष्ट्रपति की यात्रा के दौरान एक बड़े व्यापार समझौते की उम्मीद थी. लेकिन डोनाल्ड ट्रंप ने अपने दौरे से महज एक हफ्ते पहले इस पर भी पानी फेर दिया. अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा, ‘हम इस बार भारत के साथ कोई समझौता कर सकते हैं, लेकिन कोई बड़ा समझौता बाद में ही होगा...भारत ने हमारे साथ बहुत अच्छा व्यवहार नहीं किया है, लेकिन मैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को काफी पसंद करता हूं.’

भारतीय विदेश मंत्रालय ने बीते शुक्रवार को डोनाल्ड ट्रंप के भारत दौरे से जुडी जानकारी साझा की. मीडिया से बातचीत के दौरान जब पत्रकारों ने मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार से पूछा कि ट्रंप की भारत यात्रा के दौरान कितने समझौतों पर दस्तखत होंगे तो उनका कहना था कि पांच सहमति-पत्रों पर अभी चर्चा चल रही है जिसमें एक बौद्धिक संपदा से जुड़ा है. उन्होंने कहा कि मोदी-ट्रंप वार्ता में एच1बी वीजा से जुड़े विषय पर भी बातचीत हो सकती है.

विदेश मंत्रालय की इस प्रेस कांफ्रेंस से दो बातें साफ़ गई. पहली भारत-अमेरिका के बीच कोई ऐतिहासिक या बड़ा समझौता नहीं होने जा रहा है. दूसरी दौरे से महज पांच दिन पहले विदेश मंत्रालय को भी इस बात की जानकारी नहीं है कि दोनों देशों के बीच कौन से समझौते होंगे.

यात्रा का मकसद आखिर क्या है?

भारत को लेकर व्यापार के मामले में डोनाल्ड ट्रंप के रुख और भारतीय विदेश मंत्रालय की ओर से दी गयी जानकारी के बाद बड़ा सवाल यह है कि आखिर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भारत यात्रा का मकसद क्या है और क्या इससे भारत को कोई फायदा होगा?

अमेरिका की राजनीति पर नजर रखने वाले जानकार कहते हैं कि डोनाल्ड ट्रंप की इस यात्रा का मकसद वही है, जो बीते सितम्बर में अमेरिका के ह्यूस्टन शहर में हुए ‘हाउडी मोदी’ कार्यक्रम का था. इसमें करीब 50,000 भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिक शामिल हुए थे. एक विशाल स्टेडियम में हुए इस कार्यक्रम को नरेंद्र मोदी और डोनाल्ड ट्रंप दोनों ने संबोधित किया था. इस कार्यक्रम में मोदी परोक्ष रूप से भारतीय मूल के लोगों से डोनाल्ड ट्रंप को वोट देने की अपील करते दिखे थे. नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण के बीच में ‘अबकी बार, ट्रंप सरकार’ का नारा भी दिया था. इस कार्यक्रम से यह सन्देश गया था कि ‘हाउडी मोदी’ कार्यक्रम का मकसद नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के जरिये भारतीय-अमेरिकियों को ट्रंप के समर्थन में लामबंद करना था.

जानकारों की मानें तो सोमवार से शुरू हो रही डोनाल्ड ट्रंप की दो दिवसीय भारत यात्रा का मुख्य उद्देश्य भी यही है. ये लोग कहते हैं कि डोनाल्ड ट्रंप के इस दौरे पर समझौतों और नीतियों की कहीं चर्चा नहीं है. जो बात सुर्ख़ियों में है वह यह कि नरेंद्र मोदी और डोनाल्ड ट्रंप अहमदाबाद के मोटोरा स्टेडियम में एक लाख से ज्यादा लोगों की जनसभा को संबोधित करेंगे.

इन जानकारों का मनाना है कि डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के जरिये अमेरिका में रह रहे 45 लाख भारतीयों को अपने पक्ष करना चाहते हैं. वे भारतीयों के बीच नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता को अच्छे से समझते हैं और इसीलिए वे हर मंच पर नरेंद्र मोदी की तारीफ़ करते दिखते हैं. बीते हफ्ते भी उन्होंने जब भारत से कोई बड़ा व्यापारिक समझौता न होने खबर दी थी तो बड़ी चालकी से भारत की आलोचना की और मोदी की तारीफ़. उन्होंने कहा, ‘भारत ने हमारे साथ बहुत अच्छा व्यवहार नहीं किया है, लेकिन मैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को काफी पसंद करता हूं.’

नरेंद्र मोदी को सचेत रहने की जरूरत

बीते सितम्बर में ‘हाउडी मोदी’ कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के परोक्ष रूप से अमेरिकी चुनाव में डोनाल्ड का समर्थन करने को कई जानकारों ने गलत बताया था. इन लोगों का कहना था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का डोनाल्ड ट्रंप को समर्थन करना, किसी दूसरे देश के घरेलू चुनावों में हस्तक्षेप न करने के विदेश नीति के एक महत्वपूर्ण सिद्धांत का उल्लंघन है. भारत के अमेरिका की दोनों राजनीतिक पार्टियों (रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक) के साथ एक जैसे संबंध रहे हैं. ऐसे में एक सार्वजनिक मंच से किसी एक पार्टी को समर्थन देना हमारे दीर्घकालिक रणनीतिक हितों के लिहाज से भी ठीक नहीं है. भारत को इसके चलते भविष्य में कुछ नुकसान भी उठाने पड़ सकते हैं.

जानकारों के मुताबिक अगर नरेंद्र मोदी यह मान कर भी चल रहे हैं कि डोनाल्ड ट्रंप ही अगला चुनाव जीतेंगे और इससे भारत को फायदा मिलेगा, तो ऐसा सोचना एक बड़ी गलती करने जैसा है. क्योंकि पहले तो ऐसा होना ही जरूरी नहीं है. और फिर अगर यह हो भी गया तो यह जरूरी नहीं है कि ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के साथ ही अमेरिकी संसद में भी उन्हीं की पार्टी का बहुमत हो जाए. अमेरिकी राष्ट्रपति को भले ही दुनिया का सबसे ताकतवर शख्स माना जाता हो, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उसके पास अनंत अधिकार हैं. याद रखना चाहिए कि अमेरिकी लोकतंत्र में राष्ट्रपति को नियंत्रण में रखने के लिए वहां की संसद को भी कई अधिकार दिए गए हैं. विदेश संबंध किस तरह से चलाने हैं, यह वहां की संसद पर भी निर्भर करता है.

यही वजह है कि न सिर्फ अमेरिका बल्कि भारत के जानकारों ने भी डोनाल्ड ट्रंप की भारत यात्रा के दौरान नरेंद्र मोदी को सचेत रहने और ‘हाउडी मोदी’ कार्यक्रम जैसी गलती न दोहराने की सलाह दी है.

मोदी सरकार द्वारा मोटोरा स्टेडियम में कराये जा रहे ‘नमस्ते ट्रंप’ को भी कुछ जानकार सही नहीं ठहराते. इनके मुताबिक भारत सरकार को इससे बचना चाहिए था. ये लोग जर्मनी में हुई एक घटना का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि 2008 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में बराक ओबामा राष्ट्रपति पद के प्रबल दावेदार नजर आ रहे थे, लेकिन फिर भी जर्मन चांसलर एंजेला मर्केल ने उन्हें चुनाव से पांच महीने पहले बर्लिन के प्रतिष्ठित ‘ब्रैंडेनबर्ग गेट’ पर कार्यक्रम की अनुमति नहीं दी थी. इस कार्यक्रम में ओबामा अपनी विदेश नीति पर बोलने वाले थे. अनुमति न मिलने के बाद यह कार्यक्रम बर्लिन में किसी और जगह पर आयोजित किया गया था. जानकार कहते हैं कि एंजेला मर्केल ने ऐसा इसलिए किया था क्योंकि वे नहीं चाहती थीं कि अमेरिका की रिपब्लिकन पार्टी के नेताओं के बीच उन्हें लेकर कोई गलत संदेश जाए.