चंद्रमा एक बार फिर बहुत चर्चा में है. भारत के प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह ने पिछले दिनों कहा कि भारत ‘चंद्रयान-2’ की आंशिक विफलता से निराश नहीं है, बल्कि 2020 में ‘चंद्रयान-3’ भेजने की तैयारी कर रहा है. भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने इसकी पुष्टि करते हुए बताया कि ‘चंद्रयान-3’ की उड़ान के साथ-साथ भारत की पहली समानव अंतरिक्ष उड़ान के अंतरिक्षयात्रियों को प्रशिक्षण देने का काम भी अब शुरू हो गया है. ‘गगनयान’ नाम के इस अभियान के लिए जिन चार भावी अंतरिक्षयात्रियों को चुना गया है, उन्हें रूस में प्रशिक्षित किया जायेगा. ‘गगनयान’ से इसरो 2022 तक तीन अंतरिक्षयात्रियों को एक सप्ताह के लिए पृथ्वी की परिक्रमाकक्षा में भेजना चाहता है. ‘चंद्रयान-3’ एवं ‘गगनयान’ के अनुभव देर-सवेर भारतीय अंतरिक्षयात्रियों की पहली चंद्रयात्रा का मार्ग भी सुगम करेंगे.

दिसंबर 1972 के बाद से किसी धरतीवासी ने चंद्रमा पर पैर नहीं रखा है. अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी ‘नासा’ की ओर से वह रात के समय पहली और चंद्रमा की दिशा में अंतिम उड़ान थी. यान था अपोलो-17. तारीख़ थी 7 दिसंबर 1972. यात्री थे यूजीन सेर्नन, रॉन इवैन्स और हैरिसन श्मिट. चंद्रमा के पास पहुंचने के बाद इवैन्स परिक्रमा यान में बैठे रहे, जबकि सेर्नन और श्मिट अवतरणयान से 11 दिसंबर को चंद्रमा पर उतरे.

चंद्रमा की अंतिम यात्रा सबसे लंबी थी

किसी खुली जीप जैसे एक रोवर में बैठ कर चंद्रमा पर विचरण करने की, उसकी परिक्रमा कक्षा में रह कर उसके फेरे लगाने की और वहां की धूल-मिट्टी व कंकड़-पत्थर जमा कर पृथ्वी पर लाने की यह सबसे लंबी यात्रा थी. अब तक के अंतिम चंद्रयात्रियों ने वहां तीन दिनों में कुल मिलाकर 34 किलोमीटर की दूरी तय की. 110 किलो धूल-मिट्टी व कंकड़-पत्थर जमा किये. 14 दिसंबर 1972 को वे अपोलो-17 से पृथ्वी पर वापसी के लिए चले. तब से अब तक किसी भी देश की और कोई नयी समानव चंद्रयात्रा नहीं हुई है.

रोवर पर सवार अपोलो-17 के यात्री यूजीन सर्नेन | नासा

लेकिन जल्द ही एक बार फिर चंद्रमा पर जाने और इस बार वहां लंबे समय तक रहने की तैयारियां शुरू हो गयी हैं. विश्व भर के अब तक के अंतरिक्षयात्रियों का दिसंबर 2019 के अंत में वॉशिगटन में एक महामिलन हुआ था. चंद्रमा पर दुबारा वापसी इस महामिलन में चर्चा का मुख्य विषय बनी. अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के प्रमुख जिम ब्राइडनस्टीन ने घोषित किया, ‘’हमारा लक्ष्य है पांच वर्षों में चंद्रमा पर पुनः उतरना और 2028 से वहां लगातार बने रहना.’’

पहली बार एक महिला भी चंद्रमा पर जायेगी

वस्तव में नासा ने चंद्रमा ही नहीं, वहां से मंगल ग्रह पर आते-जाते रहने के भी एक ऐसे कार्यक्रम का म़ॉडल अभिकल्पित किया है, जिसमें अंतरिक्षयात्रा संबंधी साज़-सामान, उपकरण एवं रॉकेट बनाने वाली अमेरिकी कंपनियों के साथ-साथ यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी ‘ईएसए’, जापानी एजेंसी ‘जेएएक्सए’ और कनाडाई एजेंसी ‘सीएसए’ को भी शामिल किया गया है. ‘आर्तेमीस’ नाम की एक यूनानी पौराणिक देवी के नाम वाले इस अभियान के अंतर्गत, 2024 -25 तक, पहली बार एक महिला और एक पुरुष को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतारा जायेगा.

नासा का समझना है कि विभिन्न देशों की अंतरिक्ष अनुसंधानी व्यावसायिक कंपनियों और सरकारी एजेंसियों के बीच भागीदारी वाला य़ह अंतरराष्ट्रीय मॉडल चंद्रमा पर लंबे समय तक मनुष्य की उपस्थिति संभव बनाने और बस्ती बसाने की दिशा में एक निर्णायक क़दम सिद्ध हो सकता है. ‘आर्तेमीस’ की सफलता इस बात को भी संभव बनायेगी कि भविष्य में कभी चंद्रमा पर से ही मंगल ग्रह पर आना-जाना सरल और सस्ता हो जायेगा.

नवंबर 2020 में पहली परीक्षण उड़ान

वॉशिगटन में हुए अंतरिक्षयात्रियों के महामिलन में नासा के प्रमुख का कहना था कि इस दिशा में पहला क़दम उठाते हुए, यथासंभव नवंबर 2020 में ही, चंद्रमा की दिशा में पहली मानव-रहित परीक्षण उड़ान होगी. फ्लोरिडा के ‘केनेडी स्पेस सेंटर’ में इसकी तैयारी चल रही है. चंद्रमा पर दुबारा पहुंचने के लिए एक नये रॉकेट के साथ-साथ नये प्रकार का एक ऐसा कैप्सूल या मॉड्यूल भी डिजाइन किया गया है जिसमें अंतरिक्षयात्रियों के रहने-बैठने और अपने साथ विभिन्न प्रकार की सामग्रियां लाने-ले जाने की सुविधा होगी.

‘ओरायन’ नाम के इस स्पेसक्राफ्ट का डिज़ाइन नासा और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी ‘ईएसए’ ने मिलकर बनाया है. उसके लिए आवश्यक इंजन सहित उसमें उपलब्ध की जाने वाली सुविधाओं के निर्माण की ज़िम्मेदारी यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी ‘ईएसए’ को सौंपी गयी है. यूरोपीय विमान निर्माता कंपनी एयरबस इन चीज़ों का निर्माण जर्मनी में करेगी.

प्रबल संभावना यही है कि ‘ओरायन’ की पहली परीक्षण चंद्र-उड़ान, बिना किसी अंतरिक्षयात्री के, 2021 में होगी. किसी अंतरिक्षयात्री के बिना 2022 में वह पहली बार चंद्रमा की परिक्रमा करेगा. ऐसे ही कुछ और परीक्षणों के बाद, यदि सब कुछ पूरी तरह संतोषजनक रहा, तो 2024 में अंतरिक्षयात्रियों को लेकर ‘ओरायन’ पहली बार चंद्रमा पर पहुंचेगा.

नासा-प्रमुख ने वॉशिगटन में एकत्रित अंतरिक्षयात्रियों से कहा कि इस बार हम चंद्रमा पर पहुंच कर वहां डेरा डालना चाहते हैं. वहां अपना एक अड्डा बनाना चाहते हैं. भविष्य में वहीं से मंगल ग्रह की दिशा में उड़ानें संचालित करना चाहते हैं. 1998 से पृथ्वी से क़रीब 408 किलोमीटर दूर रह कर अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन ‘आईएसएस’ इस समय जिस तरह पृथ्वी की निरंतर परिक्रमा कर रहा है, नासा की योजना है कि वैसा ही एक स्टेशन चंद्रमा की परिक्रमाकक्षा में भी स्थापित किया जायेगा. उसे ‘गेटवे’ (प्रवेशद्वार) नाम दिया गया है.

गेटवेहोगा पहला चंद्र-स्टेशन

‘गेटवे’ को, समय के साथ, चंद्रमा का चक्कर लगा रहे क्रमशः एक ऐसे विशाल अड्डे (स्टेशन) का रूप दिया जायेगा, जिससे चंद्रमा के हर इलाके में आना-जाना आना-जाना आसान हो जाएगा. भविष्य के चंद्रयात्री किसी फेरीयान में बैठकर चंद्रमा पर कभी भी उतर सकेंगे और काम के बाद पुनः ‘गेटवे’ पर लौट सकेंगे. वही उनका घर या होटल होगा. इस प्रकार वे बार-बार पृथ्वी पर लौटे बिना चंद्रमा पर अधिक समय बिता सकेंगे.

चंद्रमा की परिक्रमा कर रहे गेटवे स्पेस स्टेशन के पास जाता हुआ ओरायन स्पेसक्राफ्ट | नासा

‘गेटवे’ की सहायता से चंद्रयात्री चंद्रमा के उत्तरी या दक्षिणी ध्रुव के पास वाली उन जगहों पर उतर सकेंगे, जहां काफ़ी मात्रा में पानी होने का अनुमान है. पानी न केवल पीने और जीवित रहने के लिए चाहिये, सौर ऊर्जा की सहायता से उसके विद्युत-अपघटन द्वारा ऑक्सीजन और हाइड्रोजन गैस भी प्राप्त की जा सकती है. ऑक्सीजन सांस लेने के लिए चाहिये और हाइड्रोजन ईंधन के काम आयेगी.

दो सप्ताह दिन, दो सप्ताह रात

चंद्रमा का अपना कोई वायुमंडल नहीं होने से वहां हवा नहीं है. लगभग दो सप्ताह तक लगातार दिन का उजाला रहता है और दो सप्ताह तक रात का अंधेरा. किंतु उसके दोनों ध्रुवों पर लगभग सारे समय उजाला रहता है. चंद्रमा की मिट्टी में मिले सिलिकॉन के उपयोग से सूर्य-प्रकाश को बिजली में बदलने वाले सौरफलक सीधे वहीं बनाये जा सकते हैं.

चंद्रमा की निरंतर परिक्रमा करने वाला ‘गेटवे’ स्टेशन इस तरह का बना होगा कि अमेरिका और यूरोप के ही नहीं, रूस, चीन या भारत जैसे अन्य देशों के चंद्रयान भी उसके साथ संयोजन (डॉकिंग) कर सकेंगे और उनके चंद्रयात्री भी उसका उपयोग कर सकेंगें. यह सुविधा ऐसी व्यावसायिक कंपनियों के लिए भी उपलब्ध रहेगी, जिनकी चंद्रमा पर खनिजों की खुदाई में, वहां कारखाने लगाने में या कोई दूसरा उपयोगी काम करने में दिलचस्पी होगी.

अनेक प्रकार के खनिज

चंद्रमा की मिट्टी सीमेंट जैसी है. समझा जाता है कि इस मिट्टी के ईंटों से वहां घर बनाये जा सकते हैं. लोहे, अल्यूमीनियम, टाइटेनियम, सिलिकॉन, कैल्शियम, मैग्नेशियम और ‘रेयर अर्थ’ कहलाने वाले कई दुर्लभ खनिज पदार्थ वहां होने के संकेत मिले हैं. इन खनिजों के अतिरिक्त वहां हीलियम गैस के ‘हीलियम-3’ नाम के आइसोटोप (समस्थानिक) की मात्रा इतनी अधिक होने का अनुमान है कि उससे वहां परमाणु बिजलीघर चलाये जा सकते हैं.

हीलियम-3 को सर्वोत्तम परमाणु ईंधन माना जाता है. पृथ्वी पर वह बहुत ही दुर्लभ है. चंद्रमा पर वह सौर आंधियों के साथ पहुंचता है और उसकी ज़मीन में संचित हो जाता है. चंद्रमा पर स्थित धूल में, जिसे ‘रिगोलिथ’ कहा जाता है, लगभग 45 प्रतिशत तक ऑक्सीजन होने का अनुमान है. इन धूलकणों में बंधे ऑक्सीजन के अणुओं को मुक्त करके शुद्ध ऑक्सीजन गैस प्राप्त करने के वैज्ञानिकों के पास कम से कम 20 अलग-अलग तरीके हैं.

चंद्रमा की धूल स्वास्थ्य के लिए हानिकारक

‘रिगोलिथ’ धूलकणों के साथ एक समस्या भी है. चंद्रमा पर बहते पानी और बहती हवा के न होने से वे आपस में रगड़ खाकर गोलाकार होने के बदले बहुत नुकीले किस्म के महीन कण होते हैं. उन्हें स्वास्थ्य के लिए हानिकारक पाया गया है. चंद्रमा पर जा चुके अमेरिकी अंतरिक्षयात्रियों ने बताया कि उन्हें वहां गले में ख़राश, छींक आने और आंखें बहने की शिकायत होती थी. चंद्रमा पर विचरण करने वाले 12वें अंतरिक्षयात्री हैरिसन श्मिट ने तो वहां ऐसी छींकें आने और नाक बहने की शिकायत की, मानो उन्हें ज़ुकाम हो गया था.

चंद्रमा पर मौजूद यह धूल हालांकि सिर से पैर तक के पूरी तरह वायुरोधी (एयरटाइट) अंतरिक्ष सूट से होकर नाक तक नहीं पहुंच सकती. किंतु समस्या तब पैदा होती थी, जब चंद्रयात्री बाहर घूमने-फिरने के बाद अपने यान में लौटते थे. घूमने-फिरने के दौरान ये धूल कण उनके अंतरिक्ष सूट व साथ के उपकरणों पर चिपक कर यान में पहुंच जाते थे और वहां सिरदर्द बन जाते थे. पृथ्वी पर लायी गयी चंद्रमा की मिट्टी और धूल में कोई पौधे उगाने के प्रयास भी सफल नहीं सिद्ध हुए हैं. धूलकणों का नुकीलापन पौधों की जड़ों वाली कोशकाओं को इतना क्षतिग्रस्त कर देता है कि पूरा पैधा कुछ दिनों बाद निर्जीव हो जाता है.

नया स्पेस सूट

अब तक एक और समस्या ऐसी थी, जो खुले अंतरिक्ष में और चंद्रमा पर भी चलने-फिरने और काम करने में काफ़ी बाधक हो रही थी अंतरिक्षयात्रियों का ‘स्पेस सूट.’ वह इतना भारीभरकम और असुविधाजनक होता है कि उसे पहनने के बाद अंतरिक्षयात्री स्वाभाविक ढंग से चल-फिर या काम नहीं कर सकते. अक्टूबर 2019 में नासा ने अंतरिक्षयात्रियों के लिए ऐसे दो नये, हल्के और कहीं अधिक लचीले स्पेस सूट पेश किये, जिन में ‘आर्तेमीस’ अभियान के अंतर्गत पांच साल बाद चंद्रमा पर जाने वाली पहली महिला और पहले पुरुष को दुनिया देखेगी. जब वे चंद्रमा की ऊपरी सतह पर चल-फिर रहे होंगे, तब सफ़ेद-नीले रंग का स्पेस सूट पहने दिखेंगे. जब उड़ान के दौरान ‘ओरायन’ में या चंद्रमा की परिक्रमा कर रहे स्टेशन ‘गेटवे’ में होंगे, तब केसरिया रंग के सूट में दिखेंगे.

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नासा द्वारा जारी नये स्पेससूट्स का वीडियो

दोनों प्रकार के नये सूट वातानुकूलित हैं और सिर के हेल्मेट के साथ जुड़े हैं. अब तक के स्पेस सूट 1969 से चल रहे थे. उन्हें पहनने के बाद हाथ ऊपर उठा सकना बहुत ही मुश्किल और सीमित था. नये सूट की आस्तीन और कंधे के बीच ‘बॉलबियरिंग’ वाले ऐसे छल्ले हैं, जिनके कारण बाहों को असानी से घुमाया और हाथ ऊपर की तरफ उठाया जा सकता है. नये सूट में कमर के पास का हिस्सा ऐसा है कि नीचे पड़ी किसी चीज़ को उठाने के लिए झुका भी जा सकता है. अब तक के सूट में ऐसा संभव नहीं था.

यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी ‘ईएसए’ के अध्यक्ष यान व्यौर्नर कुछ समय पहले तक जर्मन अंरिक्ष अनुसंधान एजेंसी ‘डीएलआर’ के प्रमुख हुआ करते थे. वे बहुत प्रसन्न हैं कि अंतरराष्ट्रीय भागीदारी को आमंत्रित करने की नासा की नयी नीति से न केवल यूरोपीय वैज्ञानिकों के लिए बल्कि यूरोपीय कंपनियों के लिए भी शोध और कमाई के नये अवसर बनेंगे. उनका मानना है कि इस खुलेपन के द्वारा ‘’चंद्रमा पर बस्ती बसाने के प्रयासों में हम सारी दुनिया को एकसाथ ला सकते हैं.’’

कहने की आवश्यकता नहीं कि देर-सवेर भारत भी इस खुलेपन का लाभ उठा सकता है. ‘गेटवे’ भारत के भावी चंद्रयात्रियो के लिए भी चंद्रमा पर पहुंचने का प्रवेशद्वार बन सकता है.