देश भर में सीएए-एनआरसी के खिलाफ ज़ारी प्रदर्शनों को दो महीने से ज्यादा का वक्त बीत चुका है. पिछले कुछ दिनों से शाहीन बाग जहां सुप्रीम कोर्ट के प्रतिनिधियों से बातचीत को लेकर चर्चा में था तो जामिया मिलिया इस्लामिया, दिसंबर में वहां हुई हिंसा के वीडियो सार्वजनिक होने से सुर्खियां बटोर रहा था. इन सबके अलावा प्रदर्शनकारियों पर हमले की खबर भी बीच-बीच में आ रही थीं. इस सबके बीच जब 24 फरवरी को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत आये तो वह निर्विवादित ऐसा मौका था, जब राजनीति, प्रशासन, पुलिस, मीडिया और आम लोगों तक सभी एकराय थे कि इस दौरान दिल्ली या देश के किसी भी हिस्से में सीएए के समर्थन या विरोध में कोई भी अप्रिय घटना नहीं होनी चाहिए. लेकिन इसके बाद भी ट्रंप के आने से ठीक एक दिन पहले दिल्ली के कुछ इलाकों में शुरू हुई हिंसा उनके जाने तक अपने चरम पर पहुंचती दिखाई दी. अब तक इसमें मरने वालों का आंकड़ा 42 तक पहुंच चुका है. 200 से ज्यादा लोग घायल हैं.

जैसा कि शुरूआती खबरों में बताया गया था कि हिंसा सीएए के समर्थन और विरोध में प्रदर्शन करने वाले लोगों की अपसी भिड़ंत का परिणाम थी. इसे किसने शुरू किया, अगर इस सवाल को छोड़ दिया जाए तो भी यहां पर दिल्ली पुलिस अपने सबसे बुरे चेहरे के साथ हमारे सामने आती है. पहला सवाल तो यही उठता है कि अगर यह दो गुटों के बीच हुआ संघर्ष था तो पुलिस ने सीएए समर्थक गुटों को विरोधी गुटों तक पहुंचने क्यों दिया? वह भी तब, जब डोनाल्ड ट्रंप अगले दिन दिल्ली पहुंच रहे थे. अगर जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्रों को राजघाट तक जाने से बलपूर्वक रोका जा सकता है तो फिर उन इलाकों की सुरक्षा चाक-चौबंद क्यों नहीं की गई जहां सीएए के विरोध में धरने चल रहे थे?

इसके अलावा, सोमवार को मौजपुर और जाफराबाद से आए कई ऐसे वीडियो हैं जिनमें पुलिस के साथ कई आम लोग भी दिखाई देते हैं. ये लोग किसी पीस मीटिंग का हिस्सा नहीं थे बल्कि पुलिस के आसपास तसल्ली से पथराव करते नजर आ रहे थे. इनमें से कई बीच-बीच में ‘जय श्रीराम’ और ‘दिल्ली पुलिस ज़िंदाबाद’ के नारे लगाते भी दिखते हैं. इससे पता चलता है कि ये सीएए समर्थक (या सरकार समर्थक भी) थे और शायद पुलिस उनकी समर्थक थी.

हालांकि इससे यह साबित नहीं होता कि हिंसा की शुरूआत सीएए समर्थकों ने की थी. लेकिन अगर यह काम सीएए विरोधियों का था तो पुलिस ने उन्हें नियंत्रित क्यों नहीं किया. या फिर उनसे निपटने के लिए वह दंगास्थलों पर अकेले क्यों नहीं गई? पुलिस के साथ यहां पर सीएए समर्थकों के होने और दूसरे समूह पर पथराव करते दिखने का क्या मतलब हो सकता है? जब ऐसा हो रहा था तब पुलिस ने उन्हें रोकने में कोई तत्परता क्यों नहीं दिखाई? अब अगर मानने को यही मान लिया जाए कि इस भीड़ में नज़र आ रहे लोग, सादी वर्दी में पुलिस वाले ही थे तो फिर हिंसा नियंत्रित होने की बजाय दंगों में क्यों बदल गई? ये सब सवाल पूछते हुए उन वीडियोज का जिक्र यहां पर छोड़ दिया गया है, जहां पुलिस डंडे और लातों के दम पर प्रदर्शनकारियों को राष्ट्रगान गाना सिखा रही है!

साल 2015 के आंकड़े बताते हैं कि दिल्ली में पुलिस बल की संख्या लगभग 85 हजार है. इनमें से दस हजार को स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप और वीवीआईपी-वीआईपी सुरक्षा जैसे मंत्रालय, निवास, एम्बेसी आदि के लिए इस्तेमाल किया जाता है. यानी इसके बाद बचे लगभग 75 हजार पुलिसकर्मियों पर दिल्ली के नागरिकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी है. इसके अलावा, दिल्ली पुलिस देश में उपलब्ध सबसे बेहतरीन तकनीक, नेटवर्क और बाकी सुविधाओं से भी लैस है. इतना सब होने के बावजूद वह अपने शहर के एक कोने में हो रही हिंसा को रोकने में असमर्थ दिखती है. इससे भी बुरा यह है कि ऐसा करने के साथ-साथ वह एक विशेष पक्ष की तरफ खड़ी भी दिखाई देती है.

यहां पर सड़क पर खड़े पुलिसकर्मी की मजबूरी फिर भी समझी जा सकती है. हो सकता है, उसके पास उचित कार्रवाई करने के आदेश ना रहे हों जिसके इंतज़ार में वह चुपचाप खड़ा या केवल लाठियां भांजता ही नज़र आता है. लेकिन यही बेचारगी पुलिस के उच्च-अधिकारियों से लेकर गृह मंत्रालय तक के रवैये में भी दिखाई देती है. वह भी तब जब गृहमंत्री और उनकी सरकार को मजबूत और कड़े फैसले लेने के लिए जाना जाता है.

यहां पर इस बात का भी जिक्र करते चलते हैं कि जब भी पुलिस को दिल्ली सरकार के अधीन करने की बात कही जाती है, हमेशा ऐसा न करने के लिए कई महत्वपूर्ण और जायज़ कारणों को गिनाया जाता है: मसलन, दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र है, तमाम महत्वपूर्ण लोगों और विदेशी नागरिकों की उपस्थिति के चलते इसकी सुरक्षा संवेदनशील मुद्दा भी है. सुरक्षा व्यवस्था गृह मंत्रालय के जिम्मे होने पर केंद्रीय एजेंसियों के साथ उसका तालमेल बेहतर होगा. जबकि मामला राज्य से जुड़ने पर इसमें थोड़ा वक्त लग सकता है. लेकिन जब सही मायनों में संवेदनशील परिस्थितियां सामने आईं तो ऐसा देखने को नहीं मिला. यहां तक कि स्थिति को नियंत्रण में रखने का निर्देश देने भर में गृहमंत्री को 24 घंटे से ज्यादा का वक्त लग गया और सही मायनों में काबू करने में तीन दिन.

पुलिस और गृह मंत्रालय के साथ-साथ यह घटना मोदी सरकार की भी छीछालेदर करवाने वाली है. पहली वजह तो यही है कि घटना के ठीक एक दिन पहले भाजपा नेता कपिल मिश्रा भड़काऊ बातें करते नज़र आए थे. साथ ही, इन दंगों की जमीन दिल्ली चुनावों के दौरान ही तैयार हो गई थी. कई लोग मानते हैं कि दिल्ली चुनावों के दौरान ‘गोली मारो…’ जैसें हिंदु-मुस्लिम ध्रुवीकरण के प्रयास भले ही उसके नतीजों को न बदल पाये हों लेकिन उन्होंने कई लोगों के मन में बहुत-बहुत सारा जहर भर के उसके इस्तेमाल का साहस और उत्साह तो दे ही दिया था. इसे एक न एक दिन तो बाहर आना ही था. यह और बात है कि यह ऐसे मौके पर बाहर आया जिसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की उस छवि को धूल में मिला दिया जिसे बनाने का प्रयास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले साढ़े पांच सालों से बड़े जतन से कर रहे हैं.

इस हिंसा के चलते, छह सालों में बनी उनकी वह छवि धूल में मिलती नज़र आती है जो उन्होंने देश-देश जाकर गढ़ी है. इसके चलते, अंतर्राष्ट्रीय मीडिया 2002 के गुजरात दंगों को लगभग भूल चुका था और केवल नई नीतियों और फैसलों के लिए उनकी प्रशंसा-आलोचना करने लगा था. लेकिन उनके प्रयासों को उनके समर्थकों ने ही धो डाला है और दिल्ली की हिंसा ने एक बार फिर से गुजरात दंगों के भूत को भी जिंदा कर दिया है. और इस बार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी न तो अनुभवहीनता का बहाना कर सकते हैं, न ही सरकार के कमजोर होने का तर्क दे सकते हैं और न ही यह कह सकते हैं कि जनता उनकी बात नहीं सुनती है.