स्विट्ज़रलैंड के दावोस शहर में हर वर्ष जनवरी में होने वाला ‘विश्व आर्थिक फ़ोरम’ दुनिया भर के राजनेताओं और अर्थशास्त्रियों का सबसे बड़ा अनौपचारिक शिखर सम्मेलन कहा जा सकता है. यही ख्याति जर्मनी के म्युनिक नगर में 1963 से हर वर्ष फ़रवरी में होने वाले अनौपचारिक विश्व सुरक्षा सम्मेलन की भी है. 14 से 16 फ़रवरी तक चले इस बार के 56वें सम्मेलन में 35 देशों के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री, क़रीब सौ रक्षा, विदेश या अन्य मंत्री तथा साढ़े तीन सौ अन्य विशिष्ट जनों ने भाग लिया. भारत के विदेशमंत्री एस जयशंकर भी म्यूनिक में थे. उन्होंने पश्चिमी जगत के साथ बहुपक्षीय सहयोग के विषय पर अपने विचार व्यक्त किये.
अमेरिकी नेतृत्व वाला ‘उत्तर एटलांटिक संधि संगठन’ यानी नाटो, यूरोप और अमेरिका के बीच बहुपक्षीय सहयोग पर आधारित एक ऐसा ही सुरक्षा-गठबंधन है. उसके 29 सदस्य देशों में से 27 यूरोपीय देश अब तक यह मान कर निश्चिंत रहा करते थे कि जब तक अमेरिका है, तब तक कोई उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता. ये यूरोपीय देश सपने में भी नहीं सोच रहे थे कि अमेरिका में कभी कोई ऐसा राष्ट्रपति भी आ सकता है, जो नाटो की छत्रछाया तले पूर्णरूपेण सुरक्षित होने के सुनहरे सपनों वाली मीठी नींद हराम कर देगा. अमेरिका में जब से डोनाल्ड ट्रम्प राष्ट्रपति बने हैं, उसके यूरोपीय मित्रों की रातें करवटें बदलते बीत रही हैं. अमेरिका के सबसे प्रखर प्रशंसक रहे जर्मन नेताओं की नींद कुछ अधिक ही हराम हो गयी दिखती है.
यूरोप वालों की अपनी सुरक्षा-चिंतांए
यही कारण है कि म्युनिक के सम्मेलन में इस बार वैश्विक सुरक्षा से अधिक यूरोप वालों की अपनी सुरक्षा-चिंतांए अपूर्व प्रमुखता से छायी रहीं. इन चिंताओं का उद्घोष जर्मनी के राष्ट्रपति फ्रांक-वाल्टर श्टाइनमायर ने सम्मेलन के अपने उद्घाटन भाषण के साथ ही कर दिया. अमेरिका की अप्रत्याशित रूप से खुलकर आलोचना करते हुए उन्होंने कहा, ‘’हमारे सबसे घनिष्ठ साथी अमेरिका की इस समय की सरकार अंतरराष्ट्रीय सामुदायिकता के विचार को खुद ही ठोकरें मार रही है.’’ इसके कुछ उदाहरण देते हुए जर्मन राष्ट्रपति ने ईरान के साथ हुए बहुपक्षीय परमाणु समझौते को अमेरिका द्वारा रद्द घोषित कर देने और विश्व व्यापार संगठन ‘डब्ल्यूटीओ’ के विवाद निपटाने वाले पंचाट के लिए अपना कोई जज न भेज कर उसे पंगु बना देने जैसे क़दमों का उल्लेख किया.
राष्ट्रपति बनने से पहले जर्मनी के विदेश मंत्री रहे फ्रांक-वाल्टर श्टाइनमायर को, अमेरिका का वर्तमान डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन, अब एकीकृत और शक्तिशाली यूरोप का विरोधी नज़र आता है. उन्हें लगता है कि अमेरिका और यूरोपीय संघ के बीच एक गहरी दरार पड़ गयी है. उससे पैदा हो रही असुरक्षा के लिए उन्होंने एक बिल्कुल नया शब्द भी गढ़ लिया है –– ‘वेस्टलेसनेस.’ अंग्रेज़ी के ‘रेस्टलेसनेस’ शब्द की तर्ज़ पर गढ़े गये इस नये कृत्रिम शब्द का प्रयोग उन्होंने इस अभिप्राय से ‘पश्चिम के विलोपीकरण’ के अर्थ में किया है कि पश्चिमी जगत की साख अब विलुप्त होने की हद तक क्षीण हो रही है.
अमेरिका को आड़े हाथों लिया
जर्मनी में भी अलिखित नियम यही रहा है कि देश के राष्ट्रपति राजनैतिक भाषणबाज़ी नहीं करते. विदेश नीति के मामले में तो बिल्कुल नहीं. पर कुछ ही समय पहले तक जर्मनी के विदेशमंत्री रहे और तब इस तरह की भाषा से परहेज़ करने वाले फ्रांक-वाल्टर श्टाइनमायर ने म्युनिक में अमेरिका को आड़े हाथों लेने में कोई कसर नहीं छोड़ी. अमेरिका पर उन्होंने आरोप लगाया कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय से लगातार मुंह मोड़ते हुए वह ‘’वैश्विक राजनीति को अधिकाधिक विध्वंसकारी गतिशीलता प्रदान कर रहा है... एक शांतिपूर्ण विश्व के निर्माण के उद्देश्य से अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाने वाले अपने लक्ष्य से हम वर्ष-प्रतिवर्ष दूर हटते जा रहे हैं.’’
जर्मन राष्ट्रपति ने अपने भाषण में रूस और चीन को भी नहीं बख़्शा. रूस के बारे में उन्होंने कहा कि उसने ‘’सैन्य बल प्रयोग द्वारा सीमाएं ज़बर्दस्ती खिसकाने-सरकाने को एक बार फिर अपनी राजनीति का हथकंडा बना दिया है.’’ उनका इशारा यूक्रेन की तरफ़ था. वहां रूसी-भाषियों के बहुमत वाले रूस से सटे दोनबास को यूक्रेन से अलग करने के लिए सशस्त्र संघर्ष चल रहा है. इसी प्रकार चीन के बारे में जर्मन राष्ट्रपति ने कहा कि उसे अंतरराष्ट्रीय क़ानून की याद ‘’चुन-चुन कर केवल तब आती है, जब इससे उसे अपना हितसाधन होता दिखता है.’’
जर्मनी का राष्ट्रीय हित यूरोप की एकता में है
श्टाइनमायर का मानना है दुनिया में हर तरफ़ राष्ट्रवाद भले ही बढ़ रहा है, जर्मनी का राष्ट्रीय हित इसी में है कि वह अपने राष्ट्रवाद को यूरोप के हित में समाहित कर दे और यूरोप को ही अपनी विदेश नीति का केंद्रबिदु बनाये. उनके शब्दों में, ‘’दुनिया में टिके रहने के लिए यूरोप ही जर्मनी का मुख्य सहारा है.’’ जर्मनी का ही अब यह भी कर्तव्य है कि वह यूरोप को एकजुट रखे. यूरोप महाद्वीप के देशों को एकसूत्र में पिरोने वाला यूरोपीय संघ यदि बना रहता है और साथ ही यदि अधिक शक्तिशाली भी बनता है, तो यह जर्मनी के ही व्यापक हित में होगा.
जर्मनी के राष्ट्रपति ने एक तरफ़ तो अमेरिका को खरी-खोटी सुनायी, दूसरी तरफ़ उसकी इस मांग का समर्थन भी किया कि नाटो के सदस्य यूरोपीय देशों को अपने रक्षा-बजट बढ़ाने चाहियें. अमेरिका चाहता है कि नाटो के सदस्य देश अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का कम से कम दो प्रतिशत अपनी सेनाओं को आवंटित करें. 2014 के नाटो शिखर सम्मेलन में यही तय भी हुआ था. अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा भी नाटो के यूरोपीय देशों को इसकी याद दिलाया करते थे.
जर्मनी ने 2019 के अपने रक्षा-बजट के लिए अपनी जीडीपी का केवल 1.38 प्रतिशत ही ख़र्च किया है. 2024 तक वह इस अनुपात को 1.5 प्रतिशत तक बढ़ाना चाहता है. दो प्रतिशत वाले लक्ष्य पर 2031 से पहले पहुंच पाना संभव नहीं माना जाता. जर्मन राष्ट्रपति का कहना था कि अपना रक्षा-बजट बढ़ा कर जर्मनी नाटो के यूरोपीय स्तंभ को ही मज़बूत करेगा, हालांकि उसे इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि सैन्य-क्षमता कूटनीतिक और राजनैतिक कार्यक्षमता पर हावी न हो जाये.
फ्रांस के राष्ट्रपति ने भी कहा, ‘’पश्चिम कमज़ोर’’ हो रहा है
जर्मन राष्ट्रपति के समान ही फ्रांस के राष्ट्रपति इमानुएल माक्रों ने भी कहा कि ‘’पश्चिम कमज़ोर’’ हो रहा है. उन्होंने भी अमेरिका को पश्चिम की कमज़ोरी के लिए दोषी ठहराया. माक्रों ने कोई लिखित भाषण नहीं दिया, बल्कि हॉल में बैठे राजनेताओं, कूटनीतिज्ञों व विशेषज्ञों के प्रश्नों के लगभग एक घंटे तक उत्तर देते हुए अपनी बातें कहीं. म्यूनिक के रक्षा सम्मेलन में यह अपने ढंग का एक अपवाद था. ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से अलग हो जाने के बाद अब फ्रांस ही यूरोपीय संघ की एकमात्र परमाणु शक्ति है.

माक्रों ने अमेरिका के बारे में कहा कि वह ‘’पिछले कुछ वर्षों से एक प्रकार से पीछे हट रहा है और यूरोप के साथ अपने संबंधों पर पुनर्विचार कर रहा है.’’ यूरोप वालों को आगाह करते हुए उन्होंने कहा, ‘’यूरोप के लिए अब सच्चाई को स्वीकार करने की घड़ी आ गयी है.’’ अन्य शक्तियां इस बीच ऊपर उठी हैं, ‘’लोकतंत्रों के पास उनसे निपटने लायक कोई एन्टीबॉडी (रोगप्रतिकारक) नहीं हैं.’’
फ्रांस यूरोपीय संघ की सार्वभौमता चाहता है
फ्रांसीसी राष्ट्रपति चाहते हैं कि यूरोपीय संघ के पास यथासंभव अपनी सेना और अपना एक अच्छा-ख़ासा रक्षा बजट होना चाहिये. अमेरिका या नाटो के साथ सहयोग की उपेक्षा किये बिना अपनी एक अलग रक्षा और विदेश नीति होनी चाहिये. उन्हें कुढ़न होती है कि सितंबर 2017 में अपने एक भाषण में उन्होंने जिस नये, एकीकृत, सार्वभौम और लोकतांत्रिक यूरोप के निर्माण का सुझाव दिया था, उसके बारे में जर्मनी ने पहले तो लंबे समय तक कुछ नहीं कहा और बाद में एक अनमने ढंग की प्रतिक्रिया ही दिखायी.
माक्रों के शब्दों में, ‘’जर्मनी और फ्रांस यदि पहल करने का कोई जोखिम नहीं उठाना चाहते, तो हम आगे नहीं बढ़ सकते.’’ फ्रांसीसी राष्ट्रपति आज के ढीले-ढाले यूरोपीय संघ को संभवतः ‘संयुक्त राज्य अमेरिका’ जैसा एक कसा हुआ संघात्मक देश बनता देखना चाहते हैं. जबकि जर्मनी ही नहीं, यूरोपीय संघ के कई अन्य देश भी इसके लिए अभी तैयार नहीं हैं.
जर्मनी और फ्रांस नया युद्धक विमान बनायेंगे
एक अन्य प्रश्न का उत्तर देते हुए फ्रांसीसी राष्ट्रपति ने कहा कि जर्मनी और फ्रांस मिलकर एक नया युद्ध-टैंक और छठी पीढ़ी का एक नया बहुउद्देशीय युद्धक विमान (फ्यूचर कॉम्बैट एयर सिस्टम – एफ़सीएएस) बनाने जा रहे हैं. राष्ट्रपति माक्रों के शब्दों में, ‘’कुछ साल पहले यह बात सोची भी नहीं जा सकती थी.’’ यहां यह बताना अप्रासंगिक नहीं होगा कि द्वितीय विश्वयुद्ध में पराजित जर्मनी को युद्धक विमान बनाने के अधिकार से वंचित होना पड़ा था.1990 में विभाजित जर्मनी के एकीकरण के बाद उसे अपनी अधिकांश प्रभुसत्ता क्रमशः वापस मिली है. तब भी कई मामलों में उसे फूंक-फूंक कर चलना पड़ता है.
आज भी स्थिति यह है कि जर्मनी के एकीकरण के तीन दशक बाद भी इस देश में 11 अमेरिकी सैनिक अड्डे हैं. क़रीब 37 हज़ार अमेरिकी सैनिक यहां तैनात हैं और एक अज्ञात संख्या में अमेरिकी परमाणु अस्त्र भी मौजूद हैं. जर्मनी के रामश्टाइन में अमेरिका के बाहर उसका सबसे बड़ा वायुसैनिक अड्डा है और यहीं अमेरिकी वायुसेना का यूरोपीय मुख्यालय भी है. रामश्टाइन से ही मध्यपूर्व और अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी हवाई हमलों का संचालन और समन्वय होता है. अमेरिका के हज़ारों सैनिक फ़रवरी के आरंभ में अपने भारी हथियारों के साथ जर्मनी से होकर ही पूर्वी यूरोप के उन देशों में पहुंचे हैं, जहां इस समय नाटो का अब तक का संभवतः सबसे बड़ा युद्धाभ्यास हो रहा है.
अमेरिकी विदेश मंत्री का उत्तर
म्यूनिक के विश्व सुरक्षा सम्मेलन में अमेरिका के विदेश मंत्री माईक पोम्पियो भी आये थे. उन्होंने जर्मनी और फ्रांस के राष्ट्रपतियों के कथनों का सीधे-सीधे उत्तर नहीं दिया. इसके बदले कुछ ऐसे चुने हुए उदाहरण दिये, जिनके द्वारा वे यह सिद्ध करना चाहता थे कि अमेरिका अपनी अंतरराष्ट्रीय ज़िम्मेदारियों से मुंह नहीं मोड़ रहा है. उन्होंने कहा कि यूरोपीय संघ की रूस से लगने वाली पूर्वी सीमा पर अमेरिका के हज़ारों सैनिक तैनात हैं. सीरिया में अल-बगदादी के आतंकवादी इस्लामी स्टेट (आईएस) से लड़ने के लिए बने अंतरराष्ट्रीय गठबंधन की सफलता में अमेरिका का निर्णायक योगदान रहा है. वही इस समय रूस के विरुद्ध यूक्रेन के भी हाथ मज़बूत कर रहा है.
पोम्पियो ने अपील की कि ‘’हमें अपने (नाटो) गठबंधन के प्रति विश्वास रखना चाहिये.’’ उनका तर्क था कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था में जो सकारात्मक उठाव आया है, वह भी इस बात का प्रमाण है कि पश्चिमी देशों की एकजुटता काम कर रही है,’’पश्चिम जीत रहा है.’’ पश्चिम के बीच सहयोग के लुप्त होने जैसी बातों का कोई तुक नहीं है.
स्वाभाविक है अमेरिकी विदेशमंत्री यही सब कहते. सच्चाई यह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने यूरोपीय संघ के विरुद्ध भी जिस प्रकार का व्यापार-युद्ध छेड़ रखा है, यूरोप वालों के लिए अकेले वही अमेरिका की प्रतिबद्धता पर संदेह करने के लिए काफ़ी है.
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