23 और 26 फरवरी के बीच उत्तरी-पूर्वी दिल्ली में हुई हिंसा की जो कहानियां सामने आ रही हैं, उससे एक सवाल दिमाग में बार-बार उठता है: प्रशासन ने – चाहे वो दिल्ली पुलिस हो या गृह मंत्रालय या प्रधानमंत्री कार्यालय – जल्द से जल्द दंगा प्रभावित इलाकों में पहुंचकर शांति बहाल करने की कोशिश क्यों नहीं की?

मंगलवार देर रात हालात को काबू में करने की पूरी जिम्मेदारी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल को सौंपी गई. तब तक सबकुछ दिल्ली पुलिस के हाथ में था, जो कि गृह मंत्री अमित शाह के अधीन है.

बुधवार की सुबह अजित डोभाल ने सुरक्षाबलों के साथ दिल्ली की गलियों का दौरा किया. उन्होंने लोगों को यकीन दिलाया कि ‘जो हुआ सो हुआ, अब वैसा कुछ नहीं होगा.’ उसी दिन पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने उन इलाकों में फ्लैग मार्च किया जहां रविवार रात से शुरू हुई हिंसा अगले दो दिनों तक लगातार जारी रही थी. तब तक, जैसा कि तमाम मीडिया रिपोर्ट्स और मरने वालों की हर दिन बढ़ती संख्या से जाहिर है, देश की राजधानी के कई इलाके बाहरी लोगों से कटे रहे. क्योंकि वहां तक पहुंचने वाली सड़कों पर हिंसक भीड़ का कब्जा था.

प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, मीडिया रिपोर्ट्स और हिंसा के वीडियो से साफ है कि पुलिस या तो बेपरवाह थी या फिर भीड़ को काबू करने में पूरी तरह असमर्थ. कई जगहों पर तो वह खुद ही हिंसा में शरीक नजर आई.

हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ‘दंगा रोकने वाले साजो-सामान से लैस सैंकड़ों पुलिसकर्मी चुपचाप पत्थरबाजी और आगजनी देखते रहे, उन्होंने भीड़ को हटाने की कोई कोशिश नहीं की. भीड़ के मुकाबले कम तादाद में मौजूद ये पुलिस के जवान हाथ बांध कर खड़े रहे जबकि उपद्रवी मकानों और दुकानों में आग लगाते रहे.’

इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक अन्य रिपोर्ट पूरे हालात को और बेहतर ढंग से बयां करती है:

‘गोकलपुरी का टायर मार्केट तीन दिनों तक जलता रहा और फुटपाथ पर बैठा एक कॉन्सटेबल आग बुझाते दमकल कर्मचारियों को देखता रहा. मंगलवार को वह मार्केट के मुहाने पर खड़ा तब भी सबकुछ देख रहा था जब हाथों में डंडे लिए बाइक सवार लोग नारे लगाते हुए वहां से गुजर रहे थे. एक ही रात में आखिर क्या बदल गया, इसका उसके पास यह जवाब था कि “रात को ऊपर से ऑर्डर आ गया... अब सब शांत है.”’

भारत में यह सोच आम है कि अगर प्रशासन नहीं चाहे तो कोई दंगा नहीं हो सकता, कम-से-कम कई दिनों तक तो बिलकुल भी नहीं. हालांकि दिल्ली पुलिस ने पुरजोर तरीके से मीडिया में आई उन रिपोर्ट्स को खारिज किया जिनमें हालात पर काबू करने के लिए संसाधनों की कमी या पुलिस की काबिलियत पर सवाल उठाए गए थे.

खुद गृह मंत्री अमित शाह ने भी, मंगलवार दोपहर को इस मामले में सर्वदलीय बैठक करने के बाद, यह निष्कर्ष निकाला कि हालात पर नियंत्रण करने के लिए सेना को बुलाने की कोई जरूरत नहीं है. लेकिन हिंसा में कोई कमी नहीं आई. गुरुवार दोपहर तक दंगों में मरने वालों की तादाद 34 तक पहुंच चुकी थी और शुक्रवार शाम तक यह संख्या बढ़कर 41 हो गई.

ये दोनों बातें अपने आप में ही विरोधाभासी हैं. गृह मंत्रालय दावा कर रहा था कि स्थिति नियंत्रण में है. और अब तक मौत का आंकड़ा 41 के ऊपर पहुंच चुका है.

कई मीडिया रिपोर्ट्स से साफ है कि हिंसा की कुछ घटनाएं मंगलवार रात और बुधवार सुबह हुईं, गृह मंत्री अमित शाह की सर्वदलीय बैठक के बाद. तो क्या स्थिति वाकई नियंत्रण में थी जैसा कि वे दावा कर रहे थे? सवाल यह है कि अर्धसैनिक बलों की तैनाती और उनके फ्लैग मार्च में बुधवार सुबह तक का वक्त क्यों लग गया?

एक पूर्व पुलिस कमिश्नर के मुताबिक सुरक्षाबल ‘संसाधनों की कमी की शिकायत नहीं कर सकते और न ही वे किसी और को इसके लिए जिम्मेदार ठहरा सकते हैं, खास तौर पर तब जब मामला कानून-व्यवस्था को लागू करने का हो.’

लॉ एंड ऑर्डर बहाल करने में नाकामी की तीन संभावित वजहें हो सकती हैं, और इनमें से कोई भी ऐसी नहीं जो व्यवस्था में हमारा भरोसा बनाये रखने में जरा भी मदद करती हो.

डोनाल्ड ट्रंप की यात्रा

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सोमवार सुबह भारत आए और देश की राजधानी में अच्छा खासा समय बिताने के बाद मंगलवार रात यहां से चले गए. इसके ठीक बाद राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल को हालात संभालने की पूरी जिम्मेदारी दे दी गई और बुधवार सुबह तक वे कुछ हद तक कानून-व्यवस्था सुधारने में कामयाब रहे. क्या दिल्ली का सुरक्षा महकमा जिम्मेदारियों की बोझ की वजह से राजधानी के हालात से निपटने में नाकाम रहा? अगर ऐसा है तो यह दिल्ली की क़ानून-व्यवस्था की किस तरह की छवि को हमारे सामने रखता है?

पूरी तरह नाकाम

दिल्ली पुलिस की जिम्मेदारी - जो कि अमित शाह और गृह मंत्रालय के कंधों पर है - अजित डोभाल को सौंपे जाने से - जो कि प्रधानमंत्री कार्यालय के अंतर्गत काम करते हैं – राजधानी में जितने मुंह उतनी बातें शुरू हो गईं. क्या इसका मतलब यह है कि अमित शाह हालात पर नियंत्रण करने में सक्षम नहीं थे और उन्होंने हिंसा को काबू में करने के लिए गलत फैसले लिए? या, उन्होंने सोच-समझकर उन इलाकों में सुरक्षा मजबूत नहीं करने का फैसला लिया?

जान-बूझकर की गई कार्रवाई

हिंसा के ज्यादातार मामलों में कहा जा रहा है कि आग भारतीय जनता पार्टी के नेता कपिल मिश्रा ने लगाई, जिन्होंने रविवार को पुलिस को चुनौती देते हुए कहा कि अगर अधिकारियों ने नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ सड़क पर चल रहे धरना-प्रदर्शनों को खत्म नहीं कराया तो वे हालात को अपने हाथों में ले लेंगे. यह धमकी उन्होंने एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के सामने दी थी.

द टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट कहती है कि दिल्ली पुलिस ने कपिल मिश्रा के बयान के बाद रविवार को छह अलर्ट भेजे थे ‘जिनमें हिंसा की आशंका जताते हुए सुरक्षा इंतजाम कड़े करने की मांग की गई थी’. साफ है हिंसा को लेकर पुलिस के बेखबर होने की दलील में कोई दम नहीं है. खास तौर पर तब जब पुलिस खुद कुछ जगहों पर हिंसा में शामिल नजर आई.

हफिंग्टन पोस्ट की यह ग्राउंड रिपोर्ट दावा करती है कि हिंसक भीड़ का इस्तेमाल कर नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ प्रदर्शनों को खत्म कराया गया. यह हिंसा राजधानी के उन इलाकों में हुई जहां भारतीय जनता पार्टी ने इस महीने हुए विधानसभा चुनाव में सबसे ज्यादा सीटें हासिल की. ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या केंद्र सरकार हिंसा को रोकने के कोई प्रयास कर भी रही थी?