भारत नब्बे के दशक में जिन आतंकवादी घटनाओं का गवाह रहा, लगभग उन सभी के पीछे खालिस्तानी या कश्मीरी विद्रोही गुटों के सदस्यों का हाथ था. पश्चिमी देशों के विपरीत हम अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी नेटवर्क के निशाने पर नहीं थे. लेकिन इसी दशक में ऐसी तीन घटनाएं भी हुई जिन्होंने आखिरकार इस भ्रम को तोड़ दिया.

इनमें सबसे पहली थी नई दिल्ली में जॉर्डन के राजदूत की हत्या. 1983 में की गई इस हत्या के पीछे फिलस्तीन के विद्रोही संगठन रिवॉल्यूशनरी ऑर्गेनाइजेश ऑफ सोशलिस्ट मुस्लिम और उसके मुखिया अबु निडाल का हाथ था. निडाल उस समय तक अमेरिका और अरब देशों सहित दुनिया भर में दो सौ से ज्यादा आतंकवादी हमले करवा चुका था.

इस संगठन ने भारत में जिस दूसरी घटना को अंजाम दिया उसके बाद यह साबित हो गया कि अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी यहां भी विदेशी लोगों को निशाना बना सकते हैं. 1984 में निडाल के संगठन से जुड़े लोगों ने मुंबई स्थित ब्रिटेन के उप-उच्चायुक्त पर्सी नॉरिस की गोली मारकर हत्या कर दी थी. नॉरिस चूंकि ब्रिटेन के उप-उच्चायुक्त थे इसलिए इस घटना ने पूरे अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का ध्यान अपनी ओर खींचा. इसी के साथ भारत में सरकार सहित पहली बार सुरक्षा एजेंसियों ने सार्वजनिक तौर पर यह मान लिया कि अबु निडाल और उसके आतंकवादी नेटवर्क के निशाने पर भारत आ चुका है.

भारत से जुड़ी तीसरी घटना जो इस संगठन ने अंजाम दी थी वह है पैन अमेरिकन वर्ल्ड एयरवेज के एक विमान का अपहरण. यह 1986 की बात है. इस एयरवेज का एक विमान मुंबई से चला था और उसे कराची होकर न्यूयॉर्क जाना था. इस विमान का कराची में अपहरण कर लिया गया. अपहरणकर्ता विमान को अमेरिका ले गए. यहां एक कमांडो ऑपरेशन के बाद अपहर्ताओं को पकड़ लिया, लेकिन इस पूरी कार्रवाई में कई भारतीय यात्री मारे गए.

अबु निडाल इसके बाद कई सालों तक सक्रिय रहा, लेकिन भारत में उसके संगठन ने फिर कोई आतंकवादी घटना नहीं की. बाद में निडाल 2002 में ईराक की एक जेल में मृत पाया गया था.