इस 26 फ़रवरी 2020 को रायपुर के रविशंकर विश्वविद्यालय में मैंने दीक्षांत समारोह में भाषण दिया. विश्वविद्यालय में मेरा दीक्षांत हुए अब लगभग छह दशक हो चुके हैं. उसके काफ़ी सालों बाद में पांच बरस एक केंद्रीय विश्वविद्यालय का संस्थापक-कुलपति भी रहा. मेरे पिता बरसों सागर विश्वविद्यालय में उपकुलसचिव रहे थे और अकसर दीक्षांत समारोह का काम देखते थे. हमारे समय में परिवार के अलावा विश्वविद्यालय शिक्षा-दीक्षा के लगभग एकमात्र केंद्र थे. अब यह स्थिति नहीं है- अब तो दीक्षा देनेवाली अनेक औपचारिक-अनौपचारिक और स्वनियुक्त संस्थाएं सक्रिय है. विनोद भाव से यह तक कहा जाता है कि इन दिनों वाट्स एप विश्वविद्यालय से अधिक सीख रहे हैं. कोई तो कारण होगा कि आजकल शिष्य कम, भक्त ज़्यादा पैदा और वाचाल हो रहे हैं!

मैंने अपने जीवन में पहली बार दीक्षांत समारोह का नाम तब सुना जब मेरी आयु कुल नौ बरस की थी और मैंने अपनी पहली तुकबंदी लिखी थी. तब मेरे पिता सागर में वहां स्थित विश्वविद्यालय के सहायक कुलसचिव थे. 1950 में इस विश्वविद्यालय में दीक्षांत भाषण देने डॉ. राजेन्द्र प्रसाद आये थे. मेरे पिता को उनकी देखभाल की ज़िम्मेदारी सौंपी गयी थी. विश्वविद्यालय तब दूसरे महायुद्ध में मकरोनिया नामक जगह पर बनायी गयी ब्रिटिश सेना के बैरकों में लगता था. सर्किट हाउस हमारे घर के पास था जहां डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ठहराये गये थे. जनवरी 1950 के शुरुआती दिनों की बात है और डॉ. प्रसाद कुछ दिनों बाद भारतीय गणतंत्र के पहले राष्ट्रपति का पद सम्हालनेवाले थे. मेरे बालमन में अपने पहले राष्ट्रपति को नज़दीक से देखने का बड़ा कुतूहल था. जब हम सर्किट हाउस पहुंचकर उस कमरे में गये, जहां वे रुके थे, तो पता चला कि वे सामने की बगिया में बैठकर कुछ कर रहे हैं. नज़दीक जाने पर हमने पाया कि वे सुई-धागे से अपनी बंडी में झूल आये बटन को रफू कर रहे थे. उन्होंने मेरे पिता से कहा, ‘परमानन्द जी, मैंने सोचा कि दीक्षांत समारोह में लटके बटन से नहीं जाना चाहिये.’ इस सादगी और जतन पर कोई और टिप्पणी अनावश्यक है सिवाय यह याद करने के कि हमारा गणतंत्र कितनी सादगी से रहनेवालों ने स्थापित किया था और उसमें कितना, लगभग पवित्र, साफ़-सुथरापन था जो धीरे-धीरे मैला होता गया है और आज चकाचौंध भव्यता में दमकता नहीं अपनी बढ़ती मलिनता में सकुचा सा रहा है.

बाद में, विश्वविद्यालय का छात्र होने के नाते मैंने वी कृष्ण मेनन और डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के दीक्षांत भाषण सुने. मेनन का भाषण अविराम दो घंटे चला था और किसी को ऊब हुई हो ऐसा याद नहीं आता. आजकल ऊब जल्दी होती है. तब ऐसे भाषण कुछ वैचारिक उद्वेलन करते थे. इन दिनों क्या करते हैं इसका पता नहीं.

संकटों का समय

युवाओं के समक्ष जो नयी सम्भावनाएं प्रगट हो रही हैं उनका उल्लेख करने के बाद में अपना वक्तव्य उनके लिए कुछ रिएलटी चेक करने से और कुछ ज्वलन्त संकटों के उल्लेख और विश्लेषण से किया. इनमें से कुछ संकटों का उल्लेख पहले भी हुआ है पर उन्हें दुहराना इसलिए ज़रूरी है कि वे दिन-ब-दिन और गहराते जाते हैं और उनसे निपटने के नये तरीके खोजने की ज़रूरत है. ये तरीके युवा ही अपनी कल्पनाशीलता, साहस और स्वप्नशीलता से खोज और ईजाद कर सकते हैं.

पहला संकट तो ज्ञान को लेकर है. अज्ञान का लगातार लगभग हर दिन, कई बार तो शिखर से, प्रतिपादन और महिमामंडन होता रहता है. यह गजब समय है कि ज्ञान अब अज्ञान की राह में बाधा नहीं है. हमारे विश्वविद्यालयों में ज्ञानोत्पादन तेज़ी से घट रहा है. देश के श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में हिंदी अंचल का शायद ही कोई विश्वविद्यालय है और संसार के श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में भारत के तकनीकी संस्थानों में से कुछ को छोड़कर एक भी विश्वविद्यालय नहीं है. सारी विद्या को कौशल में बदलने का भयावह उपक्रम है. दूसरा संकट भाषा का है. हिंदी सिर्फ़ आचार और अभिव्यक्ति की भाषा में घट रही है- विचार और ज्ञान उनमें घट रहा है. भाषा से भद्रता, सौम्यता, दूसरों को सुनने-समझने का धीरज भी कम हो रहे हैं. घृणा साम्प्रदायिकता, धर्मान्धता, बलात्कार, भेदभाव, पुलिस और क़ानून के दुरुपयोग की घटनाएं सबसे अधिक हिंदी अंचल में हो रही हैं. तीसरा संकट सपनों का है. वे सब युवा थे जिन्होंने दुनिया में क्रांतिकारी बदलाव किये क्योंकि उन्होंने दुनिया बदलने के सपने देखे थे.

कोई भी स्वप्नशील युवा दी गयी सच्चाई को विकल्पहीन नहीं मान सकता. जन्म और मृत्यु के अलावा दुनिया में कुछ भी निर्विकल्प नहीं है. सपने देखने और उन्हें सजीव करने के जोखि़म अगर युवा नहीं उठायेंगे तो और कौन उठायेगा! सपना वही साकार और मूल्यवान होता है जो दूसरों के लिए देखा गया हो. हमारे समय में सपनों के सौदागर और उनकी हुनर हाट बहुत बढ़ गये हैं. झूठे सपने, फिर वे कहीं से कभी आये हों, एक पूरा समाज नष्ट कर सकते हैं.

अगला संकट विचार का है. भारत में जिज्ञासा क्षीण हो रही है. हम बने-बनाये उत्तरों से कुछ अधिक ही संतुष्ट होने लगे हैं. हममें से ज़्यादातर अब प्रश्न पूछने की ज़हमत नहीं उठाते. भारतीय परंपरा प्रश्नवाचकता, जिज्ञासा, असहमति, बहुलता से ही आगे बढ़ती और सशक्त होती रही है. असहमति, संवाद और बहुलता का अवमूल्यन भारतीय परंपरा और लोकतंत्र का अवमूल्यन है. हमारे सभी धर्म आक्रामक होकर स्वयं अपनी बहुलता और अध्यात्म से विरत हो गये हैं. यह बड़ी विडंबना है कि इस मुक़ाम पर भारतीय परंपरा और संस्कृति का अधिक प्रामाणिक वाहक हमारा संविधान है, हमारे धर्म नहीं.

आज सच्चा भारतीय नागरिक वह है जो भारत की बहुधार्मिकता, बहुभाषिकताको स्वीकार करता हो. जो अपनी निजी आस्था को बरक़रार रखते हुए सामाजिक आचरण में सर्वधर्मसमभाव प्रगट करता हो. जो सभी को, फिर वे बहुसंख्यक हों या अल्पसंख्यक हों, समान मानता हो. जो वंचित वर्ग जैसे स्त्रियों, दलितों, आदिवासियों आदि को जगह, आदर और अवसर देना अपना कर्तव्य समझता हो. जो प्रश्नवाचक हो. जो व्यापक रूप से फैलायी विस्मृति के बरक़्स अपनी जातीय स्मृति को सक्रिय रखता हो और जो अपने और दूसरों के व्यवहार को इस पैमाने से नापता हो कि उससे स्वतंत्रता, समता और न्याय पुष्ट और सशक्त होते हैं या नहीं.

फिर बिटिया आयी

21 फ़रवरी 2020 की शाम यानी महाशिवरात्रि की शाम हमारे परिवार में फिर, काफ़ी अरसे बाद, बिटिया ने जन्म लिया है. हमारे भतीजे आस्तीक और बहू सृष्टि के यहां एक प्यारी नन्हीं लड़की ने जन्म लिया है. आस्तीक और सृष्टि दोनों ही एक तरह से हमारे कुल की परम्परा निभा रहे हैं. वह हिंदी कवि है और वह कथक नर्तकी. मैं कवि हूँ और रश्मि कथक नर्तकी. उदयन मेरा सबसे छोटा भाई और आस्तीक का पिता भी कवि है और उसकी पत्नी अल्पना कथक नर्तकी.

मेरी नातिन के बाद याने लगभग डेढ़ दशकों से परिवार में बेटे ही होते रहे हैं. इसलिए भी इस नन्हीं के शुभागमन का बहुत स्वागत और महत्व है. संसार में एक नया जन्म स्वयं उस संसार का सत्यापन होता है. वह एक बार फिर साबित करता है कि संसार में कितनी अपार अनन्त सम्भावनाएं हैं. संसार ऐसी सम्भावना बना रहे इसका सुनिश्चय करना मनुष्य की बुनियादी, नैतिक और आध्यात्मिक ज़िम्मेदारी है. कई बार लगता है कि हम यह ज़िम्मेदारी ठीक से, जतन और संवेदनाशीलता से निभा नहीं रहे हैं. पता नहीं हममें से कितने यह संतोष कर यह संसार छोड़ेंगे कि हमने अपनी बेटियों के लिए एक बेहतर संसार छोड़ा या उसका बनाने में अपनी भूमिका निभायी?