ट्रेवर बेडफ़ोर्ट अमेरिका में सिएटल के एक जाने-माने रोगाणु वैज्ञानिक हैं. फ़रवरी के मध्य में सिएटल में ही हुए वैज्ञानिकों के एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में उन्होंने कहा कि इतना तय है कि चीन से चला और अब दुनिया भर में कोहराम मचा रहा कोरोना वायरस जान-बूझ कर किसी प्रयोगशाला में नहीं बनाया गया है. इस वायरस के विभिन्न प्रकार पिछले वर्षों में सात बार महामारियों के कारक बने हैं. हर बार देर-सवेर उन्हें दबा दिया गया. इस बार भी ऐसा हो पायेगा, कहा नहीं जा सकता.

बेडफ़ोर्ट के अनुसार, सरकारी आंकड़े चाहे जो कहें, इस वायरस से संक्रमित लोगों की सही संख्या अभी ही दो लाख से कहीं अधिक है. ट्रेवर बेडफ़ोर्ट वैज्ञानिकों के एक ऐसे अंतरराष्ट्रीय समूह के सदस्य हैं, जो रोगाणुओं से फैलने वाली बीमारियों से लड़ने का उपाय ढूंढता है. ट्रेवर बेडफ़ोर्ट का मानना है कि नया कोरोना वायरस ऐसे चमगादड़ों के माध्यम से नवंबर 2019 में पहली बार मनुष्यों तक पहुंचा है, जिन्हें चीन जैसे कुछ देशों में खाया जाता है.

कोरोना वायरस का नया नाम

जैसा कि ट्रेवर बेडफ़ोर्ट ने कहा नया वायरस ‘कोरोना’ नाम के पुराने वायरस परिवार का एक नया सदस्य है. इस नये प्राणघाती वायरस को एक नया नाम भी दिया गया है सार्स-सीओवी-2 (SARS-CoV-2). वायरस के नाम में ‘सार्स’ शब्द (सिवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिन्ड्रम) यह बताता है कि 2002-2003 में चीन में जिस सार्स वायरस से देखते ही देखते क़रीब एक हज़ार लोग मर गये थे, नया वायरस उसी सार्स वॉयरस के आनुवंशिक उत्परिवर्तन (म्यूटेशन) से बना है.

इस वायरस के कारण सांस लेने में भारी कठिनाई और फेफड़ों में सूजन की जो प्राणघातक बीमारी फैल रही है, वह क्योंकि पहली बार दिसंबर 2019 में देखने में आयी है, इसलिए इससे होने वाली बीमारी का वैज्ञानिक नाम ‘कोविड-19’ (Covid-19/ को=कोरोना, वी=वायरस, डी=दिसंबर2019) रखा गया है.

कोरोना वायरस अतीत में पशु-पक्षियों को बीमार करते थे

कोरोना परिवार के वायरस सामान्य सर्दी-ज़ुकाम या फ्लू से लेकर न्युमोनिया और ‘सार्स’ जैसी कई भयंकर बीमारियों के लिए जाने जाते हैं. वे अतीत में पशु-पक्षियों को बीमार किया करते थे. आनुवंशिक उत्परिवर्तन के बल पर अब उनमें मनुष्यों को भी बीमार करने की क्षमता आ गयी है.

वायरस वास्तव में बैक्टीरिया कहलाने वाले कीटाणुओं से भी कई गुना छोटे होते हैं. उन पर एन्टीबायॉटिक दवाओं का कोई असर नहीं होता. बैक्टीरिया एककोशीय होते हैं. वे किसी जीव-जंतु या मनुष्य के शरीर में प्रवेश करने के बाद कोशिका-विभाजन द्वारा अपनी संख्या बढ़ाते हैं. जबकि वायरस ऐसे जीनधारी अकोशीय अतिसूक्ष्म विषाणु हैं, जो अपनी पसंद के किसी प्राणी के शरीर में पहुंचते ही अपनी पसंद के उसके किसी अंग की कोशिकाओं को भेद कर उनमें घुस जाते हैं. अपनी संख्या बढ़ाने के लिए वे इन कोशिकाओं से अपनी ‘क्लोनिंग’ करवाते हैं. यानी उनसे अपनी अनगिनत नकलें बनवाते हैं. इस प्रकार बहुत थोड़े ही समय में आक्रमणकारी वायरस की संख्या इतनी बढ़ जाती है कि शरीर की रोगप्रतिरक्षण प्रणाली पस्त होने लगती है. जीनधारी होने के कारण वायरस उत्परिवर्तन (म्यूटेशन) की, यानी स्वयं को बदलने की क्षमता रखते हैं. जैसे कि कोरोना वायरस 2002 के सार्स-कोरोना वायरस का एक बदला हुआ नया रूप है.

विश्वव्यापी महामारी बनने की राह पर

ब्रिटेन में एक्सेटर विश्वविद्यालय के भारतवंशी वैज्ञानिक भरत पंखानिया का मानना है कि नये कोरोना वायरस के कारण ‘कोविड-19’ नाम की जो नयी बीमारी तेज़ी से फैल रही है, उसके ‘’एक विश्वव्यापी महामारी(पैनडेमिक) बनने की सारी शर्तें पूरी होती दिख रही हैं.’’ तेज़ी से फैलने वाली कोई विश्वव्यापी महामारी कैसी होती है, इसे ठीक एक सदी पहले, यानी 1918 से 1920 के बीच, दुनिया भुगत चुकी है.

अनुमान है कि ‘इनफ्लूएन्ज़ा’ या ‘स्पेनी ज्वर’ के नाम से कुख्यात उस पहली और अब तक की सबसे बड़ी विश्वव्यापी महामारी ने भारत सहित विश्व के अनेक देशों में कुल मिला कर पांच से दस करोड़ प्राणों की बलि ली थी. अनुमान में इतने बड़े अंतर के पीछे सौ साल पहले सूचना और संचार के आज जैसे उन्नत साधनों का न होना है. विश्व की जनसंख्या भी तब केवल एक अरब 80 करोड़ थी. आज की जनसंख्या के केवल एक-चौथाई के बराबर.

जब अखंड भारत की जनसंख्या पांच प्रतिशत घट गयी

1918 का ‘इनफ्लूएन्ज़ा’ वायरस उस साल जनवरी के महीने में अमेरिका के कैन्सास प्रांत से चला था. अकेले अमेरिका में ही पौने सात लाख लोगों ने उसके चलते अपने प्राण गंवाए थे. उस समय के व्यापारिक मार्गों और पानी के जहाज़ों से वह सारी दुनिया में फैला. संभवतः बंबई (मुंबई) के रास्ते से वह भारत पहुंचा था. उसके प्रकोप की दो लहरों ने भारत में एक करोड़ 70 लाख लोगों की जानें लीं. दुनिया में सबसे अधिक मौतें भारत में ही हुईं. उससे पीड़ित 10 से 20 प्रतिशत भारतीय चल बसे. तब के अखंड भारत की जनसंख्या दो ही वर्षों में पांच प्रतिशत घट गयी. भारत में उस समय अंग्रेज़ों का राज था. उन्हें, बस अपनी जान बचाने की चिंता थी.

आज के ‘कोविड-19’ से संक्रमित भारतीयों की ज्ञात संख्या सौभाग्य से इस समय नगण्य है. किंतु दो ही महीनों में यह बीमारी ऑस्ट्रेलिया सहित विश्व के सभी महाद्वीपों में पहुंच चुकी है. इन पंक्तियों के लिखने तक उन देशों की संख्या 55 से अधिक हो चुकी थी, जहां इस बीमारी के पैर पड़ चुके हैं. संक्रमित लोगों की कुल संख्या, आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, एक लाख से ऊपर जा चुकी है. मृतकों की संख्या भी तीन हज़ार से ज्यादा हो चुकी है. बीमारी का प्रसार मंद पड़ने के लक्षण अभी तक तो नहीं दिखे हैं. सबसे अधिक प्रकोप अभी भी चीन में ही है. उसके बाद क्रमशः दक्षिण कोरिया, जापान, इटली और ईरान का नंबर आता है. ईरान के तो स्वास्थ्य मंत्री और कई सांसद भी बिस्तर पकड़ चुके हैं.

यूरोप में इटली के रास्ते से फैलाव

यूरोप में यह बीमारी इटली के रास्ते से जर्मनी और फ्रांस सहित कम से कम आधे दर्जन देशों में आतंक फैला रही है. जर्मनी में राष्ट्रीय स्तर से लेकर राज्य और नगरपालिका स्तर तक ऐसी संकटकालीन समितियों का गठन किया जा रहा है, जिन्होंने अपने यहां स्थिति पर नज़र रखते हुए लोगों को मार्गदर्शन देने, आपदा प्रबंधन करने तथा बचाव और उपचार के कार्यों के बीच तालमेल बैठाने का काम शुरू कर दिया है.

सामान्य फ्लू और ‘कोविड-19’ के आरंभिक लक्षण लगभग एक जैसे होने के कारण लोगों से कहा जा रहा है कि जिसे भी संक्रमण का शक हो, वह पहले अपने डॉक्टर से फ़ोन पर संपर्क करे, न कि उसके दवाखाने में पहुंच जाये. डॉक्टर या तो स्वयं उसके पास आयेगा या उसे ऐसे अस्पताल में भेजने की व्यवस्था करेगा, जहां सही जांच व उपचार की तैयारियां की गयी हैं. पहले बताये बिना सीधे डॉक्टर के दवाख़ाने में पहुंच जाने से असावधान डॉक्टर व दवाख़ाने में बैठे अन्य लोगों को भी बीमारी का संक्रमण लग सकता है.

दो सप्ताह अलग-थलग रहने की सलाह

संक्रमण के संदेह वाले व्यक्ति के साथ-साथ उसके परिवार के लोगों और पिछले दिनों में उसके संपर्क में आये सभी लोगों को, सावधानी के तौर पर, दो सप्ताह तक उनके अपने घरों में ही इस तरह अलग-थलग रहने-रखने के लिए कहा जा रहा है, ताकि किसी और को बीमारी का संक्रमण नहीं लगे. अलग-थलग रखने के इस डर से यूरोप के कई देशों में लोग खाने-पीने की तथा अन्य ज़रूरी चीज़े इस पैमाने पर जमा करने लगे हैं कि दुकाने ख़ाली होने लगी हैं. कीटनाशक दवाएं, मुंह पर लगाने की सुरक्षा-नकाब, नाक पोंछने के टिश्यू पेपर और डॉक्टरों के ‘ओवर-ऑल’ का अकाल पड़ गया है.

जर्मनी की राजधानी बर्लिन में मार्च के आरंभ में हर वर्ष संसार का सबसे बड़ा अतरराष्ट्रीय पर्यटन मेला लगता है. इस बार 4 से 8 मार्च तक चलने वाले इस मेले की पूरी हो चुकी सभी तैयारियों के बावजूद अंतिम समय में उसके आयोजन को रद्द कर दिया गया. दुनिया भर से जो हज़ारों लोग आते, उनके कारण ‘कोविड-19’ के नये संक्रमणों की बाढ़ आ जाने का डर था. अगले दिनों में जर्मनी में होने वाले और भी कई व्यापार मेलों को रद्द कर दिया गया है. ‘कोविड-19’ से सबसे अधिक प्रभावित देशों से जर्मनी पहुंच रहे विमान एवं रेल यात्रियों से ऐसे फ़ॉर्म भरवाए जा रहे हैं, जिनमें उन्हें अपने बारे में तथा जर्मनी में अपने रहने-ठहरने के ठिकानों और संपर्कों की जानकारी देने के लिए कहा जा रहा है.

विश्वप्रसिद्ध लूव्र संग्रहालय बंद

जर्मनी के पड़ोसी स्विट्ज़रलैंड ने जेनेवा में पांच मार्च से लगने वाली अंतरराष्ट्रीय कार-प्रदर्शनी (मोटर शो) सहित, जिसे हर वर्ष छह लाख से अधिक लोग देखने आते हैं, ऐसे सभी आयोजनों पर मार्च के मध्य तक रोक लगा दी है, जिनमें एक हज़ार से अधिक लोग आ सकते हैं. फ्रांस ने भी अपने यहां ऐसे सभी आयोजनों पर रोक लगा दी है, जिनमें पांच हज़ार से अधिक लोग एकत्रित हो सकते हैं. पेरिस के विश्वप्रसिद्ध लूव्र संग्रहालय को भी बंद कर दिया गया है और वहां 44 हज़ार धावकों वाली एक अर्ध-मैरेथॉन दौड़ भी अब नहीं होगी. दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के संगठन ‘आसिआन’ का 14 मार्च से अमेरिका के लास वेगास में होने वाला शिखर सम्मेलन भी टाल दिया गया है.

ओलंपिक खेलों का आयोजन अधर में

यूरोप के अन्य देश भी इसी प्रकार के क़दम उठा रहे हैं. महत्वपूर्ण फ़ुटबॉल मैचों के लिए कहा जा रहा है कि उन्हें बिना दर्शकों के ख़ाली स्टेडियमों में खेला जाये. ईरान के सभी स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय बंद हैं. वर्तमान स्थिति में यदि कोई बड़ा सुधार नहीं हुआ, तो 24 जुलाई से जापान में ग्रीष्मकालीन ओलंपिक खेलों का आयोजन भी खटाई में पड़ जायेगा. जापान की सरकार ने वहां के सबसे बड़े द्वीप होक्काइदो में आपात स्थिति घोषित कर दी है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन ‘डब्ल्यूएचओ’ ने ‘कोविड-19’ के एक विश्वव्यापी महामारी बन जाने के ख़तरे को ‘प्रबल’ से अब ‘बहुत प्रबल’ कर दिया है. संगठन के अध्यक्ष तेद्रोस अदहनोम ग़ेब्रेयेस ने 28 फ़रवरी को जेनेवा में कहा, ‘’हमारा सबसे बड़ा शत्रु वायरस नहीं है. हमारा सबसे बड़ा शत्रु है उसका भय, अफ़वाहें और बदनामी. हमें तथ्यों की, विवेक और एकजुटता की ज़रूरत है.’’

संक्रमण मार्ग

अब तक की जानकारी के अनुसार, ‘कोविड-19’ के वायरस मुख्यतः किसी संक्रमित व्यक्ति द्वारा सांस छोड़ने, छींकने और खांसने के साथ हवा के द्वारा, या उसकी बहती नाक के पानी और थूक के संपर्क में आने से किसी दूसरे व्यक्ति तक पहुंचते हैं. किसी संक्रमित व्यक्ति के बहुत निकट जाने, उसे छूने, सहलाने या उससे हाथ मिलाने से तथा उसके आस-पास की वस्तुओं को हाथ लगाने से भी वायरस किसी दूसरे व्यक्ति तक पहुंच सकते हैं. दूसरा व्यक्ति जैसे ही अपना चेहरा या अपनी नाक छुएगा या आंखें मलेगा, वायरस उसके शरीर के भीतर पहुंच कर फेफड़ों में अड्डा जमा लेंगे.

लक्षण

इस बीमारी के प्रथम लक्षण उभरने में 14 दिन तक बीत सकते हैं और यह भी इसके फैलने की सबसे बड़ी वजहों में से एक है. कभी-कभी कोई लक्षण नहीं भी उभरता. या कुछ अपवाद ऐसे भी देखने में आये हैं कि ‘कोविड-19’ का संक्रमण लगने के बाद बीमारी का कोई स्पष्ट लक्षण नहीं उभरा, किंतु दूसरे लोगों को संक्रमण फिर भी लगा. आम तौर पर इसके वही लक्षण देखने में आते हैं जो फ्लू (इनफ्लुएन्ज़ा) के समय भी दिखायी पड़ते हैं यानी गले में ख़राश, छींक और खा़ंसी, नाक बहना या बंद हो जाना, शरीर में दर्द और जकड़न, बुख़ार और दस्त.

ये लक्षण प्रायः बहुत उग्र नहीं होते और न एक साथ उभरते हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि क़रीब 80 प्रतिशत लोग बिना किसी ख़ास उपचार के ठीक हो जाते हैं. केवल हर छह में से एक मामले में ‘कोविड-19’ गंभीर रूप ले सकती है. तब बीमार व्यक्ति को सांस लेने में कठिनाई होती है. वयोवृद्ध लोगों और उन लोगों की दशा बहुत चिंताजनक भी बन सकती है, जिन्हें पहले से ही उच्च रक्तचाप, हृदयरोग या मधुमेह (डायबिटीज) जैसी कोई बीमारी हो. उन्हें न्युमोनिया (फुप्फुसदाह) या सेप्सिस (शरीर की रोगप्रतिरक्षण प्रणाली द्वारा अपने ही अंगों-ऊतकों पर प्राणघातक प्रहार) का सामना करना पड़ सकता है. संक्रमण के दो प्रतिशत मामलों में मृत्यु भी हो सकती है. इसकी मृत्युदर सामान्य फ्लू की अपेक्षा 20 गुना अधिक पायी गयी है.

संक्रमण की परख

कोई व्यक्ति सचमुच संक्रमित है या नहीं, इसकी पुष्टि एक जीन टेस्ट से की जाती है. इस टेस्ट के लिए डॉक्टर या तो संबंद्ध व्यक्ति के कफ़ का नमूना लेते हैं या फिर कॉटन स्वैब की सहायता से मु्ंह में अन्न नली के पास के उपरी तलवे के द्रव का नमूना लिया जाता है. नमूने को किसी विशेष प्रयोगशाला में भेजा जाता है. प्रयोगशाला में ‘पीसीआर (पॉलीमरेज़ चेन-रिएक्शन) टेस्ट’ की सहायता से वायरस के जीनों के विश्लेषण द्वारा उनकी पहचान की जाती है. अच्छी प्रयोगशाला व आदर्श परिस्थितियों में तीन से पांच घंटों में वायरस की पहचान हो जाती है. अन्यथा 24 घंटे भी लग सकते हैं.

बचाव के उपाय

‘कोविड-19’ के वायरस से बचाव का फिलहाल कोई टीका नहीं है और न कोई एन्टीबायोटिक दवा उसे ठीक कर सकती है. टीका विकसित करने का प्रयास ज़ोर-शोर से हो रहा है, पर उसके बनने में एक वर्ष तक का समय लग सकता है. टीका बन जाने पर भी मनुष्यों पर उसे आजमाने और बिक्री का लाइसेंस मिलने में कुछ और समय लगेगा. इसलिए बचाव के कुछ नियमों का स्वयं पालन करने के सिवाय इस समय और कोई उपाय नहीं है. विश्व स्वास्थ्य संगठन का सुझाव हैः

* हाथों को अल्कोहल आधारित हाथ साफ़ करने की किसी चीज़ से मलें या साबुन लगाकर अच्छी तरह से धोयें. इससे हाथ पर चिपके वायरस मर जायेंगे. अल्कोहल आधारित सामग्री स्वयं बनाने के लिए एक नुस्खा भी बताया हैः 800 मिलीलीटर इथाइल अल्कोहल (इथनॉल) + 200 मिलीलीटर उबाल कर ठंडा किया हुआ पानी + कुछ ग्लिसरीन मिला कर एक घोल बना लें. इथनॉल और ग्लिसरीन दवा की दुकानों से मिल जाने चाहियें. इथनॉल ज्वलनशील होता है, इसलिए इसके आस-पास कोई आग नहीं होनी चाहिये.

* ट्रेन, बस, ट्राम या टैक्सी से यात्रा के बाद घर पहुंचते ही सबसे पहले दोनों हाथ अच्छी तरह धोयें.

* जो कोई खांस या छींक रहा हो, उससे कम से कम एक मीटर की दूरी रखें.

* अपनी आंख, नाक और मुंह को हाथ लगाने से बचें.

* स्वयं खांसते या छींकते समय मुंह को टिश्यू पेपर से या कुहनी मोड़ कर अपने कपड़े की आस्तीन से ढंक दें. इससे आपके अपने वायरस हवा में दूर तक नहीं जा सकेंगे. इस्तेमाल किये गये टिश्यू पेपर को कहीं फेंकने के बदले कचरे के डिब्बे में डालें.

*खांसी, बुखार या तबीयत नरम होने पर घर पर ही रहें और डॉक्टर या नज़दीकी स्वास्थ्य केंद्र को फ़ोन करें.

* मीडिया के माध्यम से वायरस और संक्रमण के बारे में नवीनतम स्थिति को जानते रहें.

विशेषज्ञों का कहना है कि मुंह पर सामान्य क़िस्म का मास्क लगाने से वायरस जैसे अतिसूक्ष्म कणों से पूरी तरह बचा नहीं जा सकता लेकिन इसके फैलने की आशंका थोड़ी कम अवश्य हो जाएगी.

कोरोना वायरस के कोहराम से लोगों के स्वास्थ्य पर तो असर पड़ ही रहा है, सबसे अधिक असर देशों के उद्योगधंधों और अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है. 2020 वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारी गिरावट का एक मनहूस वर्ष सिद्ध हो सकता है. भारत की अर्थव्यस्था भी इस गिरावट की आंच से बच नहीं पायेगी.