अफगानिस्तान में शांति के लिए अमेरिका और तालिबान ने बीती 29 फरवरी को एक समझौते पर दस्तखत किए. कतर में हुए इस समझौते में विदेशी सैनिकों की सुरक्षा, तालिबान द्वारा अलकायदा जैसे आतंकी संगठनों को अफगानिस्तान की धरती से दूर रखना और कैदियों की रिहाई जैसे मुद्दे शामिल हैं. समझौते में 14 महीनों में अमेरिका और नाटो की सेनाओं की अफगानिस्तान से पूर्ण वापसी और जल्द ही अफगान सरकार और तालिबान के बीच बातचीत शुरू करने की बात भी कही गयी है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनके मंत्रियों का कहना है कि 18 साल की जंग के बाद हुआ यह समझौता अपने आप में ऐतिहासिक है और इससे अफगानिस्तान में शांति आने वाली है.

लेकिन, डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के इस दावे से अलग अगर इस समझौते से जुड़े दस्तावेजों पर गौर करें तो इसके जरिये अफगानिस्तान में संघर्ष खत्म होने की उम्मीद कम ही नजर आती है. विदेश मामलों के जानकार समझौते की सबसे बड़ी खामी इसमें किसी भी मुद्दे पर विस्तार से चर्चा न किये जाने को बताते हैं. ये लोग कहते हैं कि संघर्ष विराम के मुद्दे को देखें तो समझौते में इस पर बात तो की गयी है, लेकिन उसे सफल बनाने के लिए जरूरी कई मसलों पर कोई चर्चा ही नहीं हुई है. इतने लंबे (18 साल लंबे) युद्ध के बाद जब दो पक्ष संघर्ष विराम को तैयार होते हैं तो सेना में नयी भर्ती, हथियारों का सौंपने की प्रक्रिया और युद्धविराम के उल्लंघन की स्थिति में उठाये जाने वाले कदमों सहित तमाम मुद्दों पर विस्तृत चर्चा की जाती है. लेकिन इस शांति समझौते में इन बातों का कोई जिक्र ही नहीं किया गया है.

अमेरिका और तालिबान के बीच हुए समझौते में इस बात की भी कोई रूपरेखा नहीं है कि तालिबान और अफगान सरकार के बीच कैसे और किन मुद्दों पर बातचीत होगी. जानकारों की मानें तो तालिबान और अफगान सरकार के बीच जिस तरह की शत्रुता है, उसे देखते हुए इनके बीच बातचीत शुरू हो पाना आसान नहीं लगता. शांति समझौता होने के दो रोज बाद ही दोनों के बीच उठापटक शुरू हो गयी है. अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने तालिबान द्वारा बातचीत करने के लिए रखी गयी शर्त को मानने से इंकार कर दिया. अमेरिका और तालिबान के बीच हुए समझौते में कहा गया है कि तालिबान अफगानिस्तान की सरकार से तब बातचीत शुरू करेगा, जब अफगान सरकार उसके 5000 लड़ाकों को रिहा करेगी. लेकिन, राष्ट्रपति अशरफ गनी का कहना है कि तालिबान पहले उनकी सरकार से बातचीत शुरू करे, उसके बाद ही उसके लड़ाकों की रिहाई पर बात की जायेगी.

अफगान सरकार के इस रुख के जवाब में तालिबान ने बीते एक हफ्ते से जारी आंशिक संघर्ष विराम खत्म करने की घोषणा कर दी. इस घोषणा के अगले दिन उसने देश में अलग-अलग जगहों पर कई हमले किये, जिनमें अफगान सेना और पुलिस के 20 जवान मारे गए. इन हमलों के बाद यूरोप और अमेरिका ने तालिबान और अफगान सरकार से समझौते के साथ बने रहने की अपील की है. लेकिन फिर भी दोनों पक्ष अपनी बातों पर अड़े हुए हैं.

बहरहाल, तालिबान और अफगान सरकार का एक-दूसरे को लेकर जो रुख है, उसे देखते हुए बातचीत के दौरान इनका किसी मसले पर एक मत होना आसान नहीं दिखता. दोनों की विचारधारा में भी बड़ा अंतर है. बातचीत के सबसे अहम मुद्दों जैसे - सरकार चलाने के तौर-तरीके, मानवाधिकार, शरणार्थियों के मुद्दे, महिलाओं और अल्पसंख्यकों की आजादी सहित तमाम मुद्दों पर दोनों का नजरिया एक-दूसरे से बहुत अलग है. अफगानिस्तान मामलों के जानकार कहते हैं कि ऐसे में अमेरिका को बातचीत के इन मुद्दों पर तालिबान के साथ पहले ही गहन चर्चा कर लेनी चाहिए थी.

कुछ जानकार अमेरिका द्वारा शांति प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही अपने सैनिकों की वापसी शुरू करने के फैसले से भी हैरान हैं. इस वजह से ये लोग इस समझौते को शांति समझौता मानने के बजाय अमेरिका द्‌वारा अफगानिस्तान से निकलने के लिए किया गया समझौता ज्यादा मानते हैं.

दुनिया भर में तमाम शांति समझौतों पर शोध कर चुके नोत्र दाम विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ माधव जोशी अपनी एक टिप्पणी में लिखते हैं, ‘शांति समझौते में शांति स्थापित करने की प्रक्रिया की बात से पहले अमेरिकी फ़ौज को अफगानिस्तान से कैसे निकलना है, यह बात की गयी है. अब तक मैंने जितने शांति समझौतों पर शोध किया उनमें ऐसा दृष्टिकोण नहीं देखा. हालांकि, फिर भी जरूरी नहीं कि इससे शांति प्रक्रिया पटरी से उतर ही जाए, लेकिन, इस तरह का दृष्टिकोण अब तक किसी सफल शांति प्रक्रिया की रणनीति का हिस्सा नहीं रहा है.’

कूटनीति के कुछ जानकार एक और बात भी बताते हैं. इनके मुताबिक अमेरिका ने सबसे पहले अपने सैनिकों की अफगानिस्तान से वापसी की बात करके अफगान सरकार के पक्ष को कमजोर कर दिया है. अगर, अमेरिका तालिबान और अफगान सरकार के बीच सफल बातचीत होने के बाद, अपनी सेना को वापस बुलाने की बात करता तो बातचीत के दौरान अफगान सरकार ज्यादा तोल-मोल करने की स्थिति में होती.