संसार में ऐसे देश तो कई हैं, जहां किसी न किसी शहर में स्थानीय सार्वजनिक परिवहन सेवाओं के टिकट सस्ते हैं या सप्ताह के किसी एक दिन टिकट लगता ही नहीं. लेकिन ऐसा देश अब तक कोई नहीं था, जहां के निवासी ही नहीं, विदेशी भी हर समय और हर दिन बस, ट्रेन, ट्राम से मनचाही बार बिना टिकट यात्रा कर सकते हैं. केवल सवा छह लाख जनसंख्या और 2586 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाला लक्जमबर्ग ऐसा पहला देश है, जिसकी तीन दलीय सरकार ने यह कमाल करने का बीड़ा उठाया है. रविवार एक मार्च से वहां देशव्यापी सार्वजनिक परिवहन सबके लिए मुफ़्त हो गया है. यहां की ट्रेनों में केवल प्रथम श्रेणी (फ़र्स्ट क्लास) के यात्रियों को अब भी टिकट लेना होगा. ट्राम और बस स्टॉपों पर लगे टिकट देने वाले ऑटोमैट या तो हटा दिये गये हैं या वे अब न कोई पैसा लेते हैं और न टिकट देते हैं. कंडक्टरों और टिकट जांचने वालों को सर्विस एवं सूचना केंद्रों में काम करने के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है.

लक्जमबर्ग में अपने पड़ोसियों बेल्जियम या नीदरलैंड की तरह ही लोकतांत्रिक राजशाही है. स्विट्ज़रलैंड की तरह ही वहां के बैंकों और वित्तीय कारोबार में विदेशी धन की भरमार है. सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की दृष्टि से प्रतिव्यक्ति औसत आय भी बहुत अधिक है - लगभग एक लाख छह हज़ार डॉलर यानी 75 लाख रुपए. ऐसे में सरकार को ऐसा कोई समाज कल्याण करने की आवश्कता नहीं थी कि वह देश में सार्वजनिक परिवहन को निःशुल्क बनाने के लिए प्रतिवर्ष कम से कम चार करोड़ 10 लाख यूरो ख़र्च करने की सोचती.

पर्यावरण के लिए हितकारी, देश की छवि के लिए लाभकारी

लक्जमबर्ग के प्रधानमंत्री क्सावियेर बेटेल अपनी सरकार के इस निर्णय को पर्यावरण के लिए एक हितकारी और देश की छवि के लिए लाभकारी क़दम के रूप में देखते हैं. वे चाहते हैं कि जर्मनी जैसे लक्जमबर्ग के पड़ोसी देश भी उनसे प्रेरणा लें. जर्मनी में भी सीमित पैमाने पर ऐसे प्रयोग हुए हैं, लेकिन वे बहुत उत्साहवर्धक नहीं रहे.

यूरोप में अब तक केवल पूर्वी यूरोप का बाल्टिक सागरीय देश एस्तोनिया ही ऐसा रहा है, जहां की राजधानी ताल्लिन के निवासी पिछले पांच वर्षों से बसों और ट्रामों में मुफ्त यात्रा कर सकते हैं. लेकिन इससे वहां की सड़कों पर चलने वाली कारों में कोई बड़ी कमी देखने में नहीं आयी. जर्मनी में सार्वजनिक परिवहन को देशव्यापी निःशुल्क करने की बात कोई सरकार नहीं सोच सकती, क्योंकि इस पर हर वर्ष कम से कम 12 अरब 80 करोड़ यूरो के बराबर अतिरिक्त ख़र्च आयेगा.

सरकार के लिए केवल यही सबकुछ नहीं है

लक्जमबर्ग में भी विशेषज्ञ निःशुल्क सार्वजनिक परिवहन की सफलता को निर्विवाद नहीं मानते. उनका कहना है कि परिवहन सस्ता या निःशुल्क होने के अलावा तीन और ऐसे कारक हैं, जिनकी अनदेखी नहीं की जा सकती. पहला - अगली बस या ट्राम के लिए प्रतीक्षाकाल बहुत कम होना चाहिये, दूसरा गंतव्य तक पहुंचने के लिए एकाध बार ही वाहन बदलने पड़ें और तीसरा वाहन साफ़-सुथरे, आरामदेह और समय पर चलने वाले हों.

इन सवालों का उत्तर देते हुए लक्जमबर्ग के परिवहन और यातायात मंत्री फ़्रोंस्वा बाउश कहते हैं, ‘हमने इस सब के बारे में पहले से ही सोच रखा है और ज़रूरी योजनाएं भी तैयार कर रखी हैं. लक्ष्य है, किसी को तीन मिनट से अधिक अगली बस या ट्राम की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़े. इस तरह किसी को भी टाइम-टेबल जानने या याद रखने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी.’

परिवहन व्यवस्था को एक नयी दिशा देने का लक्ष्य

लक्जमबर्ग की पर्यावरणवादी ग्रीन पार्टी के नेता और परिवहन मंत्री बाउश यह कहने से नहीं चूकते कि उनकी सरकार सार्वजनिक परिवहन को केवल मुफ़्त नहीं बना रही है बल्कि सारी परिवहन व्यवस्था को एक नया मोड़ देना चाहती है. यह ज़रूरी भी है क्योकि यूरोप के किसी भी देश के निवासियों की और वहां काम करने के लिए आने वाले बाहरी लोगों की संख्या उस तेज़ी से नहीं बढ़ रही है, जिस तेज़ी से छोटे से देश लक्जमबर्ग में बढ़ रही है.

यहां के सवा छह लाख स्थानीय निवासियों के अतिरिक्त हर दिन क़रीब दो लाख लोग पड़ोसी देशों जर्मनी, फ्रांस और बेल्जियम से यहां काम करने आते हैं. सड़कें उनकी कारों से इतनी बुरी तरह पट जाती हैं कि वाहनों की प्रतिघंटा औसत गति 20 किलोमीटर या उससे भी कम हो जाती है. इसी के चलते लक्जमबर्ग की सरकार सड़कों पर ट्रैफिक जाम को कम करने के लिए आने वाले वर्षों में, रेल और ट्राम मार्गों के विकास पर प्रतिवर्ष प्रतिव्यक्ति औसतन 600 यूरो ख़र्च करने की योजना भी बना रही है. उसके पड़ोसी देशों को देखें तो स्विट्ज़रलैंड अपने रेलमार्गों पर इससे लगभग आधा ख़र्च करता है और जर्मनी तो केवल 70 यूरो.

लक्जमबर्ग की लिबरल, सोशलिस्ट और ग्रीन पार्टी की दो वर्ष पहले बनी मिली-जुली सरकार ने उसी समय तय कर लिया था कि निवेश-बजट का दो-तिहाई हिस्सा लोगों की गतिशीलता सुधारने पर और एक-तिहाई सड़कों पर ख़र्च किया जायेगा. उसी समय महसूस किया गया था कि अतीत में मोटर वाहनों को जो प्रथमिकता दी जाती रही है, उससे यातायत ठप होने के सिवाय और कुछ नहीं होगा. इसलिए भविष्य में सार्वजनिक परिवहन को प्राथमिकता दी जायेगी.

इसके बाद 2018 में सार्वजनिक परिवहन पर पांच करोड़ 10 लाख यूरो ख़र्च किये गये थे. 2021 तक यह धनराशि आठ करोड़ साठ लाख यूरो हो जायेगी.

मनमोहक ट्रामें भविष्य की झलक दिखाती हैं

लक्जमबर्ग के अधिकांश निवासी और वहां घूमने-फिरने या काम करने आने वाले विदेशी मुफ्त सार्वजनिक परिहन की सुविधा से ख़ुश हैं. वहां के मुख्य रेलवे स्टेशन से चलने वाली बसें पहले ही बिजली चालित बहुत साफ-सुथरी आरामदेह बसे हैं. सभी ट्रामें भी भीतर मनमोहक रंगों के साथ जगमग और बाहर लकदक, किसी भविष्यकालीन वाहन की तरह दिखती हैं. जो लोग किसी दूसरे देश से ट्रेन द्वारा आयेंगे, उन्हें केवल लक्जमबर्ग की सीमा तक का ही टिकट लेना होगा, बाक़ी रास्ता मुफ़्त होगा. इससे वहां काम करने वाले नियमित विदेशी यात्री हर महीने कम से कम 40 यूरो बचायेंगे.

ट्राम के अंदर का दृश्य

ट्रामों और बसों को लेकर सरकार की नई योजनायें

ट्रामों और बसों को लेकर लक्जमबर्ग की सरकार कई नई योजनाओं पर भी काम कर रही है. अधिकारियों के मुताबिक अब ट्रामें ऊपर लगे बिजली के तारों के बदले बैटरी से चला करेंगी. हर स्टॉप पर रुकने वाली बसों के अतिरिक्त, चुने हुए स्टॉपों पर रुकने वाली एक्सप्रेस बस सेवा का और उसके लिेए सड़कों पर अलग लेन का विस्तार किया जायेगा. 2030 तक सभी बसें बिजली से, यानी बैटरी से चलेंगी.

एक ऐसी एक्सप्रेस ट्राम चलाने की भी योजना है, जो 100 किलोमीटर प्रतिघंटे की गति से दौडेगी. अन्य देशों से आने वालों के लिए देश की सीमाओं पर ‘पार्क-एन्ड-राइड’ स्थानों की पार्किंग क्षमता 2025 तक दुगुनी कर दी जायेगी. साइकिल चालकों के लिए सड़कों पर आरक्षित लेनों व अन्य मार्गों को बढ़ाते हुए उन की कुल लंबाई 1100 किलोमीटर कर देने का लक्ष्य रखा गया है.

48 प्रतिशत निवासी विदेशी मूल के

लक्जमबर्ग के 48 प्रतिशत निवासी विदेशी मूल के हैं और काम करने वाले 43 प्रतिशत लोग हर दिन पड़ोसी देशों से आते हैं. केवल दो दशकों में स्थायी निवासियों की संख्या एक-तिहाई बढ़ गयी है. स्थायी निवासियों में उन लोगों का अनुपात बढ़ रहा है, जो सेवानिवृत्त हो कर पेंशनभोगी बन रहे हैं. इसका अर्थ यह है कि भविष्य में पड़ोसी देशों से हर दिन आने वाले कर्मचारियों की संख्या और अधिक बढ़ेगी.

सार्वजनिक परिवहन का 90 प्रतिशत ख़र्च सरकार पहले ही करदाताओं से मिले पैसों के बल पर उठा रही थी. 20 से कम आयु के सभी लोग पहले भी निःशुल्क सवारी के अधिकारी थे. अब पूरी तरह मुफ्त हो जाने पर नया भार केवल 10 प्रतिशत के बराबर ही ठहरता है. सरकार चाहती है कि इस समय काम-धंधे में लगे जो 61 प्रतिशत लोग अपनी कारों में अकेले बैठे नज़र आते हैं, उनका अनुपात 2025 तक घट कर 46 प्रतिशत हो जाये. लक्जमबर्ग में कारों का प्रतिव्यक्ति औसत पूरे यूरोप में सबसे अधिक है.

देश की राजधानी का नाम भी लक्जमबर्ग ही है. 51 वर्ग किलोमीटर बड़े इस शहर की जनसंख्या केवल एक लाख 17 हज़ार है. शहर ऊंची-नीची चट्टानी पहाड़ियों पर बसा हुआ है. ट्राम ही सार्वजनिक परिवहन का मुख्य साधन है. शहर के घने बसे संकरे केंद्र में चलने वाली ट्राम पहले से ही बैटरी से चलती है.

लक्जमबर्ग में विदेशी पर्यटकों की संख्या पहले से ही कम नहीं थी. अब बिना टिकट हर समय सवारी का आकर्षण और अधिक पर्यटकों को ललचायेगा. जो पैसा टिकट पर ख़र्च होता, वह अब रहने-ठहरने और खाने-पीने के नाम पर ख़र्च होकर लक्जमबर्ग में ही रहेगा.