कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में शुमार किए जाने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया का पार्टी छोड़कर भारतीय जनता पार्टी में शामिल होना यह बताता है कि एक संगठन के तौर पर कांग्रेस कितनी अधिक संकट में है. ज्योतिरादित्य के पिता माधवराव सिंधिया कांग्रेस के आला नेताओं में थे. उनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि भाजपा की पूर्ववर्ती पार्टी जनसंघ की थी. वे उसे छोड़कर कांग्रेस में आए थे. लेकिन अगर आज यह स्थिति बनी है कि उनके बेटे ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस को छोड़कर उसी पार्टी में जा रहे हैं जिसे छोड़कर उनके पिता बाहर निकले थे तो इसका एक स्पष्ट मतलब यह है कि कांग्रेस या तो कुछ बहुत गलत कर रही है या कुछ बेहद जरूरी काम नहीं कर रही है.

दिसंबर, 2018 में जब मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनी, तब से ही ज्योतिरादित्य पार्टी के अंदर संघर्ष कर रहे थे और अंतत: जब उन्हें अपने मनमाफिक समाधान नहीं मिला तो उन्होंने कांग्रेस छोड़कर भारतीय जनता पार्टी में जाने का निर्णय कर लिया. कांग्रेस में नेतृत्व के स्तर पर स्पष्टता नहीं होने की वजह से ज्योतिरादित्य सिंधिया की समस्याओं का कोई समाधान या उसका कोई इशारा पार्टी में शीर्ष स्तर पर नहीं दिखा.

दरअसल, कांग्रेस में नेतृत्व का संकट 2019 के लोकसभा चुनावों के बाद से लगातार गहराता ही जा रहा है. 2014 में भी कांग्रेस की करारी हार हुई थी. लेकिन उस हार को उस समय की कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की हार के तौर पर देखा गया.

इस पृष्ठभूमि में यह माना गया कि कांग्रेस का भविष्य राहुल गांधी हैं और अब पार्टी को आगे का सफर उनके ही नेतृत्व में तय करना है. इसी क्रम में राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष बने. 2019 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस राहुल गांधी के नेतृत्व में उतरी. लेकिन इसके बावजूद कांग्रेस अपने प्रदर्शन में कोई खास सुधार नहीं कर पाई. बल्कि खुद राहुल गांधी अमेठी से चुनाव हार गए.

इसके बाद राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया. इसके बाद कुछ दिनों तक यही पता नहीं चल रहा था कि कांग्रेस अध्यक्ष का पद किसके पास है. कुछ हफ्तों की माथापच्ची के बाद कांग्रेस के अंतरिम अध्यक्ष के तौर पर पार्टी की कमान एक बार फिर से सोनिया गांधी ने संभाल ली. इसका मतलब यह निकाला गया कि कांग्रेस ने भविष्य की दिशा में जो कदम उठाए थे, उसे न सिर्फ पीछे लिया गया है बल्कि पार्टी एक बार फिर अपने अतीत में लौट गई है. 2014 में सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह के बारे में कहा जा रहा था कि अब इनके नेतृत्व का वक्त खत्म हो गया है और ये धीरे-धीरे नेपथ्य में चले जाएंगे.

लेकिन 2020 की कांग्रेस का सबसे कटु सत्य यही है कि आज भी सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह को ही कांग्रेस का नेतृत्व करना पड़ रहा है. इसे हाल के एक उदाहरण के जरिए समझा जा सकता है. दिल्ली दंगों के बाद कांग्रेस की ओर से सबसे मजबूत बयान कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी ने दिया और उन्होंने गृह मंत्री अमित शाह के इस्तीफे की मांग की. अर्थव्यवस्था की बदहाली और शासन से संबंधित मसलों पर कांग्रेस की ओर से सबसे विश्वसनीय ढंग से बात कहने का जिम्मा अब भी पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कंधों पर है. हाल ही में मनमोहन सिंह ने एक लेख के जरिए अर्थव्यवस्था की हालत, सामाजिक वैमनस्य के माहौल और कोरोना वायरस के प्रबंधन जैसे मसलों पर नरेंद्र मोदी सरकार को घेरने का काम किया है.

यह स्थिति दिखाती है कि कांग्रेस भविष्य का सफर किन नेताओं के नेतृत्व में तय करेगी, इसे लेकर पार्टी में अभी कोई निर्णय नहीं लिया गया है. कांग्रेस पार्टी में नेतृत्व के संकट का सवाल न सिर्फ पार्टी के बाहर उठ रहा है बल्कि पार्टी के अंदर से भी पिछले कुछ दिनों में ऐसी कई आवाजें आई हैं. इस संदर्भ में आवाज उठाने वालों में शशि थरूर, संदीप दीक्षित, मनीष तिवारी, मणिशंकर अय्यर, अभिषेक मनु सिंघवी, ज्योतिरादित्य सिंधिया, सलमान सोज और संजय झा जैसे नेता शामिल हैं. इन नेताओं ने अपने-अपने ढंग से इस समस्या को उठाया है लेकिन सबकी बातों के मूल में नेतृत्व के सवाल को लेकर चिंता स्पष्ट है.

अब ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आजाद भारत में सबसे अधिक वक्त तक शासन करने वाली पार्टी को जब पिछले दो लोकसभा चुनावों में इतनी सीटें भी नहीं मिल पा रही हैं कि नेता प्रतिपक्ष का पद भी उसे मिल सके तो फिर इस पार्टी के लिए आगे की राह क्या होगी? लोकसभा के नियमों के हिसाब से नेता प्रतिपक्ष का पद पाने के लिए यह जरूरी है कि मुख्य विपक्षी पार्टी को लोकसभा की कुल सीटों में से दस प्रतिशत सीटें अनिवार्य तौर पर हासिल हों. जबकि पिछले दो लोकसभा चुनावों से कांग्रेस 55 सीटों के आंकड़े तक भी नहीं पहुंच पा रही है.

इन तथ्यों के आधार पर यह कहना गलत नहीं होगा कि कांग्रेस अपने गठन से लेकर अब तक के सबसे बुरे दौर में है. पार्टी के लिए यह दौर इसलिए और अधिक बुरा है क्योंकि उसकी बुरी स्थिति सिर्फ चुनावी हार-जीत के मामले में नहीं है बल्कि यह भी स्पष्ट नहीं है कि पार्टी की कमान किन हाथों में होगी. यानी कि संकट से निपटने की बात तो दूर अभी यही स्पष्ट नहीं है कि वे कौन लोग होंगे जो पार्टी को इस संकट से निकालने की दिशा में कोशिश करेंगे.

जिन नेताओं ने पार्टी में नेतृत्व संकट का सवाल उठाया है, उन नेताओं ने भी इस संदर्भ में कोई ठोस और स्पष्ट सुझाव नहीं दिया है. लेकिन इनमें से कुछ नेताओं से और कांग्रेस के कुछ अन्य नेताओं से जब सत्याग्रह संवाददाता ने बातचीत की तो इससे यह बात निकलकर आई कि अब पार्टी के नेता प्रियंका गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर देखना चाह रहे हैं. वहीं कुछ ऐसे नेता भी हैं जो यह मानते हैं कि गांधी परिवार से बाहर के किसी व्यक्ति के हाथों में पार्टी की कमान दे देनी चाहिए. लेकिन ऐसे नेताओं की संख्या और ऐसा होने की संभावना कांग्रेस पार्टी में कम लगती है.

जो नेता प्रियंका गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर देखना चाह रहे हैं, वे इस बात को लेकर उतने स्पष्ट नहीं दिखते कि 2024 के लोकसभा चुनावों को नरेंद्र मोदी बनाम प्रियंका गांधी बनाने पर काम करना चाहिए. इसका मतलब यह हुआ कि पार्टी अध्यक्ष के तौर पर तो प्रियंका गांधी को जो लोग चाह रहे हैं, वे प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर प्रियंका गांधी को लेकर सशंकित हैं.

जब इन नेताओं से इस संभावना के बारे में बात की गई कि बतौर कांग्रेस अध्यक्ष प्रियंका गांधी और प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के तौर पर राहुल गांधी को पेश करने से क्या कांग्रेस के मौजूदा संकट का समाधान हो सकता है तो पार्टी के अधिकांश नेताओं का रुख सकारात्मक दिखा. हालांकि, इस सकारात्मकता में भी कुछ आशंकाएं हैं लेकिन फिर भी ये एक बेहतर समीकरण लगता है. वहीं पार्टी के कुछ ऐसे नेता भी मिले जो कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर तो प्रियंका गांधी को चाहते हैं लेकिन प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर गांधी परिवार से किसी बाहर के व्यक्ति को पेश करने को राजनीतिक तौर पर अधिक उपयोगी मानते हैं.

अब इन बातों को सिलसिलेवार ढंग से समझने की कोशिश करते हैं. दिल्ली विधानसभा चुनावों में लगातार दूसरी बार कांग्रेस का खाता तक नहीं खुलने के बाद पूर्व सांसद संदीप दीक्षित ने यह सवाल उठाया कि कांग्रेस पार्टी की ओर से नेतृत्व संकट के समाधान के लिए कुछ नहीं किया जा रहा है. संदीप दीक्षित दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के बेटे हैं. उन्होंने कहा कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी के नए अध्यक्ष के चुनाव के लिए कुछ नहीं किया. उन्होंने यह संकेत दिया कि दिल्ली विधानसभा चुनावों में हार की एक वजह यह भी है.

संदीप दीक्षित की बातों का समर्थन पूर्व केंद्रीय मंत्री शशि थरूर ने भी किया. उन्होंने ट्विटर के जरिए कहा, ‘जो बात संदीप दीक्षित ने सार्वजनिक तौर पर कही है, वही बात देश भर के दर्जनों नेता निजी तौर पर कह रहे हैं. इनमें कई वैसे नेता भी हैं जो पार्टी में जिम्मेदार पदों पर हैं. मैं कांग्रेस कार्य समिति से एक बार फिर यह अपील करता हूं कि नेतृत्व का चुनाव पूरा किया जाए ताकि कार्यकर्ताओं में ऊर्जा का संचार हो सके और और मतदाता भी उत्साहित हो सकें.’

थरूर ने चुनाव का एक फाॅर्मूला भी दिया. वे कहते हैं, ‘कुछ लोग पूछ रहे हैं कि कौन लोग वोट देंगे और किसके लिए. आठ महीने पहले मैंने जो कहा था, उसे ही दोहरा रहा हूं. ये चुनाव 10,000 पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच होना चाहिए. इसमें अखिल भारतीय कांग्रेस समिति और प्रदेश कांग्रेस समिति के सदस्य शामिल हों. ये चुनाव कांग्रेस कार्य समिति की उन सीटों के लिए होना चाहिए जिनका निर्णय चुनाव के जरिए होता है और इसके जरिए ही पार्टी अध्यक्ष का भी चुनाव होना चाहिए.’

थरूर ने समाचार एजेंसी पीटीआई को दिए एक साक्षात्कार में यह भी कहा कि कांग्रेस पार्टी को एक पूर्णकालिक और सक्रिय अध्यक्ष की जरूरत है, इसके बिना पार्टी को लेकर लोगों में भटकाव की धारणा बन रही है. इसी साक्षात्कार में जब शशि थरूर से प्रियंका गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाने संबंधित सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा, ‘जो भी पार्टी नेता इस पद के लिए अपना नाम आगे करना चाहते हैं, उनके मैं न तो पक्ष में हूं और न विपक्ष में. जब पार्टी अध्यक्ष के लिए चुनावों की आधिकारिक घोषणा होगी तो मुझे उम्मीद है कि वे अपना नाम आगे करेंगी. प्रियंका गांधी में एक प्राकृतिक करिश्मा है और उनके पास सांगठनिक अनुभव भी है. लेकिन अंतिम बात यही है कि यह उनका व्यक्तिगत निर्णय होगा और हमें उनके निर्णय का सम्मान करना चाहिए.’

कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर प्रियंका गांधी की दावेदारी को लेकर शशि थरूर ने जो बातें कहीं, उसमें वे बतौर कांग्रेस अध्यक्ष प्रियंका गांधी का खुलकर पक्ष लेते हुए नहीं दिख रहे हैं लेकिन यह संकेत जरूर दे रहे हैं कि अगर राहुल गांधी अध्यक्ष पद पर वापसी नहीं चाहते हैं तो प्रियंका गांधी एक मजबूत विकल्प हो सकती हैं.

हालांकि कांग्रेस के पुराने नेता कर्ण सिंह कांग्रेस अध्यक्ष के पद के लिए प्रियंका गांधी की खुलकर पैरवी करते हैं. कर्ण सिंह ने पीटीआई को दिए एक साक्षात्कार में कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर प्रियंका गांधी कांग्रेस पार्टी को एकजुट करने वाली साबित होंगी. कर्ण सिंह कहते हैं, ‘पार्टी को नेतृत्वविहीन नहीं छोड़ा जा सकता. यह कांग्रेस के लिए ठीक नहीं है. अगर प्रियंका गांधी पार्टी अध्यक्ष बनने का निर्णय लेती हैं तो मैं इसका स्वागत करुंगा. लेकिन यह निर्णय उन्हें लेना है और उन पर इसके लिए दबाव नहीं बनाया जा सकता. अभी जो स्थितियां हैं और जिस परिवार से वे आती हैं, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि वे कांग्रेस को एकजुट करने का काम करेंगी.’

कर्ण सिंह आगे कहते हैं, ‘वो बहुत समझदार युवा महिला हैं. सोनभद्र मामले में वो वहां गईं और उन्होंने बहुत अच्छा काम किया. बहुत अच्छा बोलती हैं. उनका व्यक्तित्व प्रभावी है. अगर वे कांग्रेस अध्यक्ष बनने के लिए तैयार होती हैं तो उन्हें यह दायित्व क्यों नहीं दिया जाना चाहिए! उनके आने से कांग्रेस के लोगों में उत्साह पैदा होगा.’

जिस स्पष्टता के साथ बतौर कांग्रेस अध्यक्ष प्रियंका गांधी की वकालत कर्ण सिंह जैसे बुजुर्ग कांग्रेस नेता कर रहे हैं, उस तरह की बात पार्टी के वे नेता खुले तौर पर नहीं कह पा रहे हैं जिन्हें आगे भी राजनीति करनी है. जब सत्याग्रह संवाददाता ने कांग्रेस के कुछ वर्तमान नेताओं से इस बारे में बातचीत की तो इनमें से अधिकांश नेता प्रियंका गांधी को बतौर कांग्रेस अध्यक्ष देखना तो चाहते हैं लेकिन वे अपनी पहचान उजागर करके उनका पक्ष लेते हुए नहीं दिखना चाहते हैं. इनकी बातों से ऐसा लगता है कि अगर आज वे मजबूती से सार्वजनिक तौर पर प्रियंका गांधी के साथ खुलकर खड़े हो जाते हैं और कल कोई और नेता कांग्रेस अध्यक्ष बन जाता है तो उनके लिए आगे की राजनीति मुश्किल हो जाएगी. अब भी बतौर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की वापसी की संभावना भी पूरी तरह से खत्म नहीं हुई है. साथ ही गांधी परिवार से बाहर के किसी व्यक्ति को कांग्रेस अध्यक्ष बनाए जाने की संभावना को भी सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता है.

कांग्रेस के नेतृत्व संकट पर सवाल उठाकर चर्चा में आए पार्टी के एक पूर्व सांसद अपनी पहचान उजागर नहीं करने की शर्त पर सत्याग्रह को बताते हैं, ‘राहुल गांधी के प्रति मेरा पूरा सम्मान है. लेकिन बतौर कांग्रेस अध्यक्ष और बतौर कांग्रेस उपाध्यक्ष उन्होंने जिस तरह की राजनीति की है, उससे उनके प्रति लोगों में एक धारणा यह बनी है कि वे एक अनिच्छुक राजनेता हैं. उनके बारे में यह भी एक धारणा बनी है कि अभी की राजनीति में जितने दांव-पेंच की जरूरत है, उसमें उनका कोई खास यकीन नहीं है. साथ ही उन पर यह आरोप भी लगता है कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की तरह दिन-रात 24 घंटे वाली राजनीति नहीं करते. इसी आधार पर भाजपा के लोग राहुल गांधी को मौसमी नेता कहते हैं. लगातार दो लोकसभा चुनावों में बुरी हार के बाद कांग्रेस नेताओं को भी यह लग रहा है कि मोदी और शाह की भाजपा से निपटने के लिए कुछ अलग ढंग के नेतृत्व की जरूरत है.’

वे आगे कहते हैं, ‘इन नई जरूरतों के हिसाब से प्रियंका गांधी बतौर कांग्रेस अध्यक्ष अधिक उपयोगी दिखती हैं. कांग्रेस महासचिव बनाए जाने के बाद उन्हें पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया गया. मैं 2019 लोकसभा चुनावों के परिणामों के संदर्भ में उनके प्रदर्शन को नहीं देखना चाहता. लेकिन आप देखिए कि चुनावों के बाद पूर्वी उत्तर प्रदेश में जनता के स्तर पर जो भी प्रदर्शन हुए और जहां भी यह लगा कि आम लोगों के खिलाफ सरकार अत्याचार कर रही है, प्रियंका गांधी वहां जाकर आम लोगों के साथ खड़ी हो गईं. सोनभद्र का मामला सबको पता है. दरअसल, चुनाव के दौरान तो नेतृत्व की परीक्षा होती ही है लेकिन चुनावों के बाद जो आम लोगों के रोजमर्रा के संघर्ष हैं, उनमें लोगों के साथ खड़ा होना ही नेतृत्व की असली परीक्षा है. प्रियंका गांधी जिस ढंग से पूर्वी उत्तर प्रदेश में आम लोगों के साथ खड़ी दिख रही हैं, उसका सकारात्मक परिणाम पार्टी कार्यकर्ताओं के मनोबल पर भी दिख रहा है. पूर्वी उत्तर प्रदेश के जो कांग्रेसी कार्यकर्ता आजकल मिलते हैं, उनमें अलग ढंग का उत्साह दिखता है. इसलिए मुझे लगता है कि संकट की इस घड़ी में अगर प्रियंका गांधी कांग्रेस अध्यक्ष बनती हैं तो पूर्वी उत्तर प्रदेश में जो प्रयोग उन्होंने किया है, उसी प्रयोग को स्थानीय जरूरतों के हिसाब से संशोधित करके वे पूरे देश में कर सकती हैं. जाहिर तौर पर इससे पार्टी का संकट धीरे-धीरे कम होता जाएगा.’

मनमोहन सिंह सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे एक कांग्रेसी नेता प्रियंका गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाने के फायदों को गिनाते हुए कहते हैं, ‘हम लोग जमीनी स्तर पर जब जाते हैं तो पाते हैं कि प्रियंका गांधी को लेकर लोगों में काफी क्रेज है. खास तौर पर युवाओं और महिलाओं में. जिस तरह से वे हिंदी बोलती हैं, उससे वे पूरी हिंदी पट्टी के लोगों के साथ संवाद स्थापित करने में सक्षम हैं. गुजरात और महाराष्ट्र जैसे लोगों को भी उनकी हिंदी पसंद आएगी. अंग्रेजी के जरिए वे दक्षिण भारत के लोगों से संवाद स्थापित करने में सक्षम हैं. कार्यकताओं में उनके प्रति उत्साह है. महिला होने के नाते महिलाओं के बीच उनकी खास अपील है. वे जिस भावनात्मक ढंग से संवाद स्थापित करती हैं, उसका फायदा भी पार्टी को मिलेगा. सबको मालूम है कि प्रियंका गांधी के एक बयान से रायबरेली में अरुण नेहरू चुनाव हार गए थे. टेलीविजन और इंटरनेट की दुनिया में जिस तरह से खबरें चलती हैं, उसमें प्रियंका गांधी का आकर्षक दिखना भी एक सकारात्मक पक्ष है.’

प्रियंका गांधी के पति राॅबर्ट वाड्रा पर कुछ आरोप हैं और उनके खिलाफ कुछ मामलों में जांच भी चल रही है. ऐसे में अगर प्रियंका गांधी कांग्रेस अध्यक्ष बनती हैं तो क्या इससे कांग्रेस को परेशानी नहीं होगी? इस सवाल के जवाब में जिस केंद्रीय मंत्री का जिक्र पहले किया गया है, वे कहते हैं, ‘उनके पति राॅबर्ट वाड्रा पर कुछ आरोपों को छोड़ दीजिए तो प्रियंका गांधी पर अब तक कोई दाग नहीं है. राॅबर्ट वाड्रा मामले में भी प्रियंका गांधी ने यह दिखा दिया है कि राजनीतिक तौर पर इसका सामना कैसे करना है. इसलिए अब पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं को इसकी कोई खास चिंता नहीं है. सही बात तो यह है कि अगर प्रियंका गांधी कांग्रेस अध्यक्ष रहती हैं और चुनावों से पहले मोदी सरकार उनके पति के खिलाफ कार्रवाई करती है तो इसका चुनावी लाभ लेने में भी वे सक्षम हैं.’

मोटे तौर पर देखें तो पार्टी नेताओं में प्रियंका गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाने पर एक राय दिखती है. इसकी वजह उनकी खूबियों के अलावा यह भी है कि अधिकांश कांग्रेसी नेताओं को लगता है कि अब भी गांधी परिवार ही एक ऐसी ताकत है जो पूरी कांग्रेस को एक सूत्र में बांधे रख सकती है. पार्टी नेताओं को यह भी लगता है कि अगर गांधी परिवार से बाहर का कोई व्यक्ति पार्टी अध्यक्ष बनता है तो इससे पार्टी में गुटबाजी अपने चरम पर पहुंच जाएगी.

इस बारे में कांग्रेस के एक राष्ट्रीय पदाधिकारी कहते हैं, ‘इसे मैं अभी के उदाहरणों के जरिए समझाता हूं. गांधी परिवार केंद्रीय स्तर पर नेतृत्व दे सकता है लेकिन प्रदेश स्तर पर नहीं दे सकता. इसलिए आप देखेंगे कि अभी प्रदेश कांग्रेस के स्तर पर जबर्दस्त गुटबाजी देखने को मिल रही है. मध्य प्रदेश की स्थिति सबके सामने है. और अब तक यहां कांग्रेस के कम से कम तीन प्रमुख कैंप रहे हैं. मुख्यमंत्री कमलनाथ, पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया के कैंप. ऐसे ही राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट का संघर्ष दिख रहा है. पंजाब में मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के साथ संघर्ष की वजह से नवजोत सिंह सिद्धू ने मंत्री पद से इस्तीफा दिया. गुजरात कांग्रेस में भी यही चल रहा है. ऐसे में अगर पार्टी अध्यक्ष के तौर पर गांधी परिवार से बाहर का कोई व्यक्ति आता है तो कांग्रेस में केंद्रीय स्तर पर भी यही स्थिति पैदा हो सकती है. यानी कि राहुल गांधी पहले ही अध्यक्ष पद से हट गए हैं तो प्रियंका गांधी ही एकमात्र विकल्प बचती हैं.’

जिस तरह की सहमति प्रियंका गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाने को लेकर दिखती है, उस तरह की सहमति कांग्रेस पार्टी में राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने को लेकर नहीं दिखती. लेकिन अधिकांश नेता ऐसा मानते हैं कि इस योजना पर अभी से काम किया जा सकता है और 2024 के लोकसभा चुनावों से साल भर पहले स्थितियों का आकलन करके राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने या नहीं करने का निर्णय लिया जा सकता है. उम्मीदवारी को लेकर भले ही पूरी सहमति नहीं दिखती हो लेकिन अगर कांग्रेस को 2024 के चुनावों में जीत हासिल होती है तो उसके बाद राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने पर पार्टी में सहमति दिखती है.

दिल्ली की ही एक सीट से लोकसभा सांसद रहे और मनमोहन सिंह सरकार में मंत्री रहे पार्टी के एक नेता इस बारे में कहते हैं, ‘बतौर कांग्रेस अध्यक्ष प्रियंका गांधी और अगर सरकार बनाने की स्थिति बनती है तो बतौर प्रधानमंत्री राहुल गांधी एक ऐसा समीकरण है जिसे कई चुनावों तक परास्त नहीं किया जा सकता. लेकिन मुझे लगता है कि राहुल गांधी को अभी से ही प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया जाना चाहिए. क्योंकि इससे भाजपा एक बार फिर से चुनाव को मोदी बनाम राहुल कर देगी और इस प्रयोग में भाजपा दो बार सफल भी रही है. परिवारवाद का आरोप भी भाजपा आक्रामक ढंग से लगाएगी. ऐसे में पार्टी की रणनीति यह होनी चाहिए कि अभी प्रियंका गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाया जाए. लोकसभा के अंदर सरकार को घेरने का काम राहुल गांधी करें. गवर्नेंस से जुड़े मसलों पर मोदी सरकार पर प्रहार का काम वे करें. वहीं दूसरी तरफ सड़क पर प्रदर्शन का नेतृत्व प्रियंका गांधी करें. चुनावों के पहले राहुल गांधी चुनाव अभियान समिति के प्रमुख बनाए जाएं. अगर चुनावों के बाद सरकार बनाने की स्थिति आती है तो प्रधानमंत्री का पद प्रियंका गांधी को नहीं बल्कि राहुल गांधी को दिया जाए.’

सरकार बनाने की स्थिति आने पर भी प्रियंका गांधी के पार्टी अध्यक्ष बने रहने और राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने के फायदों के बारे में वे कहते हैं, ‘अभी के सियासी दांवपेंच आजमाने के मामले में राहुल गांधी से अधिक प्रभावी प्रियंका गांधी हैं. इसलिए अगर सरकार बनाने की स्थिति आती भी है तो प्रियंका गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष रहते हुए प्रदेश स्तर पर पार्टी को सांगठनिक तौर पर मजबूत करने का काम करते रहना चाहिए. जिस तरह का काम अमित शाह ने 2014 के बाद भाजपा के लिए किया. 2019 में भाजपा के अकेले 300 सीटों के पार पहुंचने की एक वजह यह भी थी. जबकि गवर्नेंस के स्तर पर राहुल गांधी अधिक उपयोगी होंगे. उनमें राजनीति को लेकर थोड़ी अनिच्छा का भाव भी है. ऐसे लोग सरकार चलाने में अधिक प्रभावी साबित होते हैं. मनमोहन सिंह का उदाहरण सबके सामने है. पार्टी में आंतरिक स्तर पर जो संघर्ष चलता है, उसके समाधान में भी ऐसे लोग अधिक प्रभावी साबित होते हैं. क्योंकि ऐसे लोग राजनीतिक तौर पर किसी के शत्रु नहीं होते बल्कि सबके प्रति एक ही भाव से काम करते हैं. ऐसे लोग सरकार चलाने के लिए कठोर निर्णय भी ले पाते हैं. प्रधानमंत्री के तौर पर ऐसा व्यक्ति इसलिए भी जरूरी है कि मोदी सरकार जो अर्थव्यवस्था विरासत के तौर पर अगली सरकार को देगी, उसमें समाधान के लिए कई कठोर निर्णय लेने होंगे. प्रधानमंत्री के तौर पर राहुल गांधी और पार्टी अध्यक्ष के तौर पर प्रियंका गांधी की जोड़ी मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी की तरह साबित हो सकती है. मैं याद दिलाना चाहता हूं कि चाहे जितना भी आरोप लगा हो लेकिन सोनिया और मनमोहन की जोड़ी ने दस साल तक पार्टी और सरकार चलाने का काम प्रभावी ढंग से किया.’

हालांकि, सोनिया-मनमोहन के मुकाबले प्रियंका-राहुल की जोड़ी एक मायने में अलग होगी. इसकी चर्चा किसी कांग्रेसी नेता ने नहीं की. इस बारे में कुरेदने पर भी ये नेता कुछ कहने से बचते हुए ही दिखे. मनमोहन सिंह पर यह आरोप लगता था कि भले ही वे प्रधानमंत्री हों लेकिन उनकी सरकार का रिमोट कंट्रोल सोनिया गांधी के पास था. राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के यह आरोप उनकी जोड़ी पर नहीं लग पाएगा.