पांच मार्च की शाम को फ़तेहपुर की सीमा में घुसते ही स्थानीय पुलिस पैदल चल रहे सत्याग्रहियों पर दबाव बना रही थी कि वे या तो पुलिस की गाड़ियों में बैठकर कानपुर की सीमा में छोड़ दिए जाने को तैयार हो जाएं, या फिर उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाएगा. इन्हें इनके रात्रि विश्राम स्थल तक तो पहुंचने दिया गया, पर गाज़ीपुर की तरह ही चार पुलिसकर्मी इनके साथ थे. देर शाम तक इन सत्याग्रहियों से पुलिस की बातचीत होती रही. पुलिस का कहना था कि शहर में इन पर हमला किया जा सकता है. और स्थितियां खराब हो सकती हैं. 11 फ़रवरी को जब ग़ाज़ीपुर में मुझे और इन सत्याग्रहियों को गिरफ़्तार किया गया था तब संबंधित उप-ज़िलाधिकारी का तर्क यह था कि चलने वालों के साथ भीड़ खड़ी हो सकती है और स्थितियां खराब हो सकती हैं. प्रशासन की ओर से हर बार अलग-अलग तर्क आते हैं, जो ज़मीन पर साफ नहीं दिखाई देते.

देर रात सोने से पहले अंतिम संदेश मुझ तक यह पहुंचा कि सत्याग्रही अगली सुबह सर्वधर्म प्रार्थना के बाद फ़तेहपुर शहर की तरफ बढ़ेंगे, वे पुलिस की गाड़ी में बैठकर कानपुर नहीं जाएंगे. सत्याग्रहियों में आपस में बातचीत हुई कि पुलिस द्वारा रोके जाने या जेल में डाले जाने की स्थिति में क्या करना चाहिए. फ़तेहपुर की सिविल सोसाइटी, बार असोसिएशन या राजनीतिक दलों आदि के संपर्क सूत्र इनके पास नहीं थे. कुछ चार-पांच स्थानीय लोग ज़रूर फ़तेहपुर में इनके साथ चल रहे थे, उनके संपर्क सूत्रों तक बात जाती है. बात इस पर भी होती है कि जेल जाने की स्थिति में अगले कुछ दिनों क़ानूनी कार्रवाई न हो सकेगी. यूं भी हमारी अदालतों में काम अपनी ही रफ्तार से चलता है. पिछले दिनों जेल में मिली एक महिला की क़ानूनी कार्रवाई में सिविल सोसाइटी के कुछ साथियों द्वारा की जा रही मदद को करीब से देखते हुए यह बात मैं अनुभव से कह सकती हूं. पिछले 15 दिनों में दो बार उसे नई तारीख़ इसलिए दी गई कि किसी वकील की मृत्यु के कारण काम नहीं होना था, और एक बार इसलिए कि न्यायाधिकारी मौजूद नहीं थे.

सत्याग्रह को बाहर से समर्थन दे रहे एक साथी ने इस मामले में लिखा - “1. बैकअप/नेटवर्क न होने की स्थिति में पुलिस से कन्फ्रंटेशन में नहीं जाना चाहिए. 2. होली और कुछ अन्य वजहों से कोर्ट में लंबी छुट्टियां होने को हैं. ज़मानत वग़ैरह की प्रक्रिया में अड़चन आएगी. उक्त दो बिंदुओं के बाद भी यदि साथी गिरफ्तारी देना चुनते हैं तो कम से कम स्थानीय स्तर पर लीगल (बार काउंसिल वग़ैरह), राजनैतिक (सांसद, विधायक, पंचायत अध्यक्ष, राजनीतिक दलों के अध्यक्ष आदि), पत्रकार सर्किल, सामाजिक कार्यकर्ताओं के नेटवर्क आदि से बात करनी चाहिए.”

यात्रा में चल रहे मनीष ने इसके जवाब में लिखा, “किसी भी तरीके का कन्फ्रंटेशन नहीं है. न होगा. हम तयशुदा जगह पर प्रार्थना सभा के लिए आगे बढ़ेंगे. सर्वधर्म प्रार्थना दंगा नहीं फैला सकती, हम प्रार्थना करेंगे. हमारे लोकल नेटवर्क वही हैं, जो साथ पैदल चल रहे हैं. हम किसी से मदद के लिए नहीं कहेंगे, न ज़मानत के लिए कहेंगे. पुलिस अपना काम करे, हम उनकी मदद करेंगे.”

मैं दोनों साथियों की बात अपनी जगह सही पाती हूं. चल रहे साथी को अपने इरादे के प्रति निष्ठा है कि एक आज़ाद देश में चलने और बात करने पर रोक क्यों हो, प्रार्थना करने पर रोक क्यों हो. बाहर से समर्थन दे रहे और जेल जाने की स्थिति में सब संभाल रहे साथी की चिंता अपनी जगह वाजिब है. जब तक जेल में बंद साथी रिहा नहीं हो जाते, उन्हें सब छोड़कर सिर्फ इसी काम में लगना है. यह काम कितना कठिन है, कितनी आशंकाओं और डरों से भरा है, यह वे ही बेहतर बता सकते है.

तो अगले दिन यानी छह मार्च को ये सात लोग, जिनमें एक नए जुड़े साथी जितेश मिश्रा पिछले शहर इलाहाबाद से हैं और दूसरे आशुतोष राय फ़तेहपुर से ही हैं, शहर की तरफ बढ़ते हैं. शहर से पहले कोई 350-400 की संख्या में पुलिस बैरीकेडिंग के साथ तैयार है. इन्हें हिरासत में ले लिया जाता है. शाम तक इन्हें हुसैनगंज थान में रखा जाता है फिर फ़तेहपुर जेल में भेज दिया जाता है.

पहले तो हुसैनगंज के थानाध्यक्ष इन लोगों की गिरफ़्तारी से इनकार कर देते हैं. मैं खुद भी बात करती हूं तो यही कहा जाता है. लेकिन तीन बजे जब इलाहाबाद के एक साथी अक्षय हुसैनगंज थाने पहुंचते हैं तो वे पुष्टि करते हैं कि सब सत्याग्रही वहीं है. पुलिस झूठ बोलती रही है. अक्षय मेरी बात मनीष शर्मा से कराते हैं. मैं मनीष से पूरा घटनाक्रम पूछती हूं. वे बताते हैं कि पुलिस उनसे माफ़ीनामे पर दस्तख़त कराना चाहती है. माफ़ीनामे की भाषा यह है कि सत्याग्रहियों को शांति भंग के आरोप में हिरासत में लिया गया है. यदि वे माफ़ी मांगते हैं और पुलिस की गाड़ी से कानपुर छोड़े जाना स्वीकार करते हैं तो उन्हें छोड़ दिया जाएगा. सत्याग्रहियों को यह स्वीकार नहीं. वे कानपुर उसी तरह जाना चाहते हैं, पैदल, लोगों से संवाद करते हुए.

मैं मनीष से पूछती हूं कि क्या वे लोगों को कुछ कहना चाहते हैं. वे कहते हैं, “धर्म और जाति में रोज़ बांटे जा रहे समाज और समाज में बढ़ती हिंसा को रोकने का एक ही रास्ता है, एक दूसरे से मिलना, संवाद स्थापित करना. हम चंद लोग हैं, पर संवाद की कोशिश कर रहे हैं क्योंकि हमें इस देश के शांतिप्रिय लोगों पर आस्था है. इसके लिए यदि हम जेल जाते हैं तो हम माफ़ी नहीं मांगेंगे. हम देश के शांतिप्रिय नागरिकों के सहयोग की प्रतीक्षा करेंगे. यही हमारा सत्याग्रह है.”

पुलिस और सत्याग्रह का नाता इतिहास तक जाता है. सत्याग्रह शासन के ख़िलाफ़ नहीं होता, उसकी मदद के लिए होता है. सत्याग्रह इंगित करता है कि शासन में सुधार की ज़रूरत है. पर शासन उसे अपने ख़िलाफ़ मान लेता है. और उसे दबाने, तोड़ने, ख़त्म करने के लिए हरसंभव प्रयास करता है, पुलिस का इस्तेमाल करता है. यह शासन की बुनियादी ख़ामी है. चूंकि पुलिस उसकी अंग है, यह ख़ामी उसमें भी प्राकृतिक रूप से चली आती है.

गांधी ने पुलिस और जेल सुधारों के बारे में कई बार लिखा. उन्होंने स्वतंत्र भारत की पुलिस के बारे में सपना देखा कि वह हिंसा पर नहीं चलेगी. पांच मई 1946 को हरिजन में उन्होंने लिखा, “स्वतंत्र भारत की पुलिस अहिंसक होगी. भारत में अपराध हो सकते हैं पर कोई अपराधी न होगा. उन्हें सज़ा न होगी. अपराध एक रोग है, किसी भी अन्य बीमारी की तरह प्रचलित सामाजिक व्यवस्था का एक उत्पाद. इसलिए हत्या सहित किसी भी अपराध को बीमारी की तरह समझ कर उसका उपचार किया जाना चाहिए. कभी उस तरह का भारत बन भी सकेगा या नहीं, यह दूसरा सवाल है.”

पुलिस जब निहत्थे किसानों और प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलाती है, या फिर पैदल चलने वालों को गिरफ्तार करती है तो गांधी की हत्या के 72 साल बाद हमारी व्यवस्था उस सोच से कितनी दूर खड़ी है यह बिलकुल स्पष्ट दिखने लगता है.

पर पुलिस यहां बड़ी बीमारी का एक छोटा लक्षण भर है. बड़ी बीमारी जनता के हितों के साथ खड़ा होने में शासन की अक्षमता है. अंग्रेज़ी सरकार ने जब नमक पर कर बढ़ाया, तो उसके विरोध में नमक सत्याग्रह शुरू हुआ. 12 मार्च 1930 को गुजरात के असलाली में गांधी ने जो कहा, उसका ज़िक्र यहां किया जा सकता है.

“एक लोकतांत्रिक राज्य वह है जिसके पास उस कर को समाप्त करने का अधिकार है जिसका भुगतान नहीं होना चाहिए. यह वह राज्य है जहां लोग तय करें कि कौन सा भुगतान होना चाहिए कौन सा नहीं. पर हमारे पास ये अधिकार नहीं हैं. इसी तरह हमारे प्रतिनिधियों के पास भी ये अधिकार नहीं हैं. केंद्रीय विधान सभा में पंडित मदन मोहन मालवीय ने कहा कि जिस तरह सरदार वल्लभ भाई पटेल को गिरफ़्तार किया गया, उसे न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता; यह अन्यायपूर्ण और क्रूर था. और इस प्रस्ताव को श्रीमान जिन्ना का समर्थन मिला. इसके जवाब में सरकारी अधिकारी ने कहा कि उनके न्यायाधिकारी ने वही किया था जो एक वफ़ादार अधीनस्थ के लिए उपयुक्त था. अगर वह ऐसा न करता तो उसे ग़द्दार माना जाता. अगर यह स्थिति है तो इस दाढ़ी वाले व्यक्ति (अब्बास साहेब) और मुझे भी गिरफ्तार किया जाना चाहिए, क्योंकि मैं तो नमक बनाने के बारे में खुले आम भाषण दिया करता हूं.

हमें एक ऐसी सरकार बनानी है जो जनता की इच्छा के ख़िलाफ़ किसी एक भी व्यक्ति को गिरफ़्तार न कर सके, जो हम से चार आने की कीमत बराबर घी भी न निकाल सके, हमारी गाड़ियां न ले जा सके, हमसे पैसा न ऐंठ सके. ऐसी सरकार दो तरह से बनाई जा सकती है. एक तो बड़े डंडे और हिंसा के ज़ोर से और दूसरी अहिंसा और सविनय अवज्ञा से. हमने दूसरा रास्ता चुना है और इसे अपना धर्म माना है. इसीलिए हम सरकार को ज्ञापन देने के बाद आज नमक बनाने निकले हैं.”

इसे पढ़ने के बाद स्वतंत्रता से पहले की और आज की, दोनों स्थितियों को एक साथ रखकर देखा जा सकता है. इन सत्याग्रहियों ने यात्रा शुरू करने से पहले और ज़िले में घुसने से पहले प्रशासन को सूचना दी थी, इसके बावजूद उसके वफ़ादार अधीनस्थों द्वारा उन्हें गिरफ़्तार किया जा रहा है. अब आज़ादी शब्द को ही देशद्रोही मान लिए जाने के इस समय में हमारी नागरिक स्वतंत्रता पर सवाल किए जाने की ज़रूरत स्वयं साफ़ हो जाती है. यह आलेख लिखे जाने तक सातों सत्याग्रही जेल में ही हैं और अब तक यह तय नहीं किया गया है कि उन पर क्या कार्रवाई की जानी है.