इसमें कोई सन्देह नहीं कि पिछले एकाध बरस में हम जैसे कई लोग उम्मीद और नाउम्मीदी के बीच विजड़ित से होते रहे हैं. जो कुछ हो रहा है वह इतनी तेज़ी से हो रहा है कि उसे ठीक से सहने-समझने का समय ही जैसे नहीं मिल पा रहा है. हर दिन बल्कि हर दिन कई बार कुछ न कुछ अप्रत्याशित घटता जाता है: क्रूरता, हिंसा, नीचता और अन्याय हर दिन इस क़दर तेज़ी से और इतने नीचे गिर रहे हैं कि यक़ीन नहीं होता कि हम एक लोकतंत्र और क़ानून के राज में रह रहे हैं.

सत्ता, उसके अनेक अंग, पुलिस, प्रशासन आदि या तो क्रूरता और उन्माद बढ़ाने में शामिल हैं या यह सब चुपचाप निष्क्रिय होकर देख रहे हैं. न्यायाधीश घृणा वक्तव्यों पर आधी रात को विचारकर उसके वक्ताओं के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज़ करने का निर्देश देते हैं तो उच्च न्यायालय सरकार को इस पर विचार करने के लिए एक माह का समय दे देता है. अगले ही दिन एक घृणा-वक्ता स्वयं चुप रहकर एक शांति मार्च में शामिल होता है जिसमें ‘गोली मारो सालों को’ के नारे अबाध गूंजते हैं और ज़ाहिर है कि न्याय-व्यवस्था इसकी अनदेखी कर रही है.

हिंसा और क्रूरता भर में बेहद तेज़ी है: ब़ाकी न्याय, व्यवस्था, कार्रवाई आदि में आश्चर्यकारी आलस्य या सुस्ती है. यही नारा कोलकाता की एक चुनावी सभा में फिर गूंजता है. इधर महीनों से लंबित एक मामले में दिल्ली सरकार राजद्रोह के मामले में अचानक अभियोजन की मंजूरी दे देती है: यह सरकार दिल्ली में हुए दंगों के बारे में चुप रहती है और उसके लोकप्रिय मुख्यमंत्री उच्च न्यायालय के निर्देश के बाद पीड़ितों से मिलने जाते हैं!

इस सबको लेकर क्षुब्ध और उद्वेलित लेखकों-कलाकारों ने अपना विरोध और गहरी चिन्ता जताने के लिए जन्तर मन्तर में कुछ घण्टों की एक सभा की जिसमें बहुत सारे लेखकों-कलाकारों ने भाग लिया. बहुत सारे युवा कवियों ने कुछ मार्मिक और तीख़ी कविताएं पढ़ीं. कई वक्ताओं ने तर्कों और तथ्यों के साथ अपना गहरा विरोध व्यक्त किया. इस सबको देखकर ऐसा लगता है कि धीरे-धीरे उम्मीद का नया स्थापत्य गढ़ा जा रहा है और वे सारे लोग जो देश की स्वतंत्रता-समता-न्याय के संवैधानिक मूल्यों की रक्षा और भारतीय जीवन और परम्परा की बहुधार्मिक-बहुभाषिक बहुलता को बचाना चाह रहे हैं वे, अपने अन्य वैचारिक मतभेद भुलाकर, एकजुट हो रहे हैं.

शाहीन बाग़ की दादियों ने एक अहिंसक रास्ता दिखाया है: इस समय वे उम्मीद की स्थपति बन कर उभरी हैं. किसी न किसी अर्थ में अब भारतीय संविधान, शायद अपने इतिहास में पहली बार, लोक संविधान बन गया है. यह विडम्बना अनदेखी नहीं जायेगी कि एक ऐसे समय में जब सत्ता, न्याय आदि की कई संस्थाएँ अपना संवैधानिक कर्तव्य निभाने में चूक रही हैं, आम नागरिक उसकी रक्षा और लोकतांत्रिक व्याख्या के लिए सामने आ रहे हैं. धर्म-जाति-सम्प्रदाय-विचारधारा आदि की भिन्नताएं और मतभेद शायद अतिक्रमित हो रहे हैं, अगर पूरी तरह से ग़ायब नहीं. जब इतना घना अंधेरा हो जितना कि आज, दुर्भाग्य से, है तो उम्मीद की हलकी सी लौ भी बहुत कुछ रौशन कर देती है. अलबत्ता फिलवक़्त यह स्थापत्य अस्थिर सा है और हमें चौकन्ना रहने की ज़रूरत है: एक तरह की चौकन्नी नाउम्मीदी?

कविता से बाहर

क्या हम एक ऐसे दौर में हैं जब इतना कुछ भयावह, क्रूर और हिंसक और आसपास लगातार हो रहा है कि लगता है इस सबको समझना-सहना कविता में बने रहकर सम्भव नहीं है और हमें कविता से बाहर आ जाना चाहिये. इसका अर्थ यह होगा कि हमें अपना कविधर्म स्थगित कर नागरिक धर्म निभाने पर ज़ोर देना चाहिये. जो कुछ हो रहा है वह इतना तत्काल है कि हम उसे कविता में जल्दी से समेट या समो नहीं सकते. क्या, कविधर्म और नागरिक धर्म में से फ़िलवक़्त नागरिक धर्म को चुनना चाहिये और कविधर्म को थोड़ी देर के लिए भूल जाना चाहिये?

अगर हम ऐसा करते हैं तो इसका आशय यह होगा कि हम कविधर्म को नागरिक धर्म का हिस्सा नहीं मानते. यों उनके बीच दूरी हमेशा रहती है और जब-तब तनाव भी. पर कविता भी हमारी नगारिकता का हिस्सा है और कम से कम उसे लिखने-पढ़नेवालों के लिए यह सही है इसे हम भूल नहीं सकते. हमें यह याद रखना चाहिये कि इस समय राजनीति-धर्म-बाज़ार-मीडिया सब मिलकर हमारी भाषा को विकृत-दूषित कर रहे हैं और ऐसे अभागे समय में भाषा को बचाकर, उसकी सूक्ष्मता-जटिलता-निर्भयता को सहेजकर कविता एक अनिवार्य नागरिक कर्तव्य ही निभा रही है. कई बार यह महसूस होता है कि कम से कम कवियों को कि अपने निजी और सार्वजनिक दोनों ही जीवन में वे सबसे निर्भय और इसलिए सच्चे कविता में ही होते हैं. कविता का ईमान एक साथ भाषा का और मनुष्य का ईमान होता है: उसमें हमारा अंतःकरण रूपायित होता और निवास करता है.

फिर ऐसे समय में हम कविता से क्या उम्मीद करें? अंधेरे समय में अंधेरे समय की कविताएं होने की बात कही गयी है: क्या जो अंधेरा आज सार्वजनिक जीवन और कइयों के घर-परिवारों में छा गया है वह कविता में जगह पा रहा है? क्या कविता उसकी साखी है, उसे दर्ज़ कर रही है? इसके उत्तर में अगर ध्यान से आज की कविता के साक्ष्य को अनेक सक्रिय कविदृष्टियों और शैलियों को देखें तो कहना होगा कि कविता आज ऐसा कर रही है. बहुत सी कविता तुरत पहचाने जा सकनेवाले रूपों में. ऐसी भी काफ़ी कविता है जो अधिक सूक्ष्म है पर उसमें भी, फिर ध्यान से देखें तो, इस अँधेरे की शिनाख़्त मौजूद है.

एक और बात है. बहुत सारे काम ऐसे हैं जो कविता नहीं कर सकती. जिस तरह की भाषिक और सांस्कृतिक सामुदायिकता, उदाहरण के लिए भक्तिकालीन कवि या स्वतंत्रता संग्राम के दौरान सक्रिय कवियों को सहज मिली थी वैसी सामुदायिकता आज नहीं है. ‘राहों के अन्वेषी’ कहे जाने वाले कवि, दरअसल, भटकते हुए लोग हैं. उनकी नागरिक निष्ठा असंदिग्ध है पर उनके रास्ते अनिश्चित. इसलिए उनसे अधिक से अधिक इतनी उम्मीद भर की जा सकती है कि वे विकल्पहीनता, निरुपायता, घृणा और अत्याचार की शक्तियों को प्रश्नांकित करने का हौसला रसिकों को दे सकती हैं. आज प्रश्नांकन भी नागरिक साहस की मांग करता है: कविता ऐसे साहस का एक पता हो सकती है.

हिंसा, क्रूरता और झूठ

इन दिनों हिंसा, क्रूरता और झूठ इतनी तेज़ी से युवा लोगों में व्याप रहे हैं कि लगता है कि ये नया रोज़गार हो गये हैं. जिन युवाओं को पारंपरिक रोज़गार अब तक सारे अच्छे दिनों के वायदों के बावजूद नहीं मिल पाया है वे यह नया रोज़गार पाकर, लगता है, सन्तोष हासिल कर रहे हैं: यह युवाओं का, थोड़ा अप्रत्याशित सही, सशक्तीकरण है. इस रोज़गार से उसमें लगे सभी को कोई आर्थिक लाभ मिलता या नहीं यह नहीं कहा जा सकता. पर इतना तो स्पष्ट है उनसे कुछ मनोवैज्ञानिक और शायद आध्यात्मिक सन्तोष ज़रूर मिल रहा है. इस मुक़ाम पर यह काफ़ी है.

महात्मा गांधी ने जो भी सोचा-कहा हो, हिंसा मनुष्य के स्वभाव का अनिवार्य हिस्सा है. अब तक उसे थामने के प्रयत्न को सभ्य बनने का उपक्रम माना जाता है: हमारे समय में जो नया सभ्य या नागरिक आचरण आकार ले रहा है उसमें इस हिंसा को दबाने की नहीं खुलकर खेलने की छूट देना नयी भद्रता है. क्रूरता हिंसा का ही अधिक उग्र संस्करण है: हम लोकतांत्रिक राष्ट्र हों या नहीं, हर दिन एक हिंसक और क्रूर राष्ट्र ज़रूर बनते जा रहे हैं. यह उग्र उन्नयन हमारी नयी भारतीयता होने जा रही है: उसमें पुरुषार्थ इसमें होगा कि आप ‘दूसरों’ से कितना हिंसक और क्रूर व्यवहार कर सकते हैं. यही अब वीरता का नया प्रतिमान होने जा रहा है. निहत्थों पर वार करना, ग़रीबों के घरबार लूटना, बलात्कार, बच्चों के साथ मुनासिब बेरहमी, दूकानें जलाना आदि वीरता की नयी अभिव्यक्तियां हैं. घृणा फैलाना एक ज़रूरी नैतिक कर्तव्य है.

झूठ इस नयी नागरिकता का एक ज़रूरी पहलू है. जो जितना झूठ बोले वह उतना सफल और लोकप्रिय वक्ता. झूठ को फैलने के लिए राजनीति, मीडिया, धार्मिक और बौद्धिक मंच आदि सब जितनी आसानी से आज सुलभ हैं उतने पहले कभी नहीं थे. सच बोलना इस नये समाज में एक अल्पसंख्यक कार्रवाई है जिसका हर दिन सिर कुचलना लगभग शास्त्र-सम्मत धर्म है. झूठ अब हर जगह फैल गया है: झूठ और झूठ बोलनेवालों में इतना आत्मविश्वास पहले कभी नहीं था. झूठ बोलने के अवसर अब सिर्फ़ चुनावी भाषण नहीं है: वे रोज़ शिखर से नीचे तक बोले जाते हैं और उन्हें लोग लगातार ठीक मानकर व्यवहार कर रहे हैं.

झूठ का दरबार अब हर कहीं लग रहा है: उसमें जी हुजूरी करनेवाले लगभग असंख्य होते जा रहे हैं. परम्परा, धर्म, इतिहास, संस्कृति, राजनीति, ख़बर, विश्लेषण आदि सबके नाम पर झूठ का भोज परोसा जा रहा है. हम अब क़ानून के राज में रहते हैं कि नहीं यह कहना मुश्किल है पर हम झूठ के राज में रह रहे हैं इसमें सन्देह नहीं.