बीते दिसंबर में झारखंड विधानसभा चुनाव के नतीजों में भाजपा को तगड़ा झटका लगा था. सत्ता में वापसी का दावा कर रही पार्टी 81 विधानसभा सीटों में से महज 25 जीत सकी. मुख्यमंत्री रघुवर दास तक अपनी सीट हार गए. इसके दो महीने बाद पार्टी जेवीएम मुखिया बाबूलाल मरांडी की ‘घर वापसी’ कर उन्हें नेता प्रतिपक्ष बना चुकी है. इसके एक दिन बाद ही झारखंड भाजपा को दीपक प्रकाश के रूप में नया अध्यक्ष भी मिल गया.

अब कांग्रेस पर आते हैं. बीते साल लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की एक बार फिर बुरी फजीहत हुई. इसके बाद तत्कालीन अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस्तीफा दे दिया. तब से अब तक 10 महीने होने को आए, लेकिन कांग्रेस को नया अध्यक्ष नहीं मिल सका है.

राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद नए अध्यक्ष को लेकर खूब मंथन हुआ था. लेकिन घूम-फिरकर बात वहीं आ गई और नई व्यवस्था होने तक सोनिया गांधी को अंतरिम अध्यक्ष बना दिया गया. बीते कुछ समय से शशि थरूर सहित तमाम नेता लगातार कह रहे हैं कि नए अध्यक्ष का चुनाव हो. लेकिन बात वहीं की वहीं है. पार्टी नेता संदीप दीक्षित तो हाल में यह तक बोल गए कि बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे. यानी पार्टी की नैया बिना पतवार के चल रही है.

कांग्रेस में नेतृत्व को लेकर जो हाल राष्ट्रीय स्तर पर है वहीं राज्यों में भी दिखता है. कई राज्यों में अंतरिम अध्यक्ष के रूप में अस्थाई व्यवस्था चल रही है. लोकसभा चुनाव में पार्टी की दुर्गति के बाद से दर्जन भर से बड़े नेता उसे अलविदा कह चुके हैं. इनमें कई पूर्व केंद्रीय मंत्री, पूर्व मुख्यमंत्री और तत्कालीन या पूर्व प्रदेश अध्यक्ष शामिल हैं. पिछले साल झारखंड कांग्रेस के तत्कालीन मुखिया अजय सिंह ने अपने इस्तीफे के ऐलान के साथ यह तक कह दिया था कि खराब से खराब अपराधी भी पार्टी में उनके सहयोगियों से बेहतर दिखते हैं.

शायद यही वजह है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया के इस्तीफे के बाद कांग्रेस महासचिव पीएल पुनिया का कहना था, ‘हमें गहराई से आत्ममंथन की जरूरत है कि क्या इसके लिए सिर्फ श्री सिंधिया जिम्मेदार हैं. 15 साल तक भाजपा के कुशासन के बाद हम सत्ता में आए थे और हम इसे 15 महीने तक भी अपने पास नहीं रख सके.’

पीएल पुनिया ने संकेतों में यह बात कही तो पार्टी के एक अन्य नेता कुलदीप बिश्नोई ने इसे बिना किसी लाग-लपेट के कह दिया. उनका कहना था, ‘ज्योतिरादित्य सिंधिया का जाना कांग्रेस के लिए बड़ी चोट है. वे पार्टी के केंद्रीय स्तंभ थे और नेतृत्व को उन्हें रोकने के लिए और प्रयास करने चाहिए थे. उनकी तरह देश में कई समर्पित कांग्रेस नेता हैं जो आज खुद को अलग-थलग, बेकार और असंतुष्ट महसूस करते हैं.’

तो फिर कांग्रेस के लिए आगे का रास्ता क्या हो? पार्टी के एक प्रमुख नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री द इंडियन एक्सप्रेस से कहते हैं, ‘या तो राहुल गांधी अध्यक्ष के तौर पर वापस आएं और आगे बढ़कर नेतृत्व करें. या फिर वे और गांधी परिवार किसी ऐसे शख्स को आगे बढ़ाए जो सबको साथ लेकर चलने की क्षमता रखता हो. उनकी तरफ से कोई संकेत आना चाहिए, लेकिन वहां सिर्फ शांति है. कोई नहीं जानता कि वे क्या चाहते हैं और क्या करने की सोच रहे हैं.’

जानकारों के मुताबिक कांग्रेस के मौजूदा हाल के पीछे एक कारण यह भी रहा है कि नेताओं के साफ तौर पर असंतोष के संकेत देने के बावजूद शीर्ष नेतृत्व उनसे संपर्क कर उनकी समस्या समझने या उन्हें आश्वस्त करने की कोशिश नहीं करता. जयंती नटराजन से लेकर ज्योतिरादित्य सिंधिया तक इसका एक लंबा सिलसिला है. ज्योतिरादित्य सिंधिया के चचेरे भाई और त्रिपुरा के शाही परिवार से ताल्लुक रखने वाले प्रद्योत माणिक्य देबबर्मा कहते हैं कि ज्योतिरादित्य ने बीते कुछ समय के दौरान कई बार राहुल गांधी से मिलने की कोशिश की, लेकिन हर बार वे असफल रहे. यानी उन्हें उनके हालात पर छोड़ दिया गया था.

कांग्रेस के एक प्रमुख युवा नेता उम्मीद जताते हैं कि ज्योतिरादित्य सिंधिया के इस्तीफे के बाद हालात बदलेंगे और पार्टी जागेगी. द इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में वे कहते हैं, ‘अगर वो इससे भी नहीं जागती तो फिर उसकी नींद किसी चीज से नहीं टूटने वाली.’

खबरें आ रही हैं कि हिंदी पट्टी के कांग्रेस के तीन अन्य बड़े युवा चेहरे भी शीर्ष नेतृत्व से निराश हैं और विकल्प तलाश रहे हैं. यानी कांग्रेस की मुश्किलें आगे भी बनी रह सकती हैं.

ज्योतिरादित्य सिंधिया आज भाजपा का दामन थामने की तैयारी कर रहे हैं. कहा जा रहा है कि उन्हें राज्यसभा भेजा जाएगा और इसके बाद केंद्रीय कैबिनेट में जगह भी दी जाएगी.

ज्योतिरादित्य सिंधिया के इस्तीफे के साथ ही मध्य प्रदेश में कांग्रेस सत्ता गंवाने के कगार पर पहुंच गई है क्योंकि 21 विधायक उनके साथ हैं. मध्य प्रदेश में कमलनाथ सरकार के पास 116 विधायकों का समर्थन है जो बहुमत के आंकड़े से सिर्फ चार ज्यादा है. अगर सिंधिया समर्थक विधायकों के इस्तीफे स्वीकार हो जाते हैं तो सरकार गिर जाएगी. कुछ समय पहले कर्नाटक में भी कांग्रेस ने इसी तरह सत्ता गंवाई थी.