देश की राजधानी दिल्ली में 50 से ज्यादा लोगों की जान लेने वाली हिंसा के करीब दो हफ्ते बाद आखिरकार गृह मंत्री अमित शाह संसद में बोले. कल लोकसभा में विपक्ष के सवालों और आरोपों का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि यह हिंसा एक गहरी साजिश के बिना नहीं हो सकती थी. अमित शाह ने दिल्ली पुलिस की तारीफ भी की. उन्होंने कहा कि पुलिस ने दंगे को दिल्ली के चार प्रतिशत क्षेत्र और 13 प्रतिशत आबादी के बीच ही सीमित रखा. गृह मंत्री का यह भी कहना था कि दिल्ली पुलिस ने अच्छा काम किया और पहली सूचना मिलने के बाद महज 36 घंटे में पूरी स्थिति पर काबू पाया.

दिल्ली में हिंसा 23 फरवरी को शुरू हुई थी. उस दिन उत्तर-पूर्वी दिल्ली में सीएए विरोधियों और सरकार समर्थकों के बीच टकराव हुआ था. तीन दिन बाद जब शांति बहाल हुई तो तब तक बड़े पैमाने पर हिंसा, लूट और आगजनी हो चुकी थी. इसमें 53 लोग मारे गए थे और एक बड़ी आबादी की जिंदगी पटरी से उतर गई थी. लोकसभा में अमित शाह के भाषण ने दिल्ली में तीन दिन तक हुई हिंसा से जुड़े सवालों का जवाब तो नहीं दिया, बल्कि कुछ नए सवाल खड़े कर दिए.

खुफिया सूचनाओं पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

अमित शाह ने दावा किया कि दिल्ली में हुई हिंसा एक गहरी साजिश का नतीजा थी. उनका यह भी कहना था कि जांच के दौरान इसमें उत्तर प्रदेश के सैकड़ों लोगों के शामिल होने का पता चला है. इससे पहले खबरें आई थीं कि 24 फरवरी को भेजे गए छह खुफिया इनपुट्स में यह कहा गया था कि हिंसा हो सकती है. इसी दिन दोपहर बाद हिंसा शुरू हो गई थी.

उत्तर प्रदेश में भाजपा का शासन है और दिल्ली पुलिस गृह मंत्रालय के अधीन आती है. ऐसे में सवाल उठता है कि अगर यह वास्तव में सुनियोजित साजिश थी और प्रशासन को खुफिया इनपुट्स के जरिये इसकी सूचना पहले ही मिल चुकी थी तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई. क्यों हिंसा तीन दिन तक जारी रही?

फेशियल रिकगनिशन तकनीक का इस्तेमाल और सवाल

अपने भाषण में गृह मंत्री अमित शाह ने यह भी कहा कि सरकार ने फेशियल रिकगनिशन तकनीक के जरिये करीब 1100 लोगों की पहचान की है जो हिंसा में शामिल थे. उनका कहना था, ‘इस सॉफ्टवेयर के अंदर 1100 से ज्यादा आधार, ड्राइविंग लाइसेंस समेत और सरकारी दस्तावेजों का डेटा डाला गया है.’

अभी यह साफ नहीं है कि सरकार इस तकनीक का इस्तेमाल किस तरह कर रही है. लेकिन जो जानकारी अभी तक उपलब्ध है वह यह है कि अक्सर इस तकनीक से काफी चूक हो जाती है. कुछ समय पहले ब्रिटेन में हुए एक अध्ययन में पता चला था कि वहां के शहरों की पुलिस जो फेशियल रिकगनिशन तकनीक इस्तेमाल कर रही है उसमें सॉफ्टवेयर पांच में से औसतन चार बार गलत यानी निर्दोष लोगों को पकड़ लेता है.

इसके अलावा देश में निजी डेटा की गोपनीयता से जुड़ा कोई कानून नहीं है. न ही इस बारे में कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश हैं कि संबंधित अधिकारी इस तकनीक का इस्तेमाल कैसे करेंगे. जानकारों के मुताबिक ऐसे में फेशियल रिकगनिशन तकनीक खतरनाक है.

पुलिस की भूमिका की जांच कौन करेगा?

अमित शाह ने दिल्ली हिंसा के मामले में पुलिस पर लग रहे आरोपों को पूरी तरह खारिज किया. उन्होंने कहा कि सुरक्षा बलों पर सवाल उठाना उन्हें हतोत्साहित करना है. गृह मंत्री ने पुलिस की तारीफ की और कहा कि उसने 36 घंटे में हालात काबू कर लिए. वे इस दौरान क्यों नहीं दिखे, इस सवाल पर उन्होंने कहा कि डोनाल्ड ट्रंप अहमदाबाद आए हुए थे जो उनका संसदीय क्षेत्र है और इसलिए उनका वहां रहना जरूरी था. अमित शाह का यह भी कहना था कि उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल को शांति बहाल करने का जिम्मा सौंपा था. गृह मंत्री ने कहा, ‘मेरे कहने पर अजीत डोभाल वहां गए थे. मैं जाता तो पुलिस मेरी सुरक्षा में लगती.’

लेकिन अमित शाह के दावे के उलट कई ऐसे वीडियो फुटेज हैं जो दिखाते हैं कि पुलिस ने अपना काम निष्पक्ष तरीके से नहीं किया. वह एक पक्ष की तरफ से आंखें मूंदे रही. यही नहीं, कई वीडियो क्लिप्स में तो खुद पुलिसकर्मी सीसीटीवी कैमरे तोड़ते या फिर पत्थर फेंकते दिखे. एक वीडियो में साफ नजर आ रहा था कि कैसे दिल्ली पुलिस बुरी तरह घायल कुछ लोगों पर लाठियां बरसा रही है और उनसे जबरन राष्ट्रगान गवा रही है. बाद में इनमें से एक शख्स की मौत हो गई थी. इस तरह की कई शिकायतें आईं कि पुलिस पीड़ितों के कई बार फोन करने पर भी मौके पर नहीं पहुंची. दंगों के बाद भी कई पीड़ितों का दावा है कि उनकी शिकायतों की सुनवाई नहीं हो रही.

सवाल है कि इस सबके बावजूद गृह मंत्री अमित शाह पुलिस को पहले ही क्लीन चिट कैसे दे रहे हैं. हिंसा की जांच दिल्ली पुलिस ही कर रही है, लेकिन जिस तरह के आरोप उस पर लग रहे हैं उन्हें देखते हुए क्या यह उचित नहीं होता कि जांच का जिम्मा सरकार किसी दूसरी एजेंसी को देती?