ज्योतिरादित्य सिंधिया को सिर्फ मध्य प्रदेश का बड़ा नेता कहना ठीक नहीं होगा. वे मध्य प्रदेश के तो बड़े नेता हैं ही लेकिन साथ ही साथ उनकी पहचान दूसरे राज्यों में भी है. उनका नाम और कद ऐसा है कि उन्हें हर लिहाज से संभावनाओं से भरा एक राष्ट्रीय नेता कहा जा सकता है. अगर कोई ऐसा नेता किसी पार्टी को छोड़े तो जाहिर तौर पर यह उसके लिए बड़ा नुकसान है. बीते दिनों ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस छोड़कर भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए.

वैसे, कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होने का काम 2014 से ही लगातार चल रहा है. लेकिन ज्योतिरादित्य सिंधिया के कद के किसी नेता ने अब तक ऐसा नहीं किया था. उनके पार्टी छोड़ने के पीछे जाहिर तौर पर उनकी महत्वाकांक्षा भी एक वजह रही होगी. लेकिन इस घटना को लेकर एक आम धारणा यह भी बनी है कि कांग्रेस नेतृत्व ने लंबे समय तक ज्योतिरादित्य की बातों की अनदेखी की और यहां तक कि उन्हें मिलने तक का वक्त नहीं दिया.

ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे नेता का कांग्रेस छोड़ना पार्टी के आंतरिक संकट के और गहराते जाने का संकेत है. दरअसल, 2014 के लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद से कांग्रेस ने कई ऐसी गलतियां की हैं जिनकी वजह से वह आज इस स्थिति में है. अधिकांश राजनीतिक विश्लेषक यह मानते हैं कि अगर उसने इन गलतियों को सुधारने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं बढ़ाए तो यह संकट दिनोंदिन गहराता ही जाएगा. अब सवाल उठता है कि वे गलतियां कौन सी हैं?

नेतृत्व पर भ्रम

कांग्रेस पार्टी का नेतृत्व कौन करेगा, इसे लेकर 2020 में 2014 से कहीं अधिक अस्पष्टता है. 2014 में जह कांग्रेस पार्टी बुरी तरह हारी थी तब यह स्पष्ट हो गया था कि सोनिया गांधी के युग का अब अंत हो रहा है और आने वाले दिनों में पार्टी संगठन की कमान राहुल गांधी के हाथों में जाने वाली है. 2017 के अंत तक यह हो भी गया. राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष बने और 2019 के लोकसभा चुनावों के दौरान अपनी सभाओं और साक्षात्कारों के जरिए उन्होंने राजनीतिक परिपक्वता भी दिखाई. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा ने राहुल गांधी की जो ‘पप्पू’ वाली छवि बनाई थी, उसे इस दौरान वे धोते हुए दिखे. उस समय कई लोगों को लगा कि एक नेता के तौर पर उनके पास एक दृष्टि है.

लेकिन 2019 के लोकसभा चुनावों में फिर से हारने के बाद राहुल गांधी ने इस हार की जिम्मेदारी लेते हुए अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया. दरअसल, कांग्रेस का असली संकट यहीं से पैदा हुआ. इसके बाद यही स्पष्ट नहीं रहा कि उसकी कमान अब किसके हाथों में जाएगी. कुछ समय तक बनी भ्रम की स्थिति के बाद सोनिया गांधी पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष बन गईं. इसका मतलब यह हुआ कि नेतृत्व के स्तर पर कांग्रेस आज भी वहीं हैं जहां दो दशक पहले थी. जबकि तब की और आज की सोनिया गांधी में काफी फर्क है. अब उनकी उम्र अधिक है और स्वास्थ्य भी इस तरह का नहीं है कि वे पहले जैसा नेतृत्व पार्टी को दे सकें. कांग्रेस को पूर्णकालिक अध्यक्ष कब मिलेगा और यह दायित्व किसे मिलेगा, इन बातों को लेकर कोई स्पष्टता नहीं होने से उसका संकट दिनोंदिन गहराता जा रहा है.

पुरानी पीढ़ी को तरजीह

नेतृत्व के स्तर पर सोनिया गांधी के रहने की वजह से अब भी कांग्रेस पार्टी में संगठन के स्तर पर पुरानी पीढ़ी के नेताओं का ही दबदबा है. महत्वपूर्ण मौकों पर सोनिया गांधी इन्हीं नेताओं के जरिए काम करती हुई दिखती हैं. 2018 में कांग्रेस जब मध्य प्रदेश और राजस्थान में चुनाव जीती तब भी नई पीढ़ी के नेताओं को अवसर देने के बजाए उसने कमलनाथ और अशोक गहलोत को ही मुख्यमंत्री बनाया. मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस छोड़ने की एक वजह राज्यसभा की सीट भी रही. इसके बारे में यह कहा जा रहा है कि यहां भी ज्योतिरादित्य सिंधिया पर दिग्विजय सिंह को तरजीह देने की योजना पर पार्टी काम कर रही थी.

अगर राहुल गांधी अध्यक्ष बने रहते तो धीरे-धीरे हर जगह नई पीढ़ी के नेता आगे आ रहे होते. लेकिन फिर से सोनिया गांधी के अध्यक्ष बन जाने से कांग्रेस में संगठन के स्तर पर नई पीढ़ी के आगे आने की प्रक्रिया बाधित हो गई है. इस वजह से कई युवा नेताओं को अपने लिए भाजपा में अधिक संभावनाएं दिख रही हैं. या फिर यह भी कह सकते हैं कि उन्हें जहां भी संभावनाएं दिख रही हैं उस तरफ जाने का मन बना रहे हैं.

एजेंडे की अस्पष्टता

लगातार दो लोकसभा चुनावों में बुरी हार का सामना करने के बावजूद कांग्रेस पार्टी में एजेंडे को लेकर स्पष्टता नहीं दिखती है. राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के मसले पर भाजपा के विस्तार को देखते हुए कभी कांग्रेस पार्टी नरम हिंदुत्व की ओर जाती हुई दिखती है तो कभी फिर से इसके विपरीत दिशा में लौटती हुई दिखने लगती है. जिन मुद्दों को भाजपा और मोदी सरकार बेहद आक्रामक ढंग से उठाते हैं, उन मुद्दों पर कांग्रेस का रुख क्या होगा, अक्सर यही स्पष्ट नहीं होता. इसलिए ऐसे मुद्दे जिन पर वह मोदी सरकार को अच्छी तरह घेर सकती है, उन पर भी वह कुछ खास नहीं कर पाती है.

2016 से लेकर 2017 तक जब ऐसा लग रहा था कि नीतीश कुमार की पहल पर 2019 के लोकसभा चुनावों के लिए विपक्ष को एकजुट करने का काम हो सकता है, तब भी कांग्रेस ने स्पष्ट रुख नहीं अपनाया और अंत में नीतीश कुमार फिर से भाजपा के पाले में चले गए. कुल मिलाकर 2014 से लेकर अब तक अगर एक मजबूत विपक्ष की भूमिका निभाने में नाकाम रही है तो इसकी एक बड़ी वजह उसमें फैली अनिश्चतता और उसकी सोच की अस्पष्टता भी है.

प्रियंका गांधी पर पेंच

राहुल गांधी पहली बार 2004 में ही सांसद बने थे. लेकिन कुछ ही सालों में बहुत सारे लोगों को यह लगने लगा था कि वे कांग्रेस को प्रभावी नेतृत्व नहीं दे पाएंगे. इनमें से कई ऐसे लोग भी थे जो राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी के राजनीतिक विरोधी थे. लेकिन ये लोग भी यह मानते थे कि अगर राहुल की जगह प्रियंका गांधी को अवसर मिले तो वे राजनीति में अधिक प्रभावी साबित होंगी.

2019 के लोकसभा चुनावों से पहले प्रियंका गांधी को पार्टी में लाया तो गया लेकिन उनका राजनीतिक इस्तेमाल जैसा किया जाना चाहिए था वैसा पार्टी ने किया नहीं. उन्हें पार्टी महासचिव तो बनाया गया लेकिन उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी भी अकेले नहीं बल्कि ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ उनके बराबर ही दी गई. उन्हें बनारस से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ लोकसभा चुनाव भी नहीं लड़ने दिया गया. और न ही चुनावों के बाद कांग्रेस में नेतृत्व के स्तर पर ही उन्हें लाने की कोई कोशिश हुई.

लोकसभा चुनाव के बाद जब राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया तो कहा था कि गांधी परिवार से कोई पार्टी अध्यक्ष नहीं होगा. ऐसा कहकर जाहिर सी बात है कि उन्होंने प्रियंका गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने की संभावनाओं को खारिज किया था. लेकिन आज कांग्रेस की आंतरिक स्थिति यह है कि उसके अधिकांश नेता यह मानते हैं कि प्रियंका गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बना दिया जाए ताकि पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं में एक नए ढंग के उत्साह का संचार हो. और वह भाजपा से मुकाबला करने के लिए तैयार हो सके.