टोपी जिस डिब्बे में बैठा उसमें बड़ी भीड़ थी. शायद भीड़ ही हिंदुस्तानी रेलों की सबसे बड़ी पहचान है. टोपी ने यूनिवर्सिटी वाली शेरवानी पहन रखी थी.

‘मैं खा लूं तो बैठिए.’ खाना खाते हुए एक बेहद स्टाम्प पर लिखे हुए पंडित जी ने कहा.

‘क्या यह नहीं हो सकता कि आप खाना भी खाते रहें और मैं बैठ भी जाऊं?’

‘तुम यहां बैठ जाओ बेटा’ पंडितजी ने सामनेवाली बर्थ पर बैठे हुए एक नौजवान से कहा. वह आ गया. ‘आप वहां बैठ जाइए.’

‘वहां क्यों बैठ जाऊं?’

‘अरे तो क्या महाराज के सिर पर बैठोगे?’ एक तोंदवाला चीख पड़ा.

‘यह बाबा का सिर है?’ टोपी ने बर्थ की लकड़ी बजाई.

‘इस तरह ऐंठना हो तो पाकिस्तान जाओ.’ तोंद बोली.

बात टोपी की समझ में आ गई. वह हंस पड़ा.

‘माफ़ कीजिएगा.’ बाबा से माफ़ी मांगकर वह दूसरी बर्थ पर बैठ गया. परन्तु उसने यह अवश्य महसूस किया कि आस-पास बैठे लोग उससे बहुत खफ़ा हैं.

पंडितजी का खाना ख़त्म हो गया तो तोंदवाला पंडितजी से बातें करने लगा. धीरे-धीरे आस-पास के लोग भी बातों में शामिल हो गए. आस-पास वालों में एक मुसलमान भी था.

‘मगर सेठ साहब!’ उस मुसलमान ने कहा. ‘अगर मैं मुसलमान हूं तो इससे यह कहां साबित होता है कि मैं पाकिस्तानी हूं या यह कि मैं हिंदुस्तानी बनकर इस मुल्क में रहने को तैयार नहीं हूं?’

‘आप इन्हीं श्रीमान को देखिए.’ तोंद ने टोपी की तरफ़ इशारा किया, ‘यह देख रहे थे कि बाबा भोजन कर रहे हैं किन्तु...’

‘मैं हिन्दू हूं.’ टोपी ने कहा, ‘मैं बलभद्र नारायण शुक्ला हूं. और चलिए मान लिया मैं सेख-सलामत हूं तो क्या हुआ? ये बेंचें यात्रियों के बैठने को लगी हैं. मैं बाबा का खाना छीन तो नहीं रहा था. आप ही लोग मुसलमानों को भारत-विरोधी दल में ढकेल रहे हैं. क्या यह शेरवानी मुसलमान है? यह तो कनिष्क के साथ आाई थी . यह पजामा भी कनिष्क ही का है...’

‘हिन्दू-मुसलमान का भेद-भाव झूठा है बेटा!’ पंडितजी ने कहा. ‘यह तो भगवान की लीला है…’

‘भगवान बेचारे को क्यों घसीट रहे हैं पंडितजी! मैं हिन्दू हूं, परन्तु कहीं मुझे एक नौकरी नहीं मिलती क्योंकि मैं मुसलिम यूनिवर्सिटी में पढ़ता हूं. मुझे आप अपने साथ नहीं बैठने देते क्योंकि मैं शेरवानी पहने हुए हूं. और यह तोंदवाले श्रीमान तो मुझे पाकिस्तान भेजे दे रहे हैं. अरे बाबा, यदि मैं मुसलमान रहा होता तो तुम्हें खाता देखकर ख़ुद ही दो कदम पीछे हट गया होता. अब यह मुसलमान ही तो हैं. कैसे बैठे माफ़ी मांग रहे हैं मुसलमान होने की! यह बेचारे आपसे यह नहीं कह सकते के तुम होते कौन हो मुझ पर शक करनेवाले! मैं भी एक भारतीय नागरिक हूं. इनके दिल पर तो आज डर की एक और तह जम गई होगी. अब यह सफ़र करेंगे तो किसी ऐसे डिब्बे में बैठेंगे जिसमें दस-बीस मुसलमान भी हों. और जब कोई इनसे यह कहेगा कि हिन्दू मुसलमानों को चैन से नहीं रहने देंगे तब इन्हें यह यात्रा याद आएगी. यदि आप रेल के किसी आम डिब्बे में भोजन नहीं कर सकते तो सरकार से कहिए कि वह कुछ हिन्दू डिब्बे चलाए जिनमें आप आराम से भोजन कर सकें. श्रीराम तो भीलनी के जूठे बेर खा लें और आप मुझे अपने पास बैठने भी न दें कि मैं मुसलमान हूं...!’

बग़ल में बैठे हुए मुसलमान का दिमाग़ इधर-से-उधर भागने लगा. वह पचास-पचपन बरस का एक पढ़ा-लिखा आदमी था. पाकिस्तान का ख़्वाब उसने भी देखा था. उसने नारे भी लगाए थे . छपरा के सय्यद आबिद रज़ा को जूतों का हार पहनाने में वह आगे-आगे था, वह मुस्लिम नेशनल गार्ड्स का सालार रह चुका था. उसे अपनी कई तक़रीरें याद आती रहती थीं. वह एक छोटा-मोटा-सा बड़ा आदमी था. तक़रीर करने खड़ा होता था तो पंडाल तक़रीर के नारों से गूंज उठा करता था. वह नमाज नहीं पढ़ता था. रोज़ा नहीं रखता था. शराब पीता था...परन्तु दीन-मोहम्मदी के बचाव के लिए वह भी खड़ा हो गया था. फिर पाकिस्तान बन गया. वह पाकिस्तान नहीं गया-वह कांग्रेसी हो गया! जिला कमेटी का मेम्बर हो गया. परन्तु खद्दर के नीचे वह अब भी मुसलिम लीगी था. वह मौक़े की तलाश में था. पहले तो उसने पाकिस्तान जाने के बारे में सोचा. परन्तु जब उसने यह देखा कि छोटे-बड़े तमाम लीडर पाकिस्तान जा रहे हैं तो उसने अपना इरादा बदल दिया. उसने कहा तो यही कि वह मौक़ा-परस्त लीडरों की तरह मुसलमानों को हिन्दुओं के रहमो-करम पर नहीं छोड़ सकता. परन्तु दिल में वह मुसलमानों का बड़ा लीडर बनने का प्रोग्राम बना रहा था. दो बेटियों की शादी कर चुका था. वे पाकिस्तान में ख़ुश थीं. तीसरी के लिए पाकिस्तान में कोई वर नहीं मिल रहा था और हिन्दुस्तान में ख़ैर लड़कों का काल ही था.

‘...आप अगर मुसलमान घराने में पैदा हो गए होते तो? पैदा होने पर किसका इख़त्यार है भला...’ टोपी की आवाज़ दूर से आ रही की.

मलिकज़ादा अब्दुल वाहिद ‘तमत्रा’ ने टोपी की यह बात दिमाग़ की डायरी में नोट कर ली. वह मुस्कुराए. इस लड़के को बात कहना नहीं आता. उन्होंने आंखे बंद कर लीं. सामने एक बड़ा मजमा था – ‘मैं पूछता हूं.’ उन्होंने अपनी आवाज़ सुनी. (अपनी आवाज़ उन्हे बहुत पसंद थी) दोनों हाथों की उंगलियां उन्होंने शेरवानी की ऊपरी जेब में घुसेड़ ली. ‘मैं सवाल करता हूं कि अगर मैं मुसलमान घराने में पैदा हुआ तो इसमें मेरा क्या क़ुसूर है? आपमें से कौन क़सम खाकर कह सकता है कि वह अपनी मर्जी से किसी घराने मे पैदा हुआ है?’ वह रुके और मजमे को देखकर मुस्कुराए. मजमा हंसने लगा ....