सभ्यता की लय

हम जिस हत्यारे-हिंसक समय में रह रहे हैं उसमें सभ्यता की लय की बात करना अप्रासंगिक लग सकता है. जब दूसरों को हर तरह से घायल करना नयी नैतिकता बनता जा रहा है, तब शाहीन बाग़ जैसी जगहों पर साधारण नागरिकों ने, स्त्रियों ने, बिलकुल अहिंसक ढंग से, धीरज और शान्ति से, जो प्रतिरोध किया है उसमें क्या हमें अपनी सभ्यता की लय सुनायी-दिखायी नहीं देती? अगर नहीं तो इसका यही आशय हो सकता है कि सारे शोर-शराबे में हम अपनी सभ्यता की लय भूल गये हैं.

आल्बेयर कामू, फ्रेंच लेखक और चिन्तक थे, जिन पर इधर पुनर्विचार हो रहा है. और ईरानी दार्शनिक रामिनजहां बेगलू की एक पुस्तक भी ‘दि अनहीरोइकहीरो आव् अवर टाइम’ रूटेलज से आयी है. कामू की चिन्ता सभ्यता की लय खोजने की थी जो ध्रुवान्तों के बीच झूलते युद्धोत्तर यूरोप में अतिवादों के बीच खो सी गयी थी. कामू को लगा था कि यूरोप ने जो चीज़ें दुनिया में हैं उनसे और जीवित मनुष्य से प्यार करना छोड़ दिया है. उनको लगा कि यूरोप ने जीवन से प्यार करना बंद कर दिया है. तथाकथित राष्ट्रवाद के बरक़्स कामू दोस्ती के लिए आवेग, न्याय के लिए उत्कट आग्रह, प्रेम, सत्य और आलोचना-बुद्धि पर इसरार कर रहे थे. यह इसरार, एक तरह से उन प्रतिरोधों में भी देखा जा सकता है जो देश भर में जगह-जगह हो रहे हैं. वे सिर्फ़ एक अन्यायी क़ानून के विरुद्ध अभियान भर नहीं है. वे सभ्यता की खोयी हुई लय का पुनर्वास करने की चेष्टा भी हैं. भारत में तरह-तरह की सत्ताएं हर दिन तरह-तरह के ‘दूसरे’ गढ़ने के एक दृष्ट और दुर्दान्त अभियान में शामिल हैं. उन्हें यह याद दिलाना ज़रूरी है कि उनके विरोधी भी सही हो सकते हैं. इस एहतराम के अभाव में न तो संवाद संभव है, न कोई हल.

महात्मा गांधी ने सभ्यता की लय को सत्य, अहिंसा, न्याय, सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा आदि से रूपाकार देने की कोशिश की थी. जिस तरह के ध्रुवीकरण में इस समय हम हैं उसमें सत्ता अपनी ज़िद और शक्ति पर अडिग रह कर सभ्य आचरण करने की स्थिति में नहीं है. ऐसे में उम्मीद की संभावना लगातार घटती जाती है. फिर भी, छोटे-छोटे मानवीय कृत्य, जो हर रोज़ सामने आते हैं वे हमें बताते रहते हैं कि अंधेरे में भी मानवीय गरमाहट, संग-साथ, मदद और सहानुभूति की नन्हीं चिनगारियां बची हुई हैं. इस समय वे ही सभ्यता की लय का रूपाकार हैं. विनम्र पर अदम्य भी. यह भी अलक्षित नहीं जाना चाहिये कि ये चिनगारियां साधारण लोगों के व्यवहार से प्रगट हो रही हैं. साधारणता से ही वह लय बच पा रही है. थपेड़ खाती हुई तैर रही है. साधारणता से अलग-थलग संस्थाएं लगातार इस लय को खंडित कर रही हैं.

रेणु शती

यह दिसम्बर 1975 की बात है. उस समय हिन्दी साहित्य के भी तीर्थ इलाहाबाद में मेरी पहली शाम थी. सिविल लाइन्स, जो तब इतनी जनाकीर्ण नहीं हुई थी जितनी कि आजकल है, वहां स्थित रामाज़ कैफ़े में हम शाम को गये थे. काफ़ी पीने. दूर की एक मेज़ पर दो-तीन और लोग बैठे थे जिनमें से एक के लम्बे कुन्तल-केश आकर्षक लग रहे थे. मैं इलाहाबाद में मार्कण्डेय और कमलेश्वर द्वारा आयोजित साहित्यकार सम्मेलन में भाग लेने उसी दिन सुबह सागर से पहुंचा था.

कुछ देर बाद जब उस व्यक्ति ने थोड़ा मुंह फेरा तो लगा कि वे फणीश्वरनाथ रेणु हैं. उन दिनों साहित्य में उनके उपन्यास ‘मैला आँचल’ की बड़ी धूम थी. सागर में जो पुस्तकों की दूकानें थीं उनमें उसकी प्रतियां तब तक नहीं आयी थीं. मैंने राजकमल प्रकाशन दिल्ली को तार भेजकर वीपीपी से उसकी प्रति मंगायी थी. जब मैं आश्वस्त हो गया कि वे रेणु ही हैं तो मैं उन्हें नमस्कार करने उनकी मेज़ तक गया. उनसे जो भी औपचारिक सी बात हुई वह अब याद नहीं है. उस सम्मेलन में वे दिखते रहे पर उनसे कोई बात नहीं हुई. मेरी यह रेणु जी से पहली और आखि़री मुलाक़ात थी. इधर उनका सौवां वर्ष शुरू हुआ है और उसे व्यापक रूप से मनाने और उनके अवदान पर ध्यान एकाग्र करने के लिए अनेक शहरों में अनेक आयोजन होने की बात है.

इस सिलसिले में एक आयोजन हाल ही में दिल्ली में हुआ. अक्सर शतियां मनाते हुए कई तरह के अतिरेकों और अतिशय और अल्पपरीक्षित विश्लेषणों का सामना करना पड़ता है. कई बार लगता है कि हिन्दी में सीधा-सच्चा मूल्यांकन, बिना दो-चार को अवमूल्यित किये, हो ही नहीं पाता. एक उदाहरण इस आयोजन में भी मिला. एक वयोवृद्ध विद्वान्-आलोचक ने कहा कि हिन्दी उपन्यास का कथानक प्रेमचन्द के बाद रेणु ने ही निर्णायक रूप से बदला, जैनेन्द्र कुमार और अज्ञेय ने कथानक नहीं बदला क्योंकि दोनों ही ने समाज का अवमूल्यन किया! वे चूंकि अपनी किसी पुस्तक के हवाले से यह कह रहे थे इसलिए हो सकता है कि इस निहायत निराधार लगती अवधारणा को समुचित साक्ष्य द्वारा उन्होंने प्रतिपादित करने का प्रयास भी किया हो.

रेणु ने हिन्दी उपन्यास की एक धारा को बदला इसमें कोई संदेह नहीं है. उन्होंने प्रेमचन्द के गांव और उसकी मलिन धूसरता को अपने गांव, अपने अंचल की अन्तर्ध्वनियों, आवाज़ों, बिम्बों, बोलियों, चरित्रों, लालित्य के साथ-साथ उसके संघर्षों, अन्तर्विरोधों, राजनैतिक और सामाजिक टकरावों आदि से किसी हद तक अतिक्रमित कर और भरा-पूरा किया. ‘मैला आंचल’ हिन्दी उपन्यासों में ‘गोदान’ की ही तरह एक क्लैसिक उचित ही माना जाता है. पर उपन्यास के रूपाकार, कथानक, कथाभाषा आदि को जैनेन्द्र कुमार और अज्ञेय अपने ढंग से बदल चुके थे और ऐसी मानवीय सचाई उपन्यास के भूगोल में ले आये थे जो प्रेमचन्द के भूगोल में नहीं थीं. इन दोनों की समाज को समझने-बखानने की अपनी स्वतंत्र दृष्टियां थीं और आप उनसे असहमत हो सकते हैं. पर उन्होंने समाज का अवमूल्यन किया यह आरोप बिलकुल निराधार है. यहां यह याद दिलाना उचित होगा कि जैनेन्द्र का उपन्यास ‘त्यागपत्र’ और अज्ञेय का ‘शेखर: एक जीवनी’ भी हिन्दी उपन्यास के बहुमान्य क्लैसिक हैं. रेणु को बड़ा बताने के लिए जैनेन्द्र-अज्ञेय को अवमूल्यित करना बौद्धिक नहीं राजनैतिक कर्म है.

अज्ञान-भय-घृणा को नापना

अर्थव्यवस्था, विकास, अपराध, हिंसक घटनाएं आदि को नापने की विधियों और पैमाने हैं. उनके बारे में विधिवत् जुटाये गये आंकड़े सामने आते रहते हैं, भले इन दिनों वे राजनैतिक हस्तक्षेप या प्रशासनिक हेर-फेर के कारण धीरे-धीरे अप्रमाणिक और अविश्वसनीय होते जा रहे हैं. भारतीय जीवन और समाज में इस समय अज्ञान, भय और घृणा की जो व्याप्ति है वह सत्ता द्वारा किये गये दांव-पेंचों के बावजूद छुप नहीं रही है. आम धारणा यह है कि शिखर से लेकर निचले स्तरों तक, अज्ञान बेहद मुखर और सक्रिय है. जिन्होंने शायद इतिहास एक विषय के रूप में स्कूल तक में नहीं पढ़ा वे राजनेता हमें बताते रहते हैं कि सच्चा इतिहास क्या है! इसका कोई कारगर प्रत्याख्यान, बिना भय के, हमारे इतिहास के अध्यापक और विद्वान करते हों ऐसा नज़र नहीं आता.

इन दिनों केन्द्रीय सत्ता हर दिन कोई न कोई नया डर पैदा करती है. नया डर इन दिनों यह है कि किसी का बैंक में जमा पैसा सुरक्षित नहीं है क्योंकि बैंक मनमानी कर लाखों करोड़ रुपये के कर्ज अक्षम दौलतमन्दों को देकर दिवालिया हो रहे हैं. हिन्दू मुसलमान से डरे और मुसलमान हिन्दू से यह तो महामारी की तरह फैल ही गया है. इस समय अगर निडर हैं तो दो वर्ग - पुलिस और अपराधी. पुलिस निडर है कि वह अपने कर्तव्य में कितनी ही कोताही क्यों न करे, साम्प्रदायिक ढंग से खुल्लम-खुल्ला व्यवहार करे, दंगाइयों को रोकने की कोशिश करने के बजाय उन्हें प्रोत्साहित और मदद करे पर उसका बाल भी बांका न होगा. अपराधी, फिर वे बलात्कारी हों, हत्यारे, गोरक्षा के नाम पर आक्रामक, निडर हैं कि उनका भी कुछ नहीं बिगड़ेगा. अगर धर ही लिये गये दुर्भाग्य से तो पुलिस तहकीतात के दौरान चूक कर सुबूत के अभाव में उन्हें बचा लेगी.

राजनेता, ख़ासकर सत्ताधारी दल के, निडर हैं कि उनके घृणा-भाषणों के कारण उन पर अव्वल तो कार्रवाई बहुत देर से होगी और होगी भी तो न्यायालय उन्हें ज़मानत इत्यादि दे देंगे और सरकार बढ़ी हुई सुरक्षा तक. डर फैल रहा है आम नागरिकों में जो दिन-ब-दिन और निहत्थे होते जा रहे हैं क्योंकि सहज सुरक्षा के उपकरण पुलिस, न्यायालय उनकी पहुंच-पकड़ से दूर जा चुके हैं. अकेले उत्तर प्रदेश में, जो दरअसल अब भारत का हिंसा-बलात्कार-घृणा के मामले में सबसे बर्बर प्रदेश है, ढाई लाख बलात्कार के मामले अदालतों में लंबित है, ऐसा बताया गया है.

आपसी घृणा भी उरूज पर हैं: सम्प्रदायों, धर्मों, जातियों आदि के बीच घृणा लगातार बढ़ और बढ़ायी जा रही है. विशेषतः दलित, स्त्रियां, अल्पसंख्यक वर्ग इस घृणा के रोज़ाना शिकार हो रहे हैं. यह भी एक विडम्बना है कि आर्थिक स्थिति लगातार गिर रही है. कई संवैधानिक और सार्वजनिक संस्थाएं अवनत हो रही है पर अज्ञान-भय-घृणा लगातार बढ़ रहे हैं. इस भयानक उपलब्धि को नापने की विधि और पैमाना होना चाहिये. राज तो क्या करेगा, समाज ही कुछ करे! जनमतसंग्रह द्वारा यह भी तय हो कि हर वर्ष अज्ञान रत्न, भय रत्न और घृणा रत्न के अखिल भारतीय सम्मान किन्हें दिये जायें.