भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने राज्यसभा के लिए नामांकित किया है. देश के 46 वें मुख्य न्यायाधीश रहे रंजन गोगोई पिछले साल नवंबर में रिटायर हुए थे. उसी महीने उनकी अगुवाई में पांच जजों की बेंच ने अयोध्या विवाद पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया था.

असम के डिब्रूगढ़ में जन्मे रंजन गोगोई एक रसूखदार परिवार से ताल्लुक रखते हैं. उनके पिता और कांग्रेस के बड़े नेता केशब चंद्र गोगोई असम के मुख्यमंत्री रहे. 2001 में गुवाहाटी हाई कोर्ट में नियुक्त हुए रंजन गोगोई 2012 में सुप्रीम कोर्ट में आए थे. 2018 में वे मुख्य न्यायाधीश बने. पूर्वोत्तर से इस पद पर पहुंचने वाले वे पहले शख्स थे.

अयोध्या विवाद के अलावा रंजन गोगोई को अनुच्छेद 370, तीन तलाक पर अध्यादेश और केरल के सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर उनके फैसलों के लिए भी जाना जाता है. मुख्य न्यायाधीश बनने से पहले रंजन गोगोई तब भी चर्चा में आए थे जब उन्होंने तीन अन्य वरिष्ठतम जजों के साथ एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी. इसमें उन्होंने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के कामकाज पर सवाल उठाए थे. इन सभी जजों ने जनता से न्यायपालिका को बचाने की अपील की थी. पारदर्शिता के बड़े पैरोकार रहे जस्टिस रंजन गोगोई सुप्रीम कोर्ट के उन चुनिंदा जजों में शामिल रहे जिन्होंने अपनी संपत्ति से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक की.

लेकिन रिटायरमेंट तक आते-आते रंजन गोगोई पर सवाल भी उठने लगे थे. सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा के मामले से लेकर धारा 370 और रफाल मामले तक सुप्रीम कोर्ट का जो रुख रहा उसे लेकर एक वर्ग का आरोप था कि न्यायपालिका और कार्यपालिका एक ही पाले में खड़े दिख रहे हैं. रंजन गोगोई तब भी चर्चा में आए जब सुप्रीम कोर्ट की एक कर्मचारी द्वारा उन पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए गए. जिस तरह से इस मामले को निपटाया गया उस पर भी सवाल उठे. ऐसा ही राज्यसभा के लिए उन्हें नामांकित किए जाने के बाद भी हो रहा है.

सुप्रीम कोर्ट के किसी जज के रिटायरमेंट के बाद राज्यसभा जाने का यह पहला मामला नहीं है. पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंगनाथ मिश्र रिटायरमेंट के सात साल बाद 1998 में कांग्रेस के टिकट पर राज्यसभा गए थे. मिश्रा उस आयोग के अध्यक्ष थे जिसने चौरासी के दंगों की जांच की थी. इस आयोग ने कांग्रेस के कुछ सदस्यों को तो इनके लिए जिम्मेदार माना था लेकिन पार्टी को क्लीनचिट दे दी थी. पूर्व मुख्य न्यायाधीशों के राज्यपाल से लेकर मानवाधिकार आयोग के चेयरमैन तक बनने के भी कई उदाहरण हैं. लेकिन रिटायरमेंट के सिर्फ चार महीने बाद ही रंजन गोगोई को राज्यसभा भेजे जाने को कई लोग एक असामान्य बात मान रहे हैं. हालांकि ऐसा ही कुछ मोदी सरकार जस्टिस पी सदाशिवम के मामले में भी कर चुकी है. वे 26 अप्रैल 2014 को देश के मुख्य न्यायाधीश के पद से रिटायर हुए थे और 5 सितंबर 2014 को उन्हें केरल का राज्यपाल नियुक्त कर दिया गया था. ऐसा देश में पहली बार किया गया था.

पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली ने कभी कहा था कि जजों के रिटायरमेंट से ठीक पहले के फैसले रिटायरमेंट के बाद जॉब की इच्छा से प्रभावित होते हैं. यह बात उन्होंने 2012 में तब कही थी जब वे नेता प्रतिपक्ष थे. अरुण जेटली का कहना था, ‘मेरा सुझाव यह है कि रिटायरमेंट के बाद किसी नियुक्ति से पहले दो साल का अंतराल होना चाहिेए. नहीं तो सरकार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तरीके से अदालतों को प्रभावित कर सकती है. ऐसे में देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायपालिका का सपना कभी पूरा नहीं होगा.’ स्वराज इंडिया पार्टी के मुखिया योगेंद्र यादव ने एक ट्वीट में रंजन गोगोई को इस टिप्पणी की याद दिलाई है.

उधर, भाजपा के बड़े नेताओं में शुमार रहे पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने आशा जताई है कि पूर्व मुख्य न्यायाधीश इस पेशकश को ठुकरा देंगे. एक ट्वीट में उनका कहना है, ‘वरना वे न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को भारी नुकसान पहुंचाएंगे.’ इसके उलट जैसी कि उम्मीद की जा सकती थी मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा नेता शिवराज सिंह चौहान ने इस फैसले का स्वागत किया है. उनका कहना है कि जस्टिस गोगोई के राज्यसभा में आने से देश को बहुत फायदा होगा.

दिलचस्प बात है कि रंजन गोगोई ने बीते साल खुद भी एक आयोजन के दौरान इस मुद्दे पर टिप्पणी की थी. उनके मुताबिक एक मजबूत धारणा है कि रिटायरमेंट के बाद होने वाली नियुक्तियां न्यायपालिका की आजादी पर धब्बा हैं. सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी ने उन्हें उनकी इसी टिप्पणी की याद दिलाई है.

बीते साल रंजन गोगोई की अगुवाई वाली एक खंडपीठ ने रोजर मैथ्यू नाम के एक मामले में फैसला सुनाया था. इसमें रंजन गोगोई ने अलग-अलग न्यायाधिकरणों (ट्रिब्यूनल) के सदस्यों की फिर से नियुक्तियों पर टिप्पणी की थी. उन्होंने कहा था कि एक ट्रिब्यूनल से रिटायर होने वाले सदस्य को दूसरे ट्रिब्यूनल में नियुक्त करने के मामले में केंद्र या राज्य सरकारों को जो अधिकार मिला हुआ है वह न्याय व्यवस्था में आम लोगों की आस्था को कमजोर करता है. रंजन गोगोई का यह भी कहना था कि इससे न्याय व्यवस्था में कार्यपालिका का दखल बढ़ता है और उसकी आजादी खतरे में पड़ती है. अपने एक लेख में लाइव लॉ के एसोसिएट एडिटर मनु सेबेस्टियन मानते हैं कि न्यायाधिकरणों के मामले में की गईं ये टिप्पणियां अदालतों के मामले में भी उतनी ही सही हैं.

इसी फैसले में खंडपीठ के एक और सदस्य जस्टिस दीपक गुप्ता ने एक और अहम टिप्पणी की थी. उन्होंने कहा था, ‘हो सकता है लोकपाल, लोकायुक्त, मानवाधिकार आयोग और विधि आयोग के मुखिया के तौर पर रिटायर जजों की नियुक्ति जरूरी हो. लेकिन यह चलन नहीं बनना चाहिए खासकर तब जब कि नियुक्तियां कार्यपालिका कर रही हो.’ उनका कहना था कि इससे न्यायपालिका की आजादी खतरे में पड़ती है. जस्टिस दीपक गुप्ता ने आगे कहा था, ‘जनता को देश की न्यायपालिका पर अब भी बहुत भरोसा है. अगर उसे लगा कि ये नियुक्तियां किसी बाहरी कारण से हो रही हैं तो यह भरोसा ढह जाएगा’. उनका यह भी कहना था कि जो जज रिटायरमेंट के बाद सरकार से किसी नियुक्ति की अपेक्षा कर रहे हों उनसे न्याय की उम्मीद नहीं की जा सकती.