बीते करीब एक हफ्ते में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट आई है. 10 मार्च को अचानक ब्रेंट क्रूड ऑयल 30 फीसदी की गिरावट के साथ 31 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया. बीते जनवरी माह में यह आंकड़ा 66 डॉलर प्रति बैरल के आसपास था. पिछले 29 सालों में तेल के दाम में आई यह सबसे बड़ी गिरावट है. खाड़ी युद्ध के दौरान 1991 में कच्चे तेल की कीमत में अचानक इतनी बड़ी गिरावट देखी गई थी.

एक हफ्ता गुजरने के बाद भी कच्चे तेल की कीमतों में यह गिरावट बनी हुई है. पिछले मंगलवार को ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत 30 डॉलर प्रति बैरल से भी नीचे थी. जानकारों की माने तो कच्चे तेल की कीमतों में यह गिरावट आगेे भी जारी रहने वाली है. इन लोगों का यह भी कहना है कि यह कीमत 20 डॉलर प्रति बैरल भी पहुंच सकती है. तेल की कीमतों में आ रही इतनी बड़ी गिरावट को देखते हुए सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर यह गिरावट क्यों जारी है.

सऊदी अरब और रूस के बीच की अनबन

तेल की कीमतों में आयी इस गिरावट की वजह तेल के सबसे बड़े निर्यातक देश सऊदी अरब और रूस के बीच शुरू हुई अनबन है. बीते महीने जब कोरोना वायरस का प्रकोप बढ़ा तो कई देशों ने एहतियात के तौर पर अपने कारखानों और सार्वजनिक परिवहन पर रोक लगा दी. दुनिया भर में अन्य देशों के नागरिकों के आने पर लगी पाबंदी की वजह से उड़ानों में भी भारी कमी आयी. इन फैसलों का सीधा असर तेल की खपत और उसके आयात पर पड़ा.

तेल का आयात कम करने वालों में सबसे पहला नाम चीन का और दूसरा इटली का था. ये दोनों ही देश कोरोना वायरस से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं. इनके द्वारा तेल के आयात में की गयी कटौती सऊदी अरब के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं थी. ऐसा इसलिए क्योंकि जहां चीन सऊदी अरब के तेल का सबसे बड़ा खरीदार है. वहीं, यूरोप के तीन सबसे बड़े तेल खरीदारों में से एक इटली भी सऊदी अरब से ही सबसे ज्यादा तेल खरीदता है.

अपने तेल के निर्यात में गिरावट ने सऊदी अरब को चिंतित कर दिया. इस चिंता की सबसे बड़ी वजह यह थी कि इस खाड़ी देश की अर्थव्यवस्था केवल और केवल तेल से होने वाली कमाई पर ही टिकी है. सऊदी अरब ने इस संकट से उबरने के लिए एक बैठक बुलाई जिसमें पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन (ओपेक) के अलावा रूस भी शामिल हुआ. बैठक में सऊदी अरब ने ओपेक सदस्य देशों और रूस के सामने कच्चे तेल के उत्पादन में कटौती करने का प्रस्ताव रखा. उसका कहना था कि कोरोना वायरस के चलते अंतरराष्ट्र्रीय बाजार में तेल की मांग में कमी आयी है, ऐसे में अगर सभी ओपेक सदस्य देश और रूस तेल के उत्पादन में कमी करेंगे तो तेल की कीमतों में ज्यादा गिरावट नहीं आएगी.

दुनिया की चर्चित तेल कंपनी जेबीसी के संस्थापक जोहान्स बेनिग्नी न्यूज़ एजेंसी डॉयचे बेले को बताते हैं, ‘(बैठक में) दोनों की राय में बड़ा अंतर देखने को मिला. रूस तेल की कीमतों को 50 डॉलर प्रति बैरल पर स्थिर रखना चाहता है और सउदी अरब इससे थोड़ा अधिक कीमतें चाहता है. इस वजह से (कीमतों के मसले पर) बीच का रास्ता नहीं निकल सका.’

आखिर में ओपेक के सदस्य देश तेल उत्पादन कम करने पर राजी हो गये और उन्होंने रूस से भी ऐसा करने को कहा. लेकिन रूस ने ऐसा करने से इनकार कर दिया. विशेषज्ञों का मानना है कि उसने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वह अमेरिका द्वारा अपनी तेल कंपनी कंपनी रोसनेफ्ट पर लगाये गए प्रतिबंधों से नाराज है. वह तेल के दाम कम करके अमेरिकी शेल ऑइल कंपनियों को नुकसान पहुंचाना चाहता है. इन कंपनियों की तेल उत्पादन की कीमत काफी ज्यादा है और अंतराराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत ज्यादा कम होने से इनमें से कई कंपनियां दीवालिया भी हो सकती हैं. रूस हमेशा से यह चाहता रहा है कि अमेरिकी शेल ऑइल कंपनियों को बाजार से बाहर कर दिया जाए. लेकिन ओपेक देश और खास कर सऊदी अरब ऐसा नहीं होने देते थे. इसलिए उसने इस बार ओपेक के खिलाफ जाने का फैसला किया.

उत्पादन में कटौती के जरिये तेल की कीमतें बढ़ाने से नाराज होकर सऊदी अरब ने एक चौंकाने वाला फैसला लिया. उसने न केवल अपने तेल के दाम काफी कम कर दिए, बल्कि कच्चे तेल का उत्पादन भी पहले से ज्यादा करने का ऐलान कर दिया. इस मामले पर करीब से निगाह रख रहे जानकारों कोई तेल निर्यातक देश ऐसा कदम तब उठाता है, जब उसे किसी दूसरे देश के तेल के खरीदारों में सेंधमारी करनी होती है. इनके मुताबिक सऊदी अरब तेल की कीमतें कम करके रूसी तेल के सबसे बड़े खरीदार यूरोपीय देशों को अपनी ओर खींचना चाहता है.

भारत पर असर

भारत एक ऐसा देश है जो 82 फीसदी तेल आयात करता है, ऐसे में कच्चे तेल के दाम कम होने से उसे बड़ा फायदा होगा. विशेषज्ञों का कहना है कि अगर तेल की कीमतें 30 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहती हैं तो भारत का तेल खरीदने का खर्च आधा हो सकता है.

अगर कच्चे तेल के दाम ज्यादा होते हैं तो सरकार के लिए इस पर टैक्स लगाकर ज्यादा कमाई करना मुश्किल हो जाता है. बीते हफ्ते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें कम होने के बाद भारत सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी बढ़ा दी. इसमें तीन रु प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई है. अधिकारियों की मानें तो इससे सरकार को 39 हजार करोड़ रु का अतिरिक्त राजस्व मिलेगा जिससे उसे अपना वित्तीय घाटा कम करने में थोड़ी मदद मिलेगी.

इसके अलावा भारत सरकार को कच्चे तेल के आयात के लिए बहुत ज्यादा विदेशी मुद्रा भी खर्च नहीं करनी पड़ेगी. इससे उसका करेंट अकाउंट डेफिसिट कम हो जाएगा.