हाल ही में क्षुद्र ग्रहों का अध्ययन करने वाली संस्था माइनर प्लैनेट सेंटर ने घोषणा की है कि धरती के पास एक और चांद है जो करीब तीन सालों से इसके चक्कर लगा रहा है. उत्साहित करने वाली इस खबर के बारे में यह जान लेना ज़रूरी है कि यह नया चंद्रमा हमारे पुराने चंद्रमा जितना बड़ा नहीं है और उतना चमकीला भी नहीं है. बताया जा रहा है कि इसकी कुल माप महज एक से छह मीटर के बीच है और यह ज्यादा समय तक हमारे साथ नहीं रहेगा.

इस चंद्रमा को सबसे पहले अमेरिकी खगोलविदों, थियोडोर प्रूआइन और कैक्पर वीर्ज़कोज ने 15 फरवरी को देखा था. इसके लिए टास्कुन (एरिज़ोना) की माउंट लेमन ऑब्जरवेटरी में दोनो वैज्ञानिकों ने 1.52 मीटर (60 इंच) के टेलिस्कोप का इस्तेमाल किया था. अगले कुछ दिन इसकी कक्षा का अध्ययन करने के बाद 25 फरवरी को यह घोषणा की गई कि एक पिंड अस्थायी तौर पर धरती के चारों ओर चक्कर लगा रहा है. इसे 2020 सीडी3 नाम दिया गया है.

2020 सीडी3, असल में एस्टेरॉयड्स (क्षुद्रग्रहों) के उस समूह का बहुत छोटा सा हिस्सा है जो स्थायी तौर पर सूरज और अस्थायी तौर पर धरती का चक्कर काटते हैं. कभी-कभार ही ऐसा होता है कि ये एस्टेरॉयड्स धरती के ज्यादा पास आते हैं या उससे टकराते हैं. हालांकि 2020 सीडी3 इतना छोटा है कि यह टकरा भी जाए तो धरती को कोई नुकसान नहीं होगा. धरती के पास आने पर ऐसा भी हो सकता है कि यह वायुमंडल में ही नष्ट हो जाए और जमीन तक कभी पहुंच ही न पाए. फिलहाल 2020 सीडी3 जिस कक्षा में है वह हमारे चांद के मुकाबले काफी दूरी पर है.

धरती के चारों ओर चंद्रमा की कक्षा (नीले रंग में) और 2020 सीडी3 की कक्षा (नारंगी रंग में) | ट्विटर/हैनो रेन

पीछे पलटकर देखें तो पता चलता है कि इस तरह के मिनी-मून्स या छोटे-मोटे चंद्रमा आते-जाते रहते है और हो सकता है कि 2020 सीडी3 भी धरती की अपनी आखिरी परिक्रमा ही कर रहा हो. एक अध्ययन बताता है कि हर समय इस तरह का कम से कम एक अस्थायी छोटा चंद्रमा धरती का चक्कर लगा रहा होता है. आम तौर पर इनका साइज एक मीटर से ज्यादा होता है और ये धरती की कम से कम एक परिक्रमा तो करते ही हैं. इनमें से किसी के भी लंबे समय तक न टिक पाने का कारण हमारे अपने चंद्रमा और सूर्य का गुरुत्वाकर्षण बल है. इससे पैदा हुए खिंचाव के चलते ये छोटे पिंड कुछ सालों बाद धरती का चक्कर लगाना छोड़कर फिर से सूर्य की परिक्रमा करने लगते हैं.

इस तरह के छोटे चंद्रमाओं की खोज के बाद इनकी कक्षा का ठीक-ठीक पता लगा पाना लगभग असंभव सा काम माना जाता है. असल में ये पिंड इतने छोटे होते हैं कि सूर्य के रेडिएशन से भी इनकी स्थिति बदल जाती है. चूंकि इनके आकार और परावर्तकता (रिफ्लेक्टिविटी) के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं होती है इसलिए इनकी कक्षा के बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं चल पाता है.

इससे पहले साल 2006 में इसी तरह के एक और पिंड आरएच120 को खोजा गया था. सिर्फ 2-3 मीटर व्यास वाले आरएच120 ने सितंबर 2006 से जून 2007 के बीच धरती के चार चक्कर लगाए थे. बाद में यह स्वतंत्र होकर, सुदूर सूरज की तरफ निकल गया. यह लगभग हर 20 साल बाद धरती के पास आता है और अगली बार 2028 में फिर से हमारे पास से गुजरेगा.

धरती और सूरज के एक साथ चक्कर काटता हुआ एक आभासी उपग्रह | नासा

धरती के बाकी कथित चंद्रमा वे एस्टेरॉयड्स है जो सूर्य का एक चक्कर लगाने में एक साल का वक्त लगाते हैं. ये धरती के साथ-साथ सूर्य का भी चक्कर लगा रहे होते हैं. इन्हें धरती का क्वासी सैटेलाइट यानी आभासी उपग्रह कहा जाता है क्योंकि ये हमसे हमारे चंद्रमा के मुकाबले बहुत दूर होते हैं. 2016 एचओ3 इस तरह के उपग्रहों का सबसे अच्छा उदाहरण है. यह सूरज के साथ-साथ धरती की परिक्रमा भी करता प्रतीत होता है.

कुल मिलाकर, 2020 सीडी3 भले ही एक रोमांचक खोज हो लेकिन इसके चलते किसी विस्फोट या शाम को चांद की रोशनी बढ़ जाने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए. यह बस हमारे चंदा मामा का दूर का और बहुत छोटा सा भाई है.


द ओपन यूनिवर्सिटी में प्लानेटरी जियोसाइंस के प्रोफेसर डेविड रोथरी का यह लेख मूल रूप से द कन्वर्सेशन पर प्रकाशित हुआ है.