मध्य प्रदेश में कांग्रेस सरकार गिर गई है. इसके बाद पार्टी के पूर्व नेता और अब भाजपा में शामिल हो चुके ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा है कि यह जनता की जीत है. उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदेश सरकार जनसेवा के रास्ते से भटक गई थी.

ज्योतिरादित्य सिंधिया अपनी पुरानी पार्टी से कई वजहों से नाराज थे. उनकी नाराजगी की एक प्रमुख वजह यह थी कि मध्य प्रदेश कांग्रेस में उन्हें वह सम्मान नहीं मिल रहा था, जिसके, उन्हें लगता था, वे हकदार थे. 2018 में जब मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव हो रहे थे तो उनकी ओर से लगतार कांग्रेस पर यह दबाव बनाया गया कि उन्हें पार्टी मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. कांग्रेस पार्टी ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को चुनाव अभियान समिति का प्रमुख बनाया और कमलनाथ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाए गए.

सिंधिया को चुनाव अभियान समिति का प्रमुख बनाए जाने से उनके समर्थकों में यह संदेश गया कि अगर मध्य प्रदेश में कांग्रेस चुनाव में कामयाबी हासिल करती है तो ज्योतिरादित्य सिंधिया को मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है. सिंधिया की ओर से भी पार्टी पर यह दबाव था. यही वजह है कि चुनाव परिणाम आने के बाद कांग्रेस पार्टी को मुख्यमंत्री के नाम की घोषणा करने में कई दिन लग गए. अंत में जब कमलनाथ का नाम तय हुआ तो उस समय के कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ अपनी तस्वीर साझा करके यह संकेत देने की कोशिश की कि पार्टी में कोई आंतरिक मतभेद नहीं है.

यह बात उस समय भी आई थी कि राजस्थान में जिस तरह से सचिन पायलट को उपमुख्यमंत्री बनाया गया, उसी तरह का प्रस्ताव मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया को भी दिया गया था. जब सिंधिया ने पार्टी छोड़ी तो कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने इस प्रस्ताव को सार्वजनिक किया और यह भी बताया कि उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव भी दिया गया था जिसे उन्होंने स्वीकार नहीं किया. दिग्विजय सिंह ने यह जानकारी भी दी कि ज्योतिरादित्य सिंधिया चाहते थे कि उनके किसी ‘विश्वस्त’ व्यक्ति को उपमुख्यमंत्री बना दिया जाए. इसके लिए कांग्रेस पार्टी तैयार नहीं थी.

मध्य प्रदेश की राजनीति में ज्योतिरादित्य सिंधिया को ‘महाराज’ भी कहा जाता है. कांग्रेस के कुछ नेताओं से बात करने पर पता चलता है कि ‘महाराज’ किसी भी कीमत पर यह नहीं चाहते थे कि प्रदेश सरकार में वे ‘नंबर दो’ की हैसियत से आएं.

इस बारे में कांग्रेस के एक नेता कहते हैं, ‘महाराज को यह लगता था कि देर-सबेर कांग्रेस पार्टी मध्य प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन करेगी और उन्हें मुख्यमंत्री बनाया जाएगा. इस लिहाज से उन्होंने अपने समर्थक विधायकों को हर हाल में अपने साथ बनाए रखने की रणनीति पर काम जारी रखा था. उनकी योजनाओं को बड़ा झटका तब लगा जब वे 2019 में लोकसभा चुनाव हार गए. बड़ी से बड़ी कांग्रेस विरोधी लहर में भी इस सीट पर सिंधिया परिवार की जीत होती आई है. ज्योतिरादित्य सिंधिया के लिए यह बहुत बड़ा झटका था.’

वे आगे बताते हैं, ‘पार्टी नेताओं से बातचीत में सिंधिया ने अपनी हार के लिए भितरघात को जिम्मेदार माना. उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि आखिर पूरे प्रदेश में सिर्फ मुख्यमंत्री कमलनाथ के बेटे नकुल नाथ ही क्यों चुनाव जीते. लोकसभा चुनाव में हार के बाद सिंधिया को यह लगने लगा कि प्रदेश में कमलनाथ और दिग्विजय सिंह उनके खिलाफ एक हो गए हैं और उनकी राजनीति को लगातार मुश्किल बनाने का काम कर रहे हैं. इसकी शिकायत ज्योतिरादित्य सिंधिया ने पार्टी आलाकमान से भी की. लेकिन वहां उन्हें कोई खास समर्थन नहीं मिला. उन्हें लगता था कि नई पीढ़ी को आगे लाने की रणनीति के तहत मध्य प्रदेश कांग्रेस में सबसे अधिक अहमियत आज नहीं तो कल दी जाएगी. लेकिन ऐसा नहीं हो रहा था.’

अब सवाल उठता है कि क्या मध्य प्रदेश कांग्रेस में नंबर एक बनने के लिए संघर्ष करने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया मध्य प्रदेश भाजपा में नंबर एक बन पाएंगे? मध्य प्रदेश भाजपा की आतंरिक राजनीति और मध्य प्रदेश को लेकर पार्टी आलाकमान की रणनीति को जो लोग जानते-समझते हैं, वे इसे अपने ढंग से सामने रख रहे हैं. मध्य प्रदेश से भाजपा ने सिंधिया को राज्यसभा में भेजा है और उनके बारे में चर्चा है कि उन्हें मोदी सरकार के अगले मंत्रिमंडल विस्तार में कैबिनेट मंत्री बनाया जा सकता है.

मध्य प्रदेश भाजपा के एक नेता इस बारे में कहते हैं, ‘बेहद गर्मजोशी से भाजपा में ज्योतिरादित्य सिंधिया का स्वागत करना और उन्हें राज्यसभा भेजना अलग बात है और प्रदेश भाजपा में उन्हें सर्वोच्च नेता बनाना बिल्कुल अलग बात है. सच्चाई तो ये है कि सिंधिया का स्वागत इस ढंग से इसलिए किया गया क्योंकि उनकी वजह से मध्य प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने वाली है. लेकिन मुझे नहीं लगता कि हाल-फिलहाल प्रदेश की राजनीति में भाजपा उन्हें कोई प्रमुख भूमिका देने वाली है. राज्यसभा की सीट उन्हें देकर ये संकेत भी दिया गया है कि पार्टी उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में ही रखेगी और संभव है कि भविष्य में मोदी सरकार में भी उन्हें शामिल कर लिया जाए लेकिन प्रदेश में उनके लिए फिलहाल कोई खास संभावना नहीं है.’

इस बारे में वे आगे बताते हैं, ‘अभी तो प्रदेश भाजपा के सर्वोच्च नेता शिवराज सिंह चौहान ही हैं. हालांकि, दिल्ली के कुछ बड़े नेता उन्हें पसंद नहीं करते हैं. इसके बावजूद जनता, संगठन और संघ पर अपनी पकड़ की वजह से शिवराज सिंह को दरकिनार करना बेहद मुश्किल है. बीच में उनके मुकाबले कैलाश विजयवर्गीय को खड़ा करने की कोशिश हुई थी. लेकिन विजयवर्गीय की राजनीतिक स्थिति पिछले कुछ समय से खराब हुई है. दूसरा और कोई नेता नहीं है जो शिवराज सिंह को चुनौती दे सके. संघ परिवार के पदाधिकारियों से सिंधिया परिवार की नजदीकी रही है. इसका लाभ उन्हें भविष्य में मिल सकता है. लेकिन भाजपा में एक परंपरा रही है कि दूसरी पार्टी से आए नेताओं को सामान्य तौर पर शीर्ष पद नहीं दिया जाता है.’

क्या ज्योतिरादित्य सिंधिया मध्य प्रदेश भाजपा में शिवराज सिंह के उत्तराधिकारी हो सकते हैं? इसके जवाब में वे कहते हैं, ‘कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के मुकाबले अभी शिवराज सिंह चौहान की उम्र भी कम है, इसलिए मध्य प्रदेश भाजपा में उनका उत्तराधिकारी बनने के लिए भी ज्योतिरादित्य सिंधिया को अभी लंबा इंतजार करना होगा.’