बीते महीने भारतीय बैडमिंटन कोच फ्लैंडी लिम्पल ने व्यक्तिगत कारणों का हवाला देकर अपने पद से इस्तीफा दे दिया. बीते तीन सालों में अनुबंध पूरा होने से पहले अपना पद छोड़ने वाले वे चौथे कोच हैं. इंडोनिशिया के फ्लैंडी लिम्पल को बीते साल मार्च में भारतीय बैडमिंटन की डबल्स टीम का विशेष कोच नियुक्त किया गया था. उन्हें भारतीय टीम को टोक्यो ओलंपिक तक अपनी सेवायें देनी थीं.

फ्लैंडी लिम्पल से पहले बीते तीन सालों में जो विदेशी कोच अनुबंध पूरा किए बिना चले गए, उन्होंने भी व्यक्तिगत कारणों का ही हवाला दिया था. लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि कुछ ही समय बाद ये सभी दूसरी टीमों से जुड़ गए. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या वास्तव में इन लोगों के भारतीय टीम को छोड़ने की वजहें वही थीं, जो इन्होंने बतायी थीं. और क्या फ्लैंडी लिम्पल ने भी व्यक्तिगत कारणों के चलते ही अपना पद छोड़ा है?

आइये फ्लैंडी लिम्पल सहित उन सभी विदेशी कोचों पर एक नज़र डालते हैं जिन्होंने पिछले तीन वर्षों में अनुबंध पूरा होने से पहले ही अपना पद छोड़ दिया. साथ ही यह भी जानते हैं कि इन लोगों ने पद छोड़ने के जो कारण बताये थे, क्या उन्हें सही ठहराया जा सकता है?

मूलो हांड्यो

इंडोनेशियाई कोच मूलो हांड्यो को फरवरी 2017 में तीन साल के लिए भारतीय एकल पुरुष बैडमिंटन टीम का कोच नियुक्त किया गया था. इसी साल किदाम्बी श्रीकांत ने पांच सुपरसीरीज जीती थीं, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है. इसके आलावा साईं प्रणीत ने सिंगापुर ओपन का खिताब अपने नाम किया था. इन दोनों की इस चमक के पीछे मूलो हांड्यो की ही मेहनत बताई गयी थी.

बैडमिंटन के महान खिलाड़ियों में से एक तौफीक हिदायत के मेंटर रह चुके हांड्यो को उनके कड़े ट्रेनिंग सेशन के लिए जाना जाता है. भारतीय एकल खिलाड़ियों के लिए उन्होंने ऐसा ट्रेनिंग सिस्टम तैयार किया था, जिसमें लंबे-लंबे सेशन हुआ करते थे. श्रीकांत और साईं प्रणीत जैसे शीर्ष एकल खिलाड़ियों को ऐसी ट्रेनिंग की आदत डालने में समय जरूर लगा, लेकिन आदत पड़ने के बाद इनके खेल में गजब का बदलाव दिखाई दिया.

हांड्यो के आने के बाद भारतीय बैडमिंटन अपने रंग में दिखाई देने लगा था. भारतीय खिलाड़ी दुनियाभर में अपनी छाप छोड़ रहे थे. अचानक एक दिन मूलो हांड्यो के कोच पद छोड़ने की खबर आयी. हांड्यो का कहना था कि वह अपने परिवार को और समय देना चाहते हैं. लेकिन, भारतीय टीम को छोड़ने के कुछ ही रोज बाद ही वे सिंगापुर के मुख्य कोच बन गए.

टान किम हर

मलेशिया के टान किम हर भारतीय बैडमिंटन टीम को सबसे लंबे समय तक सेवायें देने वाले कोचों में से एक थे. साल 2015 में जब उन्हें पांच साल के लिए भारतीय डबल्स बैडमिंटन की जिम्मेदारी सौंपी गयी थी तो उन्होंने टोक्यो ओलंपिक-2020 में भारत को मेडल दिलवाने का लक्ष्य रखा था. उन्होंने इसे लेकर काफी मेहनत भी की.

डबल्स के खिलाड़ी चिराग शेट्टी और स्वास्तिक साईराज रंकीरेड्डी एक-दूसरे के साथ जोड़ी बनाने के इच्छुक नहीं थे. लेकिन कोच किम हर ने न केवल इन्हें साथ आने के लिए तैयार किया बल्कि इनके लिए एक रोड मैप भी तैयार किया. इसके बाद इस जोड़ी ने 2018 राष्ट्रमंडल खेलों में रजत पदक जीता. यह जोड़ी अब तक दुनियाभर में कई बड़े खिताब अपने नाम कर चुकी है. चिराग शेट्टी और स्वास्तिक साईराज की जोड़ी इस समय शीर्ष 10 में आती है. किम हर के मार्गदर्शन में एन सिक्की रेड्डी और अश्विनी पोनप्पा की महिला जोड़ी ने भी राष्ट्रमंडल खेलों में कांस्य पदक जीता.

लेकिन, 2019 में जब फ्लैंडी लिम्पल भारतीय डबल्स टीम से जुड़े तो टिम हर ने भारतीय बैडमिंटन संघ से अपना अनुबंध साल 2024 तक करने की बात कही. भारतीय बैडमिंटन संघ इसके लिए तैयार नहीं हुआ. इस घटना के कुछ रोज बाद ही टान किम हर ने व्यक्तिगत कारणों का हवाला देते हुए भारतीय टीम को छोड़ने की घोषणा कर दी. वे इसके तुरंत बाद जापान की राष्ट्रीय टीम से जुड़ गए.

किम जी ह्यून

बीते साल अप्रैल में ही किम जी ह्यून को भारतीय महिला टीम का कोच नियुक्त किया गया था. उन्हें भारतीय बैडमिंटन स्टार साइना नेहवाल के साथ काम करना था. लेकिन साइना के इनकार के बाद उन्हें पीवी सिंधु का कोच नियुक्त किया गया.

इसके बाद अगस्त 2019 में ह्यून का नाम तब सुर्ख़ियों में आया, जब उनके मार्गदर्शन में पीवी सिंधु ने विश्व बैडमिंटन चैंपियनशिप जीती. सिंधु ने इस जीत के बाद ह्यून की जमकर तारीफ की थी और उन्हें इसका श्रेय भी दिया था. लेकिन हैरानी तब हुई, जब सिंधु के विश्व चैंपियन बनने के एक महीने बाद ही ह्यून ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया. उन्होंने अपने पति की बीमारी को इस्तीफे का कारण बताया.

लेकिन, उनके इस्तीफे पर सवाल तब उठे जब उन्होंने कुछ ही महीनों बाद चीनी ताइपे में एपी बैडमिंटन क्लब से अनुबंध कर लिया. इसके बाद पिछले दिनों एक साक्षात्कार में जब किम जी ह्यून से भारतीय टीम को छोड़ने के बारे में पूछा गया तो उन्होंने पीवी सिंधु को कठोर और हृदयहीन व्यक्ति बताते हुए इस सवाल से पल्ला झाड़ लिया.

भारतीय बैडमिंटन टीम के मुख्य कोच पुलेला गोपीचंद के आलोचक यह भी बताते हैं कि ह्यून ने गोपीचंद के चलते ही अपना पद छोड़ा. इनके मुताबिक गोपीचंद ने ह्यून को कोचिंग के दौरान अपने हिसाब से काम करने की आजादी नहीं दी और पीवी सिंधु के विश्व चैंपियन बनने का सेहरा भी केवल अपने सर बांध लिया, जिससे ह्यून नाराज हो गईं. हालांकि, गोपीचंद के करीबियों ने इन बातों को झूठा और मनगढ़ंत बताया.

फ्लैंडी लिम्पल

भारतीय बैडमिंटन संघ के साथ-साथ लिम्पल ने भी अनुबंध पूरा होने से पहले ही टीम छोड़ने की वजह पत्नी की बीमारी को बताया है. लेकिन, लेकिन जाते-जाते फ्लैंडी लिम्पल ने जो कुछ बोला है उससे पता चलता है कि उनके जाने की वजह केवल यही नहीं है.

लिम्पेले ने पीटीआई से कहा, ‘मैंने दो मार्च को गोपीचंद से कहा था मैं इस्तीफा देना चाहता हूं. हालांकि मैंने ऑल इंग्लैंड और यूरोपीय टूर्नामेंट तक बने रहने का फैसला किया था, लेकिन भारतीय खिलाड़ियों ने ऑल इंग्लैंड टूर्नामेंट में हिस्सा नहीं लेने का फैसला किया तो मैंने अपने फैसले को बदल दिया.’ फ्लैंडी लिम्पल ने आगे कहा, ‘मुझे लगता है कि डबल्स को सिंगल्स जितना पसंद नहीं किया जाता है. यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि उसे सिंगल्स (एकल) की तुलना में कम प्यार मिलता है. लेकिन यह सिर्फ एक कारण है, मेरे जाने का मुख्य कारण व्यक्तिगत है.’

बैडमिंटन के जानकार भी मानते हैं कि भारतीय बैडमिंटन जगत में डबल्स से ज्यादा सिंगल्स को तवज्जो दी जाती है. इसके चलते न केवल डबल्स के कोच, बल्कि खिलाड़ी भी खुद को दरकिनार किया हुआ महसूस करते हैं.

हालांकि, इंडोनेशियाई कोच के भारतीय टीम को छोड़ने की एक वजह उनके और खिलाड़ियों के बीच सामंजस्य न बैठ पाने को भी बताया जाता है. बताते हैं कि लिम्पल के कड़े ट्रेनिंग शेड्यूल से कई वरिष्ठ खिलाड़ी खुश नहीं थे. बीते साल दिसंबर में लिम्पल के साक्षात्कार से भी इसका पता लगता है, इसमें उन्होंने भारतीय खिलाड़ियों के रवैये पर सवाल उठाये थे. उन्होंने पीटीआई से बातचीत में कहा था, ‘डबल्स के मोर्चे पर भारतीय खिलाड़ियों का रवैया बहुत ही अजीब है. डबल्स में आपको व्यक्तिगत तौर पर नहीं बल्कि एक जोड़ी के तौर पर सोचना होता है...यहां तो खिलाड़ी कई बार मेरी ही बात नहीं मानते. सभी देशों में अलग-अलग कल्चर है, लेकिन एक कोच के रूप में मेरे अपने विचार हैं. जो चाहता हूं, उसे करना बहुत मुश्किल नहीं है.’