बीते बुधवार को चेन्नई में दक्षिण रेलवे के एक अधिकारी सर्वनन ने अपने ऑफिस में दो लोगों से मुलाकात की थी. 56 वर्षीय सर्वनन के लिए यह मुलाकात बहुत डराने वाली रही. वे कहते हैं कि ‘दस मिनट की इस बातचीत में मेरे दोनों विजिटर लगातार खांसते रहे. मैं इतना परेशान हुआ कि आखिर में पांच मिनट और खर्च करके मुझे उन्हें ये समझाना पड़ा कि क्यों उन्हें, खांसते हुए अपने मुंह पर हाथ रखना चाहिए.’

सर्वनन किसी भी जागरुक नागरिक की तरह कोरोना वायरस के भारत पहुंचने और उसके फैलने की खबरों पर शुरू से नज़र रख रहे हैं. वे जानते हैं कि अब तक करीब दो सौ लोग इस संक्रमण की चपेट में आ चुके हैं जिनमें से चार की मौत हो चुकी है. उन्हें यह भी पता है कि कोरोना का दूसरा मरीज चेन्नई में ही पाया गया था, आगे वे कहते हैं कि ‘अगर आप मेरे ऑफिस आएंगे तो आपको लगेगा कि कोरोना कभी पैदा ही नहीं हुआ.’ सर्वनन के मुताबिक उनके ऑफिस में न तो सैनिटाइजर्स हैं और न ही कर्मचारियों को मास्क दिए गए हैं. रेलवे का ऑफिस होने के चलते यहां सैकड़ों लोगों का रोज का आना-जाना रहता है. इसके बावजूद, इन लोगों को मॉनीटर किए जाने की कोई बात अब तक नहीं हुई है. सर्वनन यह भी बताते हैं कि ‘हम पहले की ही तरह धूल भरी कुर्सी-मेजों पर ऐसे काम करते हैं जैसे कुछ हुआ ही न हो.’

अब जब कोरोना वायरस का प्रकोप अपने दूसरे चरण में पहुंच गया है यानी विदेश से आए मामलों के बाद अब संक्रमण स्थानीय लोगों को भी होने लगा है. ऐसे में देश भर में राज्य सरकारें शुरूआती उपाय के तौर पर लोगों को सोशल डिस्टेंसिंग के तरीके बता रही हैं ताकि वायरस को तीसरे चरण यानी पूरे समुदाय में फैलने से रोका जा सके. वैसे तो इसके चलते स्कूल-कॉलेज, व्यापार-धंधे और सिनमा हॉल बंद हैं और ज्यादातर निजी संस्थानों में भी कर्मचारियों को अपने घर से काम करने के लिए कह दिया है. लेकिन केंद्र और राज्य सरकारों के कर्मचारियों को ऐसा कोई निर्देश नहीं दिया गया है और ना ही उनके काम के घंटे कम किए गए हैं.

हालांकि बीते बुधवार को केंद्रीय कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग ने एक आदेश जारी कर केंद्र सरकार के सभी दफ्तरों में पूरी सावधानी बरते जाने की बात कही है. इसमें ऑफिस के एंट्री गेट्स पर थर्मल स्क्रीनिंग उपकरण लगाए जाने और दफ्तरों में हैंड सैनिटाइजर उपलब्ध करवाने के निर्देश भी दिए गए हैं. आम लोगों के आने-जाने पर रोक लगाने के साथ ही उन लोगों को घर भेजने की बात भी कही गई है जिनमें फ्लू के लक्षण हों. इसके साथ ही, उन लोगों को तुरंत छुट्टी दिए जाने की बात भी इस आदेश में शामिल है जो खुद के कोरोना संक्रमित होने की आशंका के चलते अपने को अलग-थलग करना चाहते हैं.

लेकिन सरकारी कर्मचारियों के परिवार इतने भर से खुश नहीं हैं. दिल्ली में, सार्वजनिक क्षेत्र की एक कंपनी में काम करने वाली एक महिला कर्मचारी के परिवार का कहना है कि सरकार अपने कर्मचारियों की स्वास्थ्य सुरक्षा पर ध्यान नहीं दे रही है. इस कर्मचारी की बेटी का कहना है कि ‘मेरी मां के काम में उन अनगिनत लोगों से मिलना भी शामिल है जो उनके यहां सेवाओं की शिकायत लेकर आते हैं. आज तक इस इंटरेक्शन को कम करने के लिए कुछ भी नहीं किया गया है. क्या ऐसा करके सरकार अपने लोगों को खतरे में नहीं डाल रही है?’

राज्य सरकारों के दफ्तरों के हालात भी केंद्रीय सेवाओं से कुछ अलग नहीं है. बंगलुरू के एक अधिकारी बताते हैं कि कर्मचारियों से यह उम्मीद की जा रही है कि इस खतरनाक समय वे सरकार के साथ खड़े रहेंगे. लेकिन उन पर आने वाले खतरों को कम करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं. उदाहरण के लिए, उच्च अधिकारी अभी भी डिजिटली काम करने के निर्देश देने की बजाय फाइलों की हार्ड कॉपियां ही मांग रहे हैं. उक्त अधिकारी यह भी कहते हैं कि ‘हम कहते रहते हैं कि सारे सरकारी ऑफिस डिजिटल हो गए हैं. लेकिन आप आकर देखेंगे तो पता चलेगा कि सरकारी दफ्तर कितने प्राचीन तरीके से चलते हैं.’

सरकारी दफ्तरों में इस तरह की लापरवाही का एक खतरनाक उदाहरण पिछले दिनों पश्चिम बंगाल में देखने को मिला. यहां पर एक वरिष्ठ अधिकारी का बेटा कुछ ही समय पहले राज्य सचिवालय गया जहां पर उसने बिना किसी रोक-टोक के कई उच्च अधिकारियों से मुलाकात की. बाद में वह कोरोना संक्रमित पाया गया. इसके चलते बंगाल सरकार को कोलकाता के सारे सरकारी मुख्यालयों की सफाई के आदेश देने पड़े.

वैसे तो, बीते गुरूवार को मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने मुंबई बंद की घोषणा कर दी है लेकिन सरकारी दफ्तरों में एक चौथाई लोगों को फिर भी काम पर जाना होगा. इसके पहले यहां के हालात भी कुछ अलग नहीं थे. महाराष्ट्र सरकार की एक फर्म में काम करने वाले एक कर्मचारी बताते हैं कि उनके ऑफिस में मास्क तब मंगवाए गए जब कर्मचारियों ने बार-बार मैनेजमेंट को इसके लिए खत लिखे. वे यह भी बताते हैं कि ‘इसमें कई दिन लग गए. तब तक हमें स्टैंडर्ड रिप्लाई मिल रहा था कि हम इस मामले को देख रहे हैं.’ महाराष्ट्र में कोरोना वायरस के मामले सबसे ज्यादा (63) हो चुके हैं. इसके चलते भी लोगों में डर है. उक्त कर्मचारी के मुताबिक उन्होंने दो हफ्ते की छुट्टी भी मांगी थी जो उन्हें नहीं मिली. वे कहते हैं कि ‘मेरी दो छोटी-छोटी बेटियां हैं. मुझे उनकी बहुत चिंता है.’

मंगलौर के पूर्व-कलेक्टर शशिकांत सेंथिल इससे थोड़ी अलग बात कहते हैं, वे बताते हैं कि महामारी की इन स्थितियों में उच्च अधिकारियों का काम से दूर रह पाना मुश्किल है. ऐसे में सरकार की सही नीति यह होगी कि वह अपने उन कर्मचारियों को घर बैठने के लिए कहे जिनकी उतनी जरूरत नहीं है और ऑफिसों में लोगों का आना-जाना कम करवाए. सेंथिल सुझाते हैं कि ‘अगर आस-पास कोई चुनाव नहीं हैं तो निर्वाचन विभाग को घर बैठने के लिए क्यों नहीं कहा जा रहा है? सरकारी मशीनरी में ऐसी कई परतें होती हैं जिनके पूरे समय काम करने की आवश्यकता नहीं होती है. इसके अलावा अधिकारी भी फाइलों को डिजिटली हैंडल कर सकते हैं और ऐसा करने पर लोगों को ऑफिस आने की ज़रूरत कम होगी.’

लेकिन सरकारी सफाई कर्मचारियों के लिए अपने काम पर न आना कोई विकल्प ही नहीं है. वे मीडिया में डाक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ की मास्क और ग्लव्ज से लैस तस्वीरें देखते हैं तो उनका डर और बढ़ जाता है. चेन्नई के एक सफाईकर्मी अपना अनुभव बांटते हुए कहते हैं कि वे लोगों से यह सुन-सुनकर पक चुके हैं कि उन्हें घर बैठना चाहिए. वे इस पर उल्टा सवाल करते हैं कि ‘फिर आपके सीवर कौन साफ करेगा? क्या आप आकर हमारी मदद करोगे?’ वे यह सवाल भी करते हैं कि ‘अगर डॉक्टरों और अस्पताल के बाकी लोगों को इतनी सुरक्षा की जरूरत है तो फिर हम तो सीवर साफ करते हैं जिसमें मरीजों की गंदगी भी शामिल होती है, तो क्या हमें भी उतनी ही सुरक्षा नहीं मिलनी चाहिए?’