बीते गुरूवार को रात आठ बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों को संबोधित किया. इस संबोधन में उन्होंने कोरोना वायरस से फैलने वाली महामारी कोविड-19 पर बात की. इसके फैलाव को रोकने में मदद करने की अपील के साथ प्रधानमंत्री मोदी ने 22 मार्च को जनता कर्फ्यू लगाए जाने की बात भी कही. यह दिलचस्प है कि उनका भाषण शुरू होने से पहले ही सोशल मीडिया पर इसकी चर्चा शुरू हो गई थी जो अब तक जारी है.

सोशल मीडिया पर एक बड़ा तबका इस भाषण को लेकर उनकी आलोचना करता दिखाई दिया. ट्विटर पर हैशटैग ‘मोदी जी बकवास बंद करो’ के साथ दसियों हजार टिप्पणियां की गईं हैं. इनमें से ज्यादातर में कहा गया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने कोई ऐसी नई बात की है जो अब तक नहीं कही जा रही थी और यह एक गैरजरूरी भाषण था. वहीं, इसके उलट, मोदी समर्थक तबका एक दिन के कर्फ्यू को लेकर किसी राष्ट्रीय दिवस की तरह उत्साहित नज़र आया और ट्विटर-फेसबुक से आगे बढ़कर व्हाट्सएप पर कोरोना वायरस और जनता कर्फ्यू के बारे में तरह-तरह की बातें करता दिखाई दिया.

इनमें शायद ही कोई टिप्पणी ऐसी हो जो कहती हो कि प्रधानमंत्री के इस भाषण को सिरे से खारिज कर देना उतना ही गलत है जितना कि उनकी कही बातों को कोरोना का इलाज मानकर सिर-माथे लगा लेना. भाजपा सरकार की तमाम खामियों और असफलताओं के बावजूद इसमें कोई दोराय नहीं कि नरेंद्र मोदी देश के सबसे लोकप्रिय और प्रभावशाली नेता हैं. वे किसी भी छोटी-बड़ी बात को राष्ट्रीय अभियान में बदलने की क्षमता रखते हैं. इसके लिए कई बार उनका सिर्फ एक बार जनता से संवाद करना ही काफी है, फिर चाहे वह पूरी तरह से एकतरफा या थोड़ा सा अतार्किक ही क्यों न हो. अब तक उन्होंने जिन भी मुद्दों पर देश को संबोधित किया है, उन्हें अच्छा-खासा समर्थन मिला है. अब जब वे कोरोना वायरस जैसे महासंकट से निपटने के लिए अपनी इस ताकत का इस्तेमाल कर रहे हैं तो इसे गलत कहना सही क्यों होना चाहिए!

सोशल मीडिया और व्हाट्सएप पर कोरोना वायरस पर चलने वाली तमाम कॉन्सपिरेसी थ्योरीज में यह बात भी चल रही थी कि कोरोना कोई महामारी नहीं बल्कि चीन द्वारा व्यापारिक फायदे के लिए उड़ाई गई एक अफवाह भर है. इस तरह की बातें मानने वाले लोग आगे चलकर वायरस के फैलाव का कारण बन सकते हैं. दिलचस्प है कि नरेंद्र मोदी के संबोधन के बाद इस तरह की बातों में कमी आई है और तमाम लोगों के रुख में बदलाव देखने को मिल रहा है. आम तौर पर यह तर्क सोशल मीडिया पर मजाक की वजह बनता है कि ‘मोदी जी ने कहा है तो कुछ सोचकर ही कहा होगा’ लेकिन फिलहाल उनके चलते कोरोना वायरस को गंभीरता से लिए जाने की संभावना बढ़ती दिखाई दे रही है.

यानी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संबोधन गैर ज़रूरी नहीं था. लेकिन सवाल यह है कि क्या वह उतने ही काम का भी था? उदाहरण के लिए प्रधानमंत्री ने सोशल डिस्टेंसिंग को जनता कर्फ्यू नाम देते हुए इस इतवार को दिन भर घर पर रहने की बात कही है. लेकिन क्या सिर्फ एक दिन इसके लिए काफी होगा? इसी तरह, उन्होंने रविवार को शाम पांच बजे ताली, थाली और घंटी बजाकर डॉक्टर्स, मेडिकल स्टाफ समेत उन तमाम लोगों को धन्यवाद देने की बात भी कही जो इस समय अपनी जान खतरे में डालकर काम कर रहे हैं. क्या इसकी बजाय यह कहना ज्यादा तर्कसंगत नहीं होता कि जब ऐसे लोग मिलें तो उनके साथ सही बर्ताव करना और उन्हें धन्यवाद देना ना भूलें. रोज हमारे घर से कचरा उठाने वाले को इज्जत देना और उसे सामने से धन्यवाद कहना ज्यादा उचित होगा या फिर जब वह न हो तब थाली पीटना और जब वह हो तो उसे हिकारत से देखना!

इसी तरह प्रधानमंत्री मोदी ने लोगों से इस बात की अपील भी की कि जो लोग कोरोना के प्रकोप के चलते काम पर नहीं पहुंच पा रहे हैं, उनके वेतन न काटे जाएं. लेकिन इससे होने वाले आर्थिक नुकसान की भरपाई में किसी सरकारी मदद का वैसा आश्वासन उन्होंने नहीं दिया जैसा कनाडा के राष्ट्रपति जस्टिन ट्रूडो ने अपने संबोधन में दिया था. वे वित्त मंत्री के नेतृत्व में बनाई गई कोविड-19 इकॉनॉमिक रिस्पॉन्स टास्क फोर्स का जिक्र तो करते हैं लेकिन उससे न तो कोई फौरी राहत मिलने की बात कहते हैं और न ही इस बात का ठीक-ठीक अंदाजा देते हैं कि भविष्य में यह फोर्स क्या करेगी.

इसके अलावा, कम जरूरी मेडिकल सेवाएं न लेने का आग्रह भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने संबोधन में करते हैं. यह काम बेहद आसानी से किया जा सकता है और किया जाना चाहिए. लेकिन अपने भाषण में वे कहीं पर भी निम्नतम आर्थिक स्तर वाले लोगों के लिए कुछ करने की बात नहीं कहते हैं. भारत में झुग्गियों में रहने वाला एक बड़ा तबका ऐसा है जिस तक इस तरह की बीमारी की ठीक-ठीक खबर भी बमुश्किल ही पहुंच पाती है, सावधानी या इलाज तो दूर की बात है. ऐसे लोगों को कोविड-19 से कैसे बचाया जाएगा, इस पर प्रधानमंत्री कोई ठोस बात नहीं कहते हैं. बल्कि इस तबके की आर्थिक देखभाल की जिम्मेदारी वे बाकी नागरिकों पर ही डाल देते हैं. इन बातों को देखते हुए कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री का कोरोना वायरस से सावधानी की बात करना ठीक है, हमारा उनकी बात मानना भी ठीक है, लेकिन सिर्फ इसी से खुद को सुरक्षित मान लेना ठीक नहीं है.

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