हिंसा के विरुद्ध एक विश्व अभियान

इसमें अब कोई सन्देह नहीं है कि भारत अब एक भयावह रूप से हिंसक समाज होता जा रहा है. यह हिंसा हर दिन, बल्कि लगता है कि हर पल, नये-नये रूप धर रही है और करोड़ों लोग उसकी चपेट में आ रहे हैं. अभी कुछ दशकों पहले तक हम भारतीय यह व्यापक रूप से मानते थे कि जो कुछ सारे विश्व में हो रहा है वह भारत में वांछनीय नहीं है. हममें उसका प्रतिरोध बनने की इच्छा और साहस दोनों थे. इस भारतीय इच्छा और साहस का नाम था महात्मा गांधी.

याद करें कि जिस युग में विश्व युद्ध के दौरान और अन्यथा भी नाज़ी और सोवियत नरसंहार हिंसा के अत्यंत क्रूर और व्यापक रूप की तरह उभरे और फैल रहे थे, उस समय गांधीजी ने अहिंसा का रास्ता अपनाया था. इसे भारत और अन्यत्र भी एक लगभग हास्यास्पद उपाय बता कर उसकी खिल्ली उड़ायी गयी थी. पर उसी अहिंसक प्रतिरोध ने एक क्रूर-हिंसक औपनिवेशिक सत्ता को भारत छोड़ने पर विवश कर दिया था.

विडम्बना यह है कि आज के पढ़े-लिखे भारत को यह मुश्किल से याद आता है कि हमने अपनी स्वतंत्रता मुख्यतः अहिंसक सविनय अवज्ञा, सिविल नाफ़रमानी और असहयोग आन्दोलन के ज़रिये हासिल की थी. उस समय बंटवारे के कारण नरसंहार और विस्थापन हुए पर हमने एक बहुलतावादी लोकतंत्र स्थापित किया जिसने हमें कई अभूतपूर्व नागरिक स्वतंत्रताएं दीं. हम उन्हीं स्वतंत्रताओं का उपयोग और उपभोग कर अब तक अपने लोकतंत्र को बचाये हुए हैं.

लेकिन अब यह लोकतंत्र संकट में है क्योंकि हिंसा को नयी सार्वजनिक भाषा के रूप में मान्यता मिल गयी है. यह हिंसा सिर्फ़ भौतिक हिंसा भर नहीं है. हालांकि वह भी विकराल हो रही है. जातीय हिंसा, साम्प्रदायिक हिंसा, स्त्रियों-दलितों-आदिवासियों पर हिंसा, प्रशासन और पुलिस की हिंसा, मीडिया पर लगातार बढ़ती भाषिक-वैचारिक हिंसा आदि अनेक प्रकार के इसके संस्करण आज हमारे बीच हैं.

इस समय सारे विश्व में जितनी हिंसा है उतनी शायद पहले कभी नहीं रही. इस वक्त हिंसा को अपना प्रमुख माध्यम बनाने वाली राजनैतिक, धार्मिक, व्यावसायिक सत्ताएं पूरी दुनिया में फल-फूल-फैल रही हैं. लाखों लोग रोज़ मारे जाते हैं लाखों बेघरबार होते हैं, लाखों का बचपन उनसे छिन रहा है, लाखों बलात्कार, हत्या, प्रहार, भुखमरी के शिकार होते हैं. अब समय आ गया है कि हिंसा के विरुद्ध और अहिंसा के पक्ष में एक विश्व अभियान शुरू किया जाये. संसार को हिंसा-मुक्त पूरी तरह से शायद कभी नहीं किया जा सकेगा. लेकिन हिंसा को कम से कम करने की कोशिश हर स्तर पर की जा सकती है. यह कोशिश एक लम्बा संघर्ष होगी और उसे विपथगामी करने की कई सुनियोजित कोशिशें भी होंगी. पर आम लोग दुनिया भर में अमन-चैन से अपनी ज़िन्दगी बसर करना चाहते हैं इस सचाई से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता. हिंसा सब कुछ नष्ट कर सकती है, अहिंसा बहुत कुछ बचा सकती है.

जादुई क्षण

... लौट मेरे अपने सपूत लौट

मैं बुला रही हूं तेरी शीतल नदी

लौट मेरे लाल लौट

मां का दूध तुझको बुलाता है

लौट मेरे लाल लौट

मैं बुला रही हूं टिमटिमाती हुई तेरी लौ

लौट मेरे बच्चे क्योंकि

मैं चुभती हुई चीज़ों की दुनिया में अन्धी हो गयी हूं

आंखें धंसी जाती हैं पियराये कुम्हलाये गड़हों में

सिकुड़ी जाती हैं कनपटियां, जांघें, पपड़ियाई पिंडलियां,

चारों दिशाओं से वस्तुएं उधियाये मेढ़ों सी मुझ पर झपटती हैं

चौखटे, खंभे, और कुरसियां सींग मारने को हैं

दरवाज़े आगे भिड़ जाते हैं झूमते शराबी से

बिगड़ैल बिजली की धार मार करती है

चमड़ी उकिलती है खुनियाई जाती है

चिड़िया की चोंच ज्यों चटखी हो पत्थर से

धातु की मकड़ियों की तरह कैंचियां सरककर पकड़ से परे चली जाती हैं

माचिस की तीलियां बन जाती हैं गौरैया के पंजे

बालटी दस्ते पर झूलकर मुंह पर चढ़ आती है

लौट मेरे लाल लौट ....

तीस बरस से अधिक पहले की बात है. भारत भवन के विश्व कविता समारोह में हंगारी के मूर्धन्य कवि फ्रेंरेंस यूहाश आये थे. बावजूद इसके कि उनकी मां का थोड़े दिन पहले ही देहावसान हुआ था जिनके बारे में उन्होंने कहा कि वे एक धोबिन थीं. उनकी महान् कविता ‘जो लड़का बन गया हिरन रहस्यद्वार पर रोता है’ का अंग्रेज़ी से अनुवाद किया था रघुवीर सहाय ने जोकि मेरी दृष्टि में हिन्दी में किये गये श्रेष्ठ अनुवादों में से एक हैं. हंगारी कवि ने यह कविता मूल में बाद में पढ़ी और रघुवीर जी ने उसका अद्भुत पाठ पहले किया. पाठ में हिन्दी की भाषा-शक्ति, उसकी लय और अन्तर्ध्वनि अपने पूरे वैभव में, सूक्ष्मता पर सम्प्रेषणीयता में चरितार्थ हुई. यह उस समारोह का एक जादुई क्षण था: दो बड़े कवि एक साथ. रघुवीर जी उस समारोह में एक कवि के रूप में भी आमंत्रित थे. पर एक अनुवादक के रूप में उन्होंने जो किया अनुवाद में और पाठ में वह अद्भुत था. श्रोताओं में कई थे जो हिन्दीभाषी नहीं थे पर उन पर भी उनके पाठ का गहरा मार्मिक प्रभाव पड़ा.

इस पाठ को सुनने वालों में चैक कवि मिरास्लाव होलुब, चिली के कवि निकानोर पार्रा और निकारागुआ के अर्नेस्तो कार्दिनाल थे. कार्दिनाल की कविता ‘मरलिन मनरो के लिए प्रार्थना’ हिन्दी अनुवाद में सोम दत्त ने सुनायी थी. उसका समापन इन पंक्तियों से हुआ था:

फ़िल्म अंतिम चुम्बन के बिना ख़त्म हो गयी

उन्हें मिली वह मरी, फ़ोन हाथ में लिये,

जासूस पता नहीं लगा सके कभी उसका जिसे करना चाहती थी फ़ोन वो

कुछ ऐसा हुआ

जैसे किसी ने नंबर मिलाया हो अपने एकमात्र दोस्त का

और वहां से - टेप की हुई आवाज़ आयी हो- ‘रांग नम्बर’,

या जैसे गुंडों से घायल, कोई पहुंचे, काट दिये गये फ़ोन तक,

परमेश्वर, चाहे जो कोई हो

जिससे वह करना चाहती थी बात

लेकिन नहीं की. शायद वह कोई नहीं था

या जिसका नाम था लास एंजलस डायरेक्टरी में.

परमेश्वर, तुम उठा लो वह टेलीफ़ोन

मिरोस्लाव होलुब की कविताओं का हिन्दी अनुवाद प्रयाग शुक्ल ने किया था. उनकी कुछ पंक्तियां:

इस तरह देखें तो

मुकम्मल फेंस

वह है

जो अलगाती है कुछ नहीं को कुछ नहीं से

ऐसी एक जगह को, जहां कुछ नहीं है

को ऐसी एक जगह से जहां पर भी नहीं है कुछ

वही है सचमुच की फेंस, एक कवि के शब्द की तरह.

निकानोर पार्रा का मदन सोनी के हिन्दी अनुवाद में एक अंश:

हम क्रैप को काट दें

जबकि आप खड़े हैं नितान्त खुली हुई कब्र में

यह समय है कि साफ़-साफ़ कहा जाय:

आप अपने दुखों को डुबा सकते हैं जागृति में

हम अटके हुए हैं इस नर्क की तलहट में

चारों विदेशी कवि, रघुवीर सहाय और सौम दत्त अब हमारे बीच नहीं हैं.