2018 में जब मध्य प्रदेश विधानसभा के चुनाव हो रहे थे, उस वक्त भारतीय जनता पार्टी के कुछ नेताओं में यह बात चल रही थी कि प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से उस तरह का सहयोग नहीं मिल रहा है जिस तरह का मिलना चाहिए था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी उस तरह से मध्य प्रदेश में चुनाव प्रचार नहीं कर रहे थे जैसा उन्होंने 2017 में गुजरात के चुनावों में किया था. इसके बावजूद जो नतीजे आए उसमें कांग्रेस और भाजपा में बहुत दूरी नहीं रही. माना गया कि यह शिवराज सिंह चौहान की ताकत ही थी कि इतने समय से सत्ता में रहने के बावजूद भी उनके नेतृत्व में भाजपा कांग्रेस से बहुत नहीं पिछड़ी थी. इसके बावजूद सबसे पहले शिवराज सिंह की ओर से ही यह बयान आया कि हम सरकार नहीं बनाएंगे और विपक्ष में बैठेंगे.

उसके बाद से हाल तक का समय शिवराज सिंह चौहान के लिए राजनीतिक तौर पर आसान नहीं रहा है. मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद भी वे लगातार जमीनी स्तर पर और सोशल मीडिया पर सक्रिय रहे. उन्होंने अपनी एक ऐसे नेता की छवि गढ़ने की कोशिश की जो जनता से सीधे तौर पर जुड़ा रहता है. इस दौरान वे कभी भी मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार को अस्थिर करने की कोशिश करते नहीं दिखे.

बाहर-बाहर से शिवराज सिंह चौहान चाहे खुद को जितना भी सक्रिय दिखा रहे थे लेकिन पार्टी के नेता बताते हैं कि उस समय वे मध्य प्रदेश की राजनीति में शीर्ष पर बने रहने का संघर्ष कर रहे थे. इसी दौरान भाजपा के एक वरिष्ठ नेता का अनौपचारिक बातचीत में कहना था, ‘अभी भाजपा के शीर्ष पर जो नेता हैं, उनमें और शिवराज सिंह चौहान में संगठन के स्तर पर एक तरह की आंतरिक प्रतिस्पर्धा रही है. जब प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के तौर पर नरेंद्र मोदी के नाम की चर्चा शुरू हुई थी, उस वक्त भी कुछ लोग थे जोे शिवराज सिंह चौहान का नाम अधिक स्वीकार्य चेहरे के तौर पर आगे बढ़ा रहे थे. कहना गलत नहीं होगा कि शिवराज मोदी-शाह युग से पहले के भाजपा क्षत्रप हैं. इसलिए अभी का शीर्ष नेतृत्व मध्य प्रदेश में उनकी जगह नया नेतृत्व विकसित करना चाहता है.’

इस क्रम में शिवराज सिंह चौहान के विकल्प के तौर पर भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय को खड़ा करने की कोशिश की गई. उन्हें पार्टी के ताकतवर अध्यक्ष रहे और मौजूदा गृह मंत्री अमित शाह का विश्वस्त और करीबी बताया जाता है. पश्चिम बंगाल के प्रभारी के तौर पर कैलाश विजयवर्गीय अक्सर विवादास्पद बयान देकर चर्चा में बने रहते थे. लेकिन उनके बेटे आकाश विजयवर्गीय के एक विवाद में उलझने और खुद अक्सर विवादों में रहने की वजह से उनकी स्थिति थोड़ी कमजोर हुई है. लेकिन फिर भी उनका नाम हाल तक शिवराज सिंह चौहान के विकल्प के तौर पर लिया जा रहा था.

मध्य प्रदेश के हालिया राजनीतिक घटनाक्रम में जब ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपने समर्थक विधायकों के साथ कांग्रेस से इस्तीफा दिया तो यह लगने लगा कि प्रदेश में भाजपा सरकार बनने का रास्ता साफ हो गया है. इस बीच प्रदेश में सबसे आगे बढ़कर भले ही शिवराज सिंह चौहान नेतृत्व करते दिख रहे थे लेकिन आखिरी दिन तक यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा था कि वहां बनने वाली भाजपा सरकार की कमान किसे दी जाएगी.

इस बारे में भाजपा के एक राष्ट्रीय पदाधिकारी बताते हैं, ‘कुछ लोग कैलाश विजयवर्गीय का नाम चला रहे थे लेकिन इस बार वे प्रमुख दावेदार नहीं थे. सबसे मजबूत दावेदार केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर थे. उनके अलावा नरोत्तम मिश्र और मध्य प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष वीडी शर्मा का नाम भी था. पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को लग रहा था कि मध्य प्रदेश में अब नया नेतृत्व खड़ा करना चाहिए. लेकिन अंततः बाजी शिवराज सिंह चौहान के ही हाथ लगी.’

भाजपा के एक अन्य सूत्र बताते हैं, ‘पार्टी के एक बहुत बड़े नेता के कहने पर केंद्रीय मंत्री और मध्य प्रदेश के राजनीतिक घटनाक्रम में खासे सक्रिय दिख रहे धर्मेंद्र प्रधान इस संभावना को तलाश रहे थे कि क्या नरेंद्र सिंह तोमर को वहां का मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है. मध्य प्रदेश में सरकार बनाने को लेकर जो बैठकें हो रही थीं, उनमें से अधिकांश तोमर के आवास पर ही हो रही थीं. तोमर को मुख्यमंत्री बनाने की कोशिशों की भनक पार्टी के कुछ नेताओं को लगी. इससे यह बात मीडिया में भी गई और जिस दिन शिवराज सिंह चौहान ने शपथ ली, उसके ठीक एक दिन पहले कई जगह यह खबर भी आई कि तोमर मुख्यमंत्री बनाए जा रहे हैं.’

वे आगे बताते हैं, ‘लेकिन नरेंद्र सिंह तोमर ने पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को यह संकेत दे दिया कि वे मुख्यमंत्री बनने के इच्छुक नहीं हैं. जब उनका नाम मीडिया में चलने लगा तो उन्होंने यह बयान दिया कि वे इस दौड़ में नहीं हैं. दरअसल, नरेंद्र सिंह तोमर और शिवराज सिंह चौहान में बहुत पुराना और प्रगाढ़ संबंध है. वैसे तो राजनीति में कुछ भी संभव है लेकिन दोनों के संबंधों को देखते हुए कहा जा सकता है कि शिवराज सिंह की कीमत पर नरेंद्र सिंह तोमर अपने लिए कुछ नहीं चाहते हैं.’

आंतरिक स्तर पर शिवराज सिंह चौहान का रास्ता रोकने की कोशिश यहीं नहीं खत्म हुई. इस दौड़ से नरेंद्र सिंह तोमर के हटने के बाद नरोत्तम मिश्र और वीडी शर्मा को आगे करने की कोशिश की गई. विधायकों की जो बैठक हुई, उसके जरिए इनमें से किसी एक के नाम पर सहमति बनाने की योजना बनी.

यहीं पर शिवराज सिंह चौहान भाजपा के शीर्ष नेतृत्व पर भारी पड़ गए. विधायकों के बीच बात जाने के मतलब था कि अब यह खेल दिल्ली के शीर्ष नेताओं के हाथों से निकलकर मध्य प्रदेश के विधायकों के बीच था. यहां शिवराज सिंह बेहद मजबूत हैं. यह बात बैठक में साबित हो गई. इस बैठक की जानकारी रखने वाले भाजपा के एक नेता बताते हैं, ‘विधायकों से जब पूछा गया कि वे मुख्यमंत्री के तौर पर किसे चाहते हैं तो सबने एक स्वर में शिवराज सिंह चौहान का नाम लिया.’

इसके बाद पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को लग गया कि अभी शिवराज सिंह चौहान को हटाकर किसी और को आगे करने से राजनीतिक संकट पैदा हो सकता है. ऐसा इसलिए भी लगा क्योंकि कांग्रेस विधायकों के इस्तीफे के बाद छह महीने के अंदर मध्य प्रदेश में तकरीबन दो दर्जन सीटों पर उपचुनाव होने हैं. ऐसे में अगर किसी कम अनुभवी नेता को मुख्यमंत्री पद पर बैठा दिया जाए और शिवराज सिंह चौहान नाराज हो जाएं तो छह महीने में फिर से बाजी पलट सकती है.

पिछले छह साल में मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान को नेतृत्व की भूमिका से हटाने की यह दूसरी कोशिश थी. पहली संगठित कोशिश उस वक्त हुई थी जब मध्य प्रदेश में व्यापम कांड सामने आया था. लेकिन उस वक्त भी शिवराज सिंह चौहान मजबूती से टिके रह गए थे और इस बार भी उन्हें कोई हिला नहीं पाया.