मंगलवार को दिए राष्ट्र के नाम संदेश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर कोरोना महामारी पर बात की है. करीब आधे घंटे के इस भाषण में प्रधानमंत्री ने बड़ी स्पष्टता से जनता को बताया कि कोरोना वायरस कितनी भयावह तेजी से फैलता है. सोशल डिस्टेंसिंग यानी आपस में ना मिलने-जुलने को इससे बचने का एकमात्र रास्ता बताते हुए, उन्होंने बार-बार कहा कि किसी भी आम आदमी से लेकर प्रधानमंत्री तक के लिए इसे अपनाना ज़रूरी है. इसके साथ ही उन्होंने 21 दिन के लॉकडाउन की घोषणा भी कर दी. इसके तुरंत बाद, देश भर में लोग राशन और डेयरी की दुकानों के आगे लाइनें लगाते हुए दिखाई दिए. नतीजतन, प्रधानमंत्री को ट्वीट कर यह कहना पड़ा कि देश में आवश्यक चीजों जैसे दूध, राशन और दवाओं की उपलब्धता बनी रहेगी.

यह काम अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने संबोधन के जरिये और लॉकडाउन की घोषणा से पहले करते तो शायद इतनी अफरा-तफरी न मचती. इससे महामारी को फैलने से रोकने के लिए लोगों को एक-दूसरे से दूर रखने का उद्देश्य भी असफल होते दिखा. अगर साफ-साफ कहें तो सौ बात की एक बात यह है कि अगर सरकार लोगों को सिर्फ जरूरी चीजें मुहैया कराने का भरोसा दे सकती है तो कोई वजह नहीं कि इस समय चल रहा लॉकडाउन सफल न हो. लेकिन अगर ऐसा नहीं होता है तो लोगों में घबराहट फैलना और उसके जरिये कोरोना का और फैलना तय है. नीचे उन पांच बातों का जिक्र किया गया है जिनका जिक्र प्रधानमंत्री के भाषण में हो सकता था. या मोदी सरकार अब कर सकती है.

1. दूध, सब्जी और अनाज की उपलब्धता का आश्वासन

अच्छा होता अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने भाषण में बेहद मजबूती और विश्वसनीयता के साथ यह बताते कि देश भर में दूध, सब्जी, राशन और दवाई की दुकानें खुली रहेंगी. वे इससे एक और कदम आगे जाकर कह सकते थे कि बंद के दौरान कुछ बेसिक सामान यानी आटा, दाल, चावल, दूध, नमक-शक्कर और कुछ सब्जियां हमेशा उपलब्ध रहेगें. इस आधार पर वे लोगों को पैनिग बाइंग करने यानी बहुत सारा सामान खरीद लेने से बचने की सलाह दे सकते थे. लेकिन 21 दिन के बंद की घोषणा के साथ जब लोगों को यह आश्वासन उतनी स्पष्टता से नहीं मिला तो उनका घबरा जाना स्वाभाविक था.

लेकिन तब न सही तो अब इन बेहद ज़रूरी चीजों के अलावा मोदी सरकार को इस बात का भी आश्वासन देना चाहिए कि लोगों को किसी भी हाल में बिजली, पानी, फोन और इंटरनेट सेवाओं की समस्या नहीं होगी. इंटरनेट इसलिए कि घरों में बंद लोग ऑनलाइन संपर्क और मनोरंजन के सहारे ही अपना वक्त काट रहे हैं. इसके अलावा अपनी जरूरत की चीजें ऑनलाइन खरीदने के लिए भी इंटरनेट चलते रहना जरूरी है.

2. फूड हेल्पलाइन नंबर जारी करना

ऐसे लोग जिन्हें खाने-पीने की आवश्यक वस्तुएं मिलने में परेशानी हो रही है, उनके लिए सरकार एक हेल्पलाइन नंबर जारी कर सकती है. अभी तक जो भी हेल्पलाइन हैं वे कोरोना के संक्रमण से ही संबंधित हैं. फिलहाल ऐसी कोई हेल्पलाइन नहीं है जहां लोग खाने-पीने या दूसरी जरूरी वस्तुओं की अनुपलब्धता की शिकायत कर सकते हों. यह हेल्पलाइन ऐसे लोगों की समस्याओं के हल के लिए भी हो सकती है जो लोगों तक जरूरी वस्तुएं पहुंचाने का काम करते हैं. आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति सुचारू रखना इसलिए भी जरूरी है कि इसके बिना पहले से ही रसातल में पहुंच चुकी अर्थव्यवस्था का उससे भी नीचे चले जाना तय है. अगर दूध-सब्जी आदि चीजें होने पर भी उन्हें बेचा नहीं जा सकेगा तो इससे किसानों सहित असंख्य लोगों की आर्थिक स्थिति बिगड़ना तय है. इसका असर अंतत: पूरी अर्थव्यवस्था को झेलना पड़ेगा.

3. ऑनलाइन रिटेलर्स का इस्तेमाल

लॉकडाउन के लिए जारी गाइडलाइन्स में सरकार ने राज्य सरकारों और जिला प्रशासन को जरूरी सामान की उपलब्धता के साथ-साथ इनकी होम-डिलीवरी मुहैया करवाने के निर्देश भी दिए हैं. इस पर कितना अमल हो रहा है, इसकी निगरानी भी सरकार को करनी चाहिए. पिछले रविवार से ही एमेजॉन, फ्लिपकार्ट, बिग-बास्केट, मिल्क बास्केट और ग्रोफर्स जैसे तमाम ऑनलाइन रिटेलर्स ठीक से अपनी सेवाएं नहीं दे रहे हैं. इनमें से कई का कहना है कि ऐसा करने में उनके सामने तरह-तरह की मुश्किलें आ रही हैं. इनमें से सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि लोगों तक जरूरी चीज पहुंचाने में इन्हें कई जगहों पर प्रशासन से सहयोग मिलना तो दूर उसकी बेरुखी का सामना करना पड़ रहा है.

उदाहरण के तौर पर नीचे लिखे बिग बास्केट और मिल्क बास्केट के संदेश हैं. इनमें साफ लिखा है कि प्रशासन की तरफ से खड़ी की जा रही दिक्कतों की वजह से वे अपनी सेवाएं बंद कर रहे हैं. अलसुबह दूध, ब्रेड और ग्रोसरी की होम डिलीवरी करने वाली कंपनी मिल्क बास्केट के संस्थापक ने तो यह तक कहा है कि इसके चलते उन्हें 15000 लीटर दूध और 10000 किग्रा सब्जी को फेंक देना पड़ा है. अगर सरकार थोड़ी समझदारी से काम ले तो वह इन कंपनियों के रास्तों की अड़चनें हटाकर लाखों लोगों की समस्याएं आसान कर सकती है. उसे इन कंपनियों से सबसे जरूरी सामान की आपूर्ति करने के लिए कहना होगा और ऐसा करने में उन्हें अपना पूरा सहयोग भी देना होगा. ऐसा करके सरकार इस मुश्किल समय में ज़रूरी संसाधनों की बरबादी रोकने के साथ-साथ फूड सप्लाई के लिए एक नई व्यवस्था खड़ी करने में लगने वाला समय और खर्च दोनों बचा सकती है.

बिग बास्केट के मुताबिक स्थानीय प्रशासनों द्वारा खड़ी की गईं बाधाओं के चलते वह अपनी सेवा नहीं दे पा रही है
ग्राहकों को मिल्क बास्केट के संस्थापक अनंत गोयल का यह संदेश कि 'अथॉरिटीज' द्वारा उनके कर्मचारियों को परेशान करने के चलते वे जरूरी सामान की डिलीवरी नहीं कर पा रहे हैं

4. सफर या होटलों में फंसे लोगों को निकालना

वे लोग जो यात्रा पर थे या फिर निचले आर्थिक तबके के वे लोग जो शहरों से अपने घरों को लौट रहे थे, अचानक लॉकडाउन घोषित होने के चलते जहां के तहां फंस गए हैं. ऐसे लोगों को उनके घर भेजने या उन्हें किसी सुरक्षित स्थान पर रखने का इंतजाम भी किया जाना चाहिए. ऐसा न करना मानवीय तौर पर भी सही नहीं है और ऐसा न होने पर ये लोग मुश्किल हालात में कोरोना के खिलाफ हमारी जंग को भी कमजोर कर सकते हैं. वैसे होना तो यह चाहिए था कि लॉकडाउन होने पर रेल-बस सेवाएं बंद होने से कुछ दिन पहले ही आने वाली स्थिति का अंदाजा लगाकर सभी को इस बारे में बता दिया जाता. लेकिन दो महीने से मुंह बाये खड़ी आपदा पर चुटकियों में लिया गया लॉकडाउन का फैसला लाखों लोगों के लिए एक नयी तरह की आपदा बन गया है.

5. आपातकाल में ऊबर-ओला सेवाओं का इस्तेमाल

कोरोना वायरस के चलते सार्वजनिक वाहनों के अलावा ऊबर-ओला जैसी सेवाएं भी बंद कर दी गई हैं. इस वजह से जरूरत होने पर भी केवल वही लोग घर से बाहर निकल पा रहे हैं जिनके पास अपने वाहन हैं. ऐसे में हर तरह की मेडिकल ज़रूरतों के लिए कुछ लोग सिर्फ एम्बुलेंस पर ही निर्भर हो गये हैं. इससे बचने के लिए सरकार ओला-ऊबर जैसी सेवाओं से बात करके उन्हें विशेष परिस्थितियों में इमरजेंसी सुविधा की तरह इस्तेमाल करने की अनुमति दे सकती हैं. इन सेवाओं को कुछ ऐसी सेवाओं से जुड़े लोग भी इस्तेमाल कर सकते हैं जो इस समय सबसे जरूरी कामों में जुटी हुई हैं.