कोरोना वायरस के बढ़ते खतरे के मद्देनजर पंजाब में अमरिंदर सिंह सरकार ने कर्फ्यू लगाया हुआ है. लोग-बाग अपने घरों में कैद हैं और जो बाहर निकल रहे हैं, उनकी अपनी-अपनी मजबूरियां हैं. कर्फ्यू के बीच बाहर निकलने वाले जायज लोगों को भी पुलिस की थुक्का-फजीहत बर्दाश्त करनी पड़ रही है. इस महामारी के दौर में भी यह बखूबी साबित हो रहा है कि ‘पुलिस (खासकर भारतीय) ‘पुलिस’ ही है और कर्फ्यू आखिरकार ‘कर्फ्यू’ ही है!’ सरकारी दावों के विपरीत लोगों को आवश्यक चीजों से महरूम होने की मजबूरी झेलनी पड़ रही है. केंद्र और राज्य सरकारों को दिहाड़ीदारों और असंगठित कामगारों की सचमुच कोई परवाह होगी, जमीनी स्तर पर पंजाब में यह भी नजर नहीं आ रहा. फौरी हालात ये हैं कि पंजाब में सख्त कर्फ्यू की सार्थकता पूरी तरह दांव पर है.

सरकारी घोषणा थी कि कर्फ्यू के बाद लोग कतई घरों से बाहर ना निकलें. उन्हें आवश्यक चीजों की कमी नहीं आने दी जाएगी. हेल्पलाइन नंबर जारी कर दिए गए थे. लेकिन हो क्या रहा है? कालाबाजारी जोरों पर है. जो सब्जी या फल पहले 50 रुपए किलो था वह अब 100 से 150 रुपए किलो तक है. आटे की थैलियां दुगने दामों में बेची जा रही हैं. यही हाल बिस्किट, ब्रेड, रस्क सहित बेकरी के अन्य सामानों का है. दवाइयों के दाम भी एकाएक बढ़ गए हैं. और जब लोग मजबूरी में घर से बाहर निकल रहे हैं तो पुलिस सड़कों पर मरीजों तक को पीट रही है. आपदा की इस घड़ी में अमानवीयता और क्रूरता के इस तंत्र पर कोई ‘कर्फ्यू’ नहीं.

एक बात शीशे की मानिंद साफ है, केंद्र और राज्य, दोनों की सरकारें चंद दिन पहले तक लापरवाही की नींद सोई रहीं. करीब 90 हजार एनआरआई मार्च में पंजाब आए जिनमें से कुछ में इस महामारी के लक्षण भी थे. सरकारें पहले अतिरिक्त सतर्कता बरततीं तो शायद आज पंजाब इस तरह त्राहि-त्राहि नहीं कर रहा होता. पानी जब सिर से गुजरा तो देश भर में जनता कर्फ्यू, लॉकडाउन और पंजाब में अनिश्चितकालीन ‘सख्त’ कर्फ्यू की घोषणा कर दी गई. अब आलम क्या है, घरों में बंद तमाम लोग सूचनाएं/खबरें सोशल मीडिया, टीवी चैनलों के जरिए हासिल कर ही रहे हैं.

खैर, अब सवाल उन लोगों का है जो रोज होने वाली कमाई के जरिए दो जून की रोटी का इंतजाम किया करते थे. क्या कर्फ्यू लागू करना जीवन से आगे की चीज़ है, यह फगवाड़ा के एक ऐसे किसान परिवार से जानिए, जिसके दो सदस्यों ने सल्फास को हथियार बनाकर अपनी जान दे दी. जो शेष हैं जीना चाहते हैं, लेकिन धीरे-धीरे निराश हो रहे हैं. इस परिवार की महिलाएं तक खेतों में मजदूरी करती थीं और कर्फ्यू तथा लॉकडाउन ने श्रम-जीवन के इस सिलसिले को बेमियादी वक्त के लिए मुल्तवी कर दिया है.

इस परिवार की हिंदी में पढ़ने वालों के लिए अम्मा (पंजाबियों के लिए बीजी) 81 साल की निहाल कौर यह कहते हुए रोने लगतीं हैं कि, “पुत्तरा ऐसा वक्त कभी नहीं देखा. हमारे घर के दो बच्चे चले गए कर्ज के कारण. हमने हिम्मत नहीं हारी. लेकिन अब? एक खतरा कोरोना वायरस का और दूसरा भुखमरी का. घर में एक पैसा नहीं और उधार देने को कोई तैयार नहीं. किसी को यकीन ही नहीं कि यह सिलसिला कब खत्म होगा और होगा भी तो हालात सामान्य कब होंगे. तमाम लोग नगद लेकर सामान दे-ले रहे हैं. हम कहां जाएं?”

जालंधर शहर के ऐन बीचों-बीच एक गांव है रेड़ू. जालंधर-पठानकोट हाइवे पर. वहां किराए के एक कमरे के मकान में रहने वाला बक्शीश सिंह का परिवार बीते दो दिन से ढंग से खा नहीं पा रहा. लगभग पूरा परिवार भूखा है. राज्य सरकार कहती है कि 10 लाख ऐसे लोगों तक खाने के पैकेट पहुंचाए गए हैं लेकिन अब तक बक्शीश सिंह के परिवार तक तो नहीं पहुंचा. बक्शीश सिंह की उम्र जानिए, लगभग 65 साल. रुआंसे होकर कहते हैं, “तीन बार खाने की तलाश में और गुहार लगाने के लिए बाहर शहर (पठानकोट बाईपास) चौक तक गया लेकिन पुलिस ने खदेड़ दिया. गांव वाले कब तक खाना खिलाएंगे?”

कुछ धार्मिक संगठनों ने जरूरतमंदों को खाना पहुंचाने की जोर-शोर से घोषणा की है लेकिन जालंधर के ही सोफी पिंड के नीरज कुमार के लिए अभी यह बेमतलब है. इस पत्रकार ने नीरज के सामने ही प्रशासन के कुछ आला अधिकारियों को फोन कर जानना चाहा कि शासनादेश तो यह हैं कि किसी को भूखा नहीं रखा जाएगा लेकिन फौरी हालात यह हैं, तो लगभग सभी का जवाब था, “कि आते-आते ही सब कुछ आएगा!” वैसे, हम पूछ नहीं पाए कि क्या मौत भी? कुछ जगह के हालात यही बता रहे हैं कि कोरोना वायरस से ज्यादा मौतें शायद भुखमरी और अवसाद/तनाव से हो सकती हैं.

पंजाब की किसानी के आगे इस वक्त सबसे ज्यादा दिक्कतें हैं. सूबे में गेहूं की फसल एकदम तैयार और कटने के इंतजार में है. कइयों को नहीं लगता कि इस बार गेहूं की फसल अपने मुफीद मुकाम तक पहुंचेगी. जालंधर जिले के रुपेवाली गांव के एक किसान, मदनलाल जिन्होंने 70 एकड़ जमीन पर गेहूं खड़ी की है, कहते हैं, “दोआबा के किसान परिवारों के ज्यादातर बच्चे विदेशों में हैं और मशीनरी के बावजूद फसल कटाई और बुवाई के लिए हम लोग पूरी तरह उत्तर प्रदेश, बिहार, उड़ीसा और राजस्थान से आने वाले प्रवासी मजदूरों पर निर्भर हैं. लेकिन अब वे नहीं आएंगे क्योंकि आवाजाही के सारे साधन पूरी तरह बंद हैं. पंजाब में कर्फ्यू है तो उनके राज्यों में लॉकडाउन.”

सूबे के बाकी हिस्सों में भी किसान प्रवासी मजदूरों के नहीं आने की पुख्ता आशंका के चलते बेहद परेशान और चिंतित हैं. उनकी समझ से बाहर है कि होगा क्या? हालांकि सरकार और पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (लुधियाना) की ओर से लगातार दावा किया जा रहा है कि किसानों को किसी किस्म की मुश्किल नहीं आने दी जाएगी लेकिन स्पष्ट रूपरेखा सामने कोई नहीं रख रहा.

राज्य में पिछले कुछ दिनों से तेज हवाओं के साथ बारिश हो रही है जो ज्यादातर फसलों पर तेजाब की मानिंद है. यानी बारिश जारी रहती है तो कोरोना वायरस का जंजाल बर्बाद करे ना करे, तूफानी बरसात यकीनन कर देगी. राज्य के जिन खेतों में गेहूं से इतर फसलें लगाईं गईं थीं, वे पककर तैयार हुईं, कट कर हाथों में भी आईं लेकिन कर्फ्यू के चलते बेमौत मारी गईं यानी सड़ गईं. पंजाब की लगभग 18000 हेक्टेयर खेतिहर भूमि में ऐसी फसलें होतीं हैं. फल भी. अब सब कुछ तबाह है. धरती बेशक बंजर नहीं है लेकिन उससे भी बदतर हालात में है.

यह सारा कहर तब दरपेश है जब पंजाब की किसानी पहले से ही कर्ज के जानलेवा मकड़जाल में है. रिकॉर्ड पैमाने पर किसान और स्थानीय खेत मजदूर खुदकुशी के लिए मजबूर हैं. कोरोना वायरस, कर्फ्यू और लॉकडाउन की सुर्खियों के बीच भी खबर मिलती है कि जिला मानसा के बरेटा में 27 वर्षीय एक किसान ने आत्महत्या कर ली. कीटनाशक निगलकर जान देने वाले हरपाल सिंह पर सात लाख रुपए का कर्ज था. इस सवाल का जवाब कौन देगा कि देशव्यापी बल्कि विश्वव्यापी इस संकट के बीच किसने क्रूरता के साथ ऐसे कर्ज मांगा होगा जिसे अदा करने का इतना मारक दबाव होगा? संकट में भी क्या दुनिया वही है जिसमें आत्महत्या रोजमर्रा का एक सच है.

बहरहाल, पंजाब में पुलिस ने कर्फ्यू की अपनी सख्त पाबंदी को निभाते, कर्फ्यू का उल्लंघन करने वालों पर आज भी (इन पंक्तियों को लिखने वाले दिन) 190 लोगों के खिलाफ मुकदमे दर्ज किए और कल का यह आंकड़ा 286 था. इन लोगों में वे भी शामिल हैं जो इलाज या रोटी के लिए घरों से बाहर निकलने के ‘गुनहगार’ हैं.

जाते-जाते कर्फ्यू ग्रस्त पंजाब की एक और तस्वीर: जो अमीर हैं, वे आरामयाफ्ता या जुए और पार्टियों में मसरूफ हैं. बीच के लोग टीवी/नेट से दिल बहला रहे हैं. बच्चों के हिस्से की सुबह और शाम के असली रंग गायब हैं. जिनके अभिभावक समर्थ हैं वे लगातार नेटजाल में फंस रहे हैं. बचा चौथी दुनिया का तबका, तो वह एक नई वजह से उसी पुराने मकड़जाल में है जो लगातार कसता जा रहा है.