1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने तो इसमें कांग्रेस पार्टी से ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने निभाई थी. जैल सिंह तब यमन से लौट रहे थे और हवाई जहाज में ही उन्होंने पत्रकारों को बता दिया था कि वे राजीव गांधी को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाने जा रहे हैं.

लेकिन राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने के साथ ही राष्ट्रपति से उनके रिश्ते बिगड़ने शुरू हो गए. दरअसल दिल्ली और देश के दूसरे हिस्सों में चल रहे सिख विरोधी दंगे रोकने में सरकार के सुस्त रवैये पर जैल सिंह काफी नाराज थे और यह संदेश उन्होंने प्रधानमंत्री तक पहुंचा दिया था. आने वाले दिनों में देश के शीर्ष पद पर बैठे इन दो लोगों के बीच टकराव बढ़ता ही गया.

यह टकराव आगे कई मौकों पर सामने आया. मसलन, आमतौर पर होता यह है कि प्रधानमंत्री जब विदेश यात्रा पर जाते हैं तो उसके पहले और आने के बाद वे औपचारिक रूप से राष्ट्रपति को इसका विवरण देते हैं लेकिन उस समय यह परंपरा भी तोड़ दी गई थी. इधर राष्ट्रपति ने भी सरकार के प्रति यही रुख अपना लिया. उन्होंने अपने गृहराज्य पंजाब में सरकार के आग्रह के बाद भी दखल देने से मना कर दिया. यहां तक कि 1985 में जब राजीव गांधी और अकाली दल के लोंगोवाला के बीच संधि हुई तब भी इसमें जैल सिंह की भूमिका कहीं नहीं थी. इसी समय एसएस बरनाला पंजाब के मुख्यमंत्री बने तो सरकार ने संसद में राष्ट्रपति को भाषण देने के लिए आमंत्रित किया लेकिन जैल सिंह ने यह आमंत्रण ठुकरा दिया.

इन सभी घटनाओं के बीच एक ऐसी घटना भी हुई जिसने प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के बीच तनाव को चरम पर पहुंचा दिया. राजीव गांधी सरकार ने दिसंबर, 1986 में राष्ट्रपति को उनकी मंजूरी के लिए इंडियन पोस्टल एक्ट-1898 (संशोधित) बिल भेजा था. इसमें प्रावधान था कि सरकार आम लोगों के पत्राचार की जब चाहे जांच करवा सकती है. जैल सिंह के मुताबिक यह आम लोगों कि निजता में दखल था इसलिए उन्होंने इस बिल को मंजूरी नहीं दी, साथ ही उन्होंने इसे वापस सरकार के पास पुनर्विचार के लिए भी नहीं भेजा.

इस घटना के बाद राजीव गांधी और जैल सिंह के बीच चल रहा टकराव इतना खुलकर सामने आ गया कि मीडिया में आए दिन ये खबरें चलने लगीं कि राष्ट्रपति राजीव गांधी को प्रधानमंत्री पद से हटाने के बारे में सोच रहे हैं और सरकार जैल सिंह पर महाभियोग चलाने के लिए कानूनी विशेषज्ञों की मदद ले रही है.

हालांकि ये सारे विवाद बहुत समय तक नहीं चल पाए क्योंकि जुलाई, 1987 में जैल सिंह का कार्यकाल समाप्त हो गया फिर भी इस पूरे दौर को प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के बीच टकराव के लिए जा भी याद किया जाता है.