एकान्त में रहने का अभ्यास है पर जब वह बन्दिश के तौर पर होता है तो बेचैनी होना स्वाभाविक है. जब हमें लाचार होकर दूरी बनानी पड़ती है तब हमें अहसास होता है कि दूसरों के बिना, कुछ समय भी कितना असह्य और निरर्थक लगता है. दूसरों से अपने को अलग करना कई बार ज़रूरी होता है और दोनों पक्षों के लिए हितकर भी. पर यह विवश एकान्त हमें यह दुखद सीख देता है कि हम किस क़दर दूसरों पर निर्भर हैं. इसका अर्थ यह भी है कि हमें दोनों चाहिये - सामुदायिकता और एकान्त. पर ऐसी सामुदायिकता नहीं जिसमें एकान्त की जगह या सम्भावना न हो और ऐसा एकान्त नहीं जिसमें सामुदायिकता को बरबस थामा गया हो और जो एकान्त के लिए ख़तरा हो. हमारी अद्वितीयता भी बिना द्वितीयता के सम्भव नहीं है.

इस विवश एकान्त के कुछ लाभ भी हैं. वह परिवार के सभी सदस्यों को एक-दूसरे के नज़दीक लाता है और उन्हें साथ समय बिताने, बतियाने, याद करने का अवकाश देता है. इसका रोज़मर्रा की आपाधापी में अकसर अवकाश नहीं मिलता. यह अवसर भी मिलता है कि आप कई लम्बित-विलम्बित काम निपटा लें. मैंने ही एक प्रश्नावली के आठ पेजी उत्तर लिख डाले. बहुत सारी पुस्तकें अनपढ़ी-अधपढ़ी पड़ी हैं तो उन्हें पढ़ना शुरू किया. व्योमेश शुक्ल और आशुतोष भारद्वाज, दो युवा लेखकों की पहली आलोचना-पुस्तकें पढ़ गया. अब अमरीकी लेखक-बुद्धिजीवी सूसन सोण्टेग की आठ सौ पृष्ठों में फैली जीवनी पढ़ रहा हूं. सेमुएल बैकेट पर एक फ्रेंच पुस्तक का अंग्रेज़ी अनुवाद भी थोड़ा सा पढ़ा. बैकेट की अल्पतमता और फ्रेंच में ही लिखने वाले मोरक्‍कन कवि अब्देललतीफ़ लाबी की विपुलता के बीच फंसा सा हूं.

इतना सब पढ़ना यह सहज विनय जगाता है कि भाषा में कितनी दृष्टियां, शैलियां, अतिकथन-अल्पकथन, रसमयता, लालित्य, विडम्बनाएं-अन्तर्विरोध, गहराइयां और विस्तार, जीवन और मृत्यु, उम्मीद-नाउम्मीदी, साहस-दुस्साहस, सुन्दरता-क्रूरता चरितार्थ हो चुकी हैं कि उनके रहते कुछ लिखने का उपक्रम करना कई बार भयानक धृष्टता और मूर्खता तक लगती है. पर जैसे दूसरों का प्रेम जानकर भी हम अपना प्रेम करने से नहीं चूकते वैसे ही दूसरों के लिखे की सघनता-विपुलता-गुणवत्ता आदि आपको अपना लिखने से विरत नहीं कर पातीं. कई बार प्रेम मूर्खता है तो कई बार लिखना भी. पर ऐसी मूर्खता से बचने का उपाय हम जैसे साठ से भी अधिक बरसों से लिखने में लगे लोगों को कहां पता है?

एक तरह से सारे बाहरी जीवन से कटे इस विवश एकान्त में पुस्तकें ही हमारे पास दूसरों के स्पन्दित जीवन लाती हैं. दूसरे, शब्दों के रास्ते, हमारे पास आ जाते हैं और हमें फिर जीवन जीने-सहने-रचने योग्य लगने लगता है.

कम जगह

इस अहसास से, चाहे आप समुदाय में या एकान्त में हों, बचना मुश्किल है कि हमारे समाज में साहित्य की जगह कम है. पहले अधिक थी इस पर, वर्तमान स्थिति को देखते हुए, यक़ीन करना मुश्किल है. अगर ऐसा था भी तो वह काफ़ी पहले का समय रहा होगा. आज जो लोग अपने ही घरों में दिन भर बन्द रहने को विवश हैं, उनमें से कितनों के पास पढ़ने के लिए साहित्य की कुछ पुस्तकें होंगी और उनमें से भी कितने उन्हें पढ़ने की इच्छा रखते होंगे! अटकल लगायी तो जा सकती है पर दुखी मन को और दुखी क्यों करना!

सही है कि सबके पास जगह इतनी कम है कि उसमें घरेलू ज़रूरी चीजें ही मुश्किल में अंट पाती हैं, उसमें पुस्तकों के लिए जगह नहीं निकाली जा सकती. पर जिनके पास थोड़ी-बहुत जगह निकल सकती है वे भी उस जगह को पुस्तकों के बजाय दूसरी चीज़ों के लिए ही, ज़्यादातर, उपयुक्त मानते हैं. ऐसे तो करोड़ों होंगे जो जगह होने के बावजूद पुस्तकों की कोई ज़रूरत महसूस नहीं करते और जिन्हें अपनी आखि़री पुस्तक पढ़े या पलटे कई दशक बीत चुके होंगे. उन्होंने पुस्तकों को बेदखल नहीं किया है, उन्होंने पुस्तकों को अपने यहां दाखि़ल ही नहीं होने दिया है. यह नहीं कहा जा सकता कि इस वज़ह से उनके जीवन में रस या भरापूरापन कुछ कम है. अगर है भी तो उन्हें यह अभाव परेशान नहीं करता.

जिस नयी गोदामियत में इन दिनों हम बहुत मुदित मन से रहते-विचरते हैं उसमें चीज़ों का ऐसा अटाला हम जोड़ते-सहेजते रहते हैं कि पुस्तकों के लिए न तो ज़रूरत बचती है, न जगह. इसका ज़रा भी अहसास पढ़े-लिखों तक को नहीं रह गया है कि हमें ज्ञान, दिलासा, राहत देने, व्यक्ति-समय-समाज को समझाने, दूसरों से साक्षात् करने का ज़रूरी काम पुस्तकें और साहित्य करते हैं.

एक रुख़ यह हो सकता है कि जिस चीज़ के लिए जगह इतनी कम है उसका उत्पादन इतना ग़ैर-आनुपातिक रूप से अधिक क्यों? बाज़ार में जिस चीज़ की अधिक खपत नहीं वह अपने आप ग़ायब हो जाती है. लेकिन पुस्तकें उत्पाद तो हैं पर वही नहीं हैं. लेखक लोगों के बीच अपनी जगह बनाने के लिए नहीं लिखता है. वह बन जाये इसकी आकांक्षा शायद करता है पर अगर न बने तो वह लिखना बन्द नहीं कर देगा. वह लिखता है क्योंकि उसे अपनी, अपने समय और समाज की, मानवीय स्थिति और विडम्बना की गवाही देना है. उसे भाषा की विपुलता और सूक्ष्मता को, उसकी सम्भावना को बचाना है. वह लिखता है क्योंकि उसके पास दूसरों से साझा करने को कुछ और उसके लिए उत्साह है. वह अकसर निराश होता है, अकेला पड़ जाता है पर लिखने की अपनी दीवानगी से अपने को मुक्त नहीं करता.

पुस्तकों को अगर हम जगह नहीं दे पाते तो यह हमारी ज़िम्मेदारी है. अगर हम कुछ अधिक मानवीय नहीं होना चाहते, न कुछ अधिक देखना-महसूस करना चाहते हैं तो यह हमारा निर्णय है. कई बार जिसे आज जगह नहीं मिलती उसे अच्छी-ख़ासी बाद में मिलती है.

कोराना एकान्त में मंसूर का साथ

एकान्त है और मल्लिकार्जुन मंसूर को हम लगातार सुन रहे हैं. लगता है कि एकान्त ही गा रहा है, सामुदायिकता को याद करते हुए, उसे विकल पुकारते हुए. यह संगीत पलायन या विराग का संगीत नहीं है, तब भी जबकि राग का नाम कबीरी भैरव है. यह संग-साथ का संगीत है. यह एकान्त को अनुपस्थित सामुदायिकता से, समय को अलक्षित अनन्त से, अतीत को वर्तमान से जोड़ने-मिलाने वाला संगीत है. इसमें अमूर्तन आकार ले रहा है. यह संगीत अमूर्तन का घर है और उसका पड़ोस भी. फिर भी यह पुकारता संगीत है: विकलता, विक्षोभ, लालित्य, सुघर स्थापत्य से गूजता संगीत. यह संगीत है और संगीतातीत घटना भी है.

विस्मय और रहस्य की दो धाराओं के बीच निश्छल पर कलकल बहता हुआ. उसे कहीं जाना नहीं है. वह अविराम है पर कहीं भी कभी भी रुक सकता है. उसका प्रवाह उच्छल है. उसका जल कई रंग लेता हुआ नीरंग हो जाता है. उसमें निर्मल स्वच्छता, निष्कलुष उज्ज्वलता, चमकता आवेग है. वह कहीं से आया नहीं है और न ही कहीं जा रहा है. वह यहीं का संगीत है, हमें घेरता-लपेटता, दुलारता-सहलाता.

उसके आवर्तन, जो अविराम और अबाध लगते हैं, एक के बाद एक आते जाते हैं और बिना किसी आडम्बर या नाटकीयता के, सहज भाव से, अपने को एक दूसरे से गूंथते चलते हैं और राग रूपायित होता चलता है. थोड़ी देर में आप राग को भूल जाते हैं, जो आपके सामने अवतार ले रहा होता है वह कोई देवता या ईश्वर नहीं स्वयं मल्लिकार्जुन मंसूर हैं - अप्रतिहत, अक्षय, समय में अवस्थित होकर भी कालातीत. फिर लगता है कि मंसूर कोई राग नहीं स्वयं अपने को गा रहे हैं. जिसका यह भी अर्थ है कि बचता है शुद्ध संगीत, राग-बन्धन से भी मुक्त, समय को स्थगित करता हुआ, कई बार उसे रौंदता हुआ.

कल रात दो बजे के बाद से नींद नहीं आयी सो बैठकर पढ़ता रहा. सुबह पौने पांच बजे खिड़की से पहली चिड़िया का स्वर सुनायी दिया. एक बेचैन रात के समाप्त होने और मंगल प्रभात का अग्रदूत. मंसूर का संगीत ऐसा ही मंगल प्रभात है. पन्त जी की कविता याद करते हुए पूछने का मन होता है प्रथम स्वर का आना, मंसूर जी, आपने कैसे पहचाना? रूमानी होते हुए भी इस संगीत में महाकाव्य जैसा वितान है - वह सारे संसार को अपने में संक्षिप्त कर लेता है. मंसूर अपनी अकेली आवाज़ में सारे संसार का गुणगान करते हैं. यह उनका भर नहीं, संसार का गान है. कोराना एकान्त में मन कृतज्ञता से भर उठता है कि इस निपट एकान्त में हमें संसार का संगीत मंसूर के माध्यम से सुन पाने का वरदान मिल रहा है.