राजस्थान का भीलवाड़ा देश का पहला शहर था जहां कोरोना वायरस की वजह से कर्फ्‍यू लगाया गया. यहां बीती 20 मार्च को एक निजी अस्पताल के तीन डॉक्टर और तीन नर्सिंग कर्मचारियों के कोरोना संक्रमित होने की ख़बर सामने आई थी. लेकिन बात इतनी भर नहीं थी. पता चला कि संक्रमित होने के बाद ये छहों, पांच हज़ार से ज़्यादा मरीज़ों के संपर्क में आए थे. जानकारी मिलते ही शासन-प्रशासन में हड़कंप मच गया और तुरत-फुरत उस अस्पताल के साथ ज़िले की सीमाओं को भी सील कर दिया गया. मौजूदा स्थिति की बात करें तो राजस्थान के कुल 69 कोरोना पॉज़िटिव मरीज़ों में से 26 भीलवाड़ा से आते हैं. इनमें से अधिकतर के संक्रमित होने के तार बांगड़ अस्पताल से जुड़े हैं. इन मरीज़ों में से दो की मौत हो चुकी है.

कैसे लापरवाही इस महामारी की वाहक बनी?

पूरी दुनिया में कोरोना एक विस्फोटक महामारी में कैसे तब्दील हो गया, इसे भीलवाड़ा के उदाहरण से समझा जा सकता है. स्थानीय जानकार बताते हैं कि शहर के बांगड़ अस्पताल में कार्यरत डॉक्टर नियाज़ में 12 मार्च को ही कोविड-19 के लक्षण नज़र आने लगे थे. 15 मार्च को उनके कोरोना वायरस से संक्रमित होने की पुष्टि हो गई. लेकिन बांगड़ अस्पताल प्रबंधन ने यह बात प्रशासन और अपने मरीज़ों से छिपाए रखी. यह उस पूरे घटनाक्रम का हूबहू छोटा मॉडल था जैसा कि चीन ने किया था और ख़ामियाज़ा पूरी दुनिया को उठाना पड़ा.

इसके बाद जब 19 मार्च को इसी अस्पताल के एक और डॉक्टर आलोक मित्तल में भी कुछ ऐसे ही लक्षण दिखाई दिए, तब जाकर बात खुल गई. लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी. जानकारों का कहना है कि दुनिया भर में भीलवाड़ा जैसा कोई अन्य मामला नज़र नहीं आता जहां मरीज़ों से डॉक्टर को नहीं बल्कि डॉक्टरों से मरीज़ों को यह बीमारी लगी है.

डॉक्टर संक्रमित कैसे हुए?

इसे लेकर अभी तक कुछ भी निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सका है. शुरुआत में अफ़वाह फैली थी कि डॉक्टर नियाज़ के कुछ रिश्तेदार सऊदी अरब से लौटे थे जो कोरोना संक्रमित थे. उनके संपर्क में आने की वजह से नियाज़ भी इस बीमारी की चपेट में आ गए और चेन बढ़ती चली गई. लेकिन जल्द ही भीलवाड़ा सीएमएचओ ने इस बात को नकार दिया.

इस बारे में कुछ का यह भी कहना है कि 8 मार्च को कोरोना के लक्षणों से ग्रस्त एक बुजुर्ग बांगड़ अस्पताल में भर्ती हुए थे. वहां उन्हें न्यूमोनिया का इलाज दिया गया जो बेअसर रहा. हालात न सुधरने पर इन बुजुर्ग को जयपुर के एक निजी अस्पताल में ले जाया गया जहां उनकी मौत हो गई. उनके शव को वापस भीलवाड़ा लाकर परिजनों ने उसका दाह संस्कार कर दिया. आशंका है कि वे बुजुर्ग कोरोना संक्रमित थे. इस मामले में भीलवाड़ा और जयपुर के अस्पतालों की घोर लापरवाही रही कि लक्षण दिखने के बावज़ूद उन्होंने बुजुर्ग का कोरोना टेस्ट नहीं करवाया.

शासन-प्रशासन के क्या इंतज़ाम हैं?

हालांकि यह तो नहीं कहा जा सकता है कि भीलवाड़ा में इस समय स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में है. लेकिन स्थानीय विश्लेषकों की मानें तो शासन-प्रशासन ने जिस तरह यहां युद्धस्तर पर मोर्चा संभाला है, वह तारीफ़ का हक़दार है. भीलवाड़ा से ही ताल्लुक़ रखने वाले सामाजिक कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी इस बारे में बताते हैं कि ‘जरा सी भी चूक होने पर भीलवाड़ा गंभीर स्थिति में पहुंच सकता था. लेकिन ज़िले के चिकित्सकों, पुलिस और प्रशासन ने हालात संभालने में पूरी ताक़त झोंक दी जिसकी वजह से अभी तक स्थिति तुलनात्मक तौर पर नियंत्रण में है.’ हालांकि मेघवंशी आगे यह भी जोड़ते हैं कि ज़िले में अब भी कई अंदरूनी इलाक़ों तक ज़रूरी इमदाद नहीं पहुंच सकी है.

स्थिति नियंत्रण में होने की खुशी मनाते भीलवाड़ा सरकारी अस्पताल के डॉक्टर

आगे हुई चर्चा में मेघवंशी हमारे ध्यान में लाते हैं कि इतनी बड़ी लापरवाही के बावजूद बांगड़ अस्पताल प्रबंधन पर अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है. इस अस्पताल के मालिक भारतीय जनता पार्टी के नेता और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला के समधी हैं. उनके कांग्रेस के भी बड़े नेताओं से गहरे ताल्लुकात बताए जाते हैं.

भीलवाड़ा के वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद तिवारी भी भंवर मेघवंशी से सहमति जताते हुए ज़िले में शासन व्यवस्था के इंतज़ामों को संतोषजनक बताते हैं. वे कहते हैं, ‘शहर के पांच निजी अस्पतालों को अधिगृहीत कर प्रशासन ने वहां आइसोलेशन के लिए दो सौ बेड तैयार किए हैं. शहर के कई होटलों को भी नियंत्रण में लेकर प्रशासन ने चार हज़ार लोगों की क्षमता का क्वारेंटाइन भी तैयार किया है. अभी शहर में तीस से ज़्यादा मोबाइल वैनों की मदद से रोज़मर्रा के सामान की आपूर्ति की जा रही है.’ बक़ौल तिवारी, ‘भीलवाड़ा में शुरुआती सात दिनों में ही तीन हजार टीमों की मदद से साढ़े चार लाख घरों के तक़रीबन 24 लाख लोगों की स्क्रीनिंग कर ली गई थी.’ सर्वे जैसी इस स्क्रीनिंग प्रक्रिया के तहत सरकारी कर्मचारियों ने घर-घर जाकर लोगों की सेहत से जुड़ी जानकारियां जुटाई थीं.

यहां यह बात राहत देती है कि राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार भीलवाड़ा ही नहीं बल्कि पूरे प्रदेश में कोरोना महामारी से निपटने के लिए वाजिब प्रयास करती नज़र आई है. ग़ौरतलब है कि राजस्थान उन शुरुआती राज्यों में शुमार था जहां कोरोना के ख़तरे को देखते हुए पहले धारा 144 लगाई गई और उसके तुरंत बाद ही लॉकडाउन कर दिया गया था. इस फ़ैसले के साथ ही गहलोत सरकार ने पेंशनधारी, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम से जुड़े परिवारों, दिहाड़ी मज़दूरों और अन्य ज़रूरतमंद लोगों के हितों को ध्यान में रखते हुए कई घोषणाएं कीं जिन्हें आलोचकों से भी सराहना मिली. जबकि केंद्र की मोदी सरकार इन तैयारियों के बिना ही लॉकडाउन लागू करने की वजह से कटघरे में खड़ी की जा रही है.

चिकित्सकीय क्षेत्र से जुड़े विभिन्न विश्लेषक कोरोना के जांच-इलाज के मोर्चे पर भी राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार के प्रदर्शन को संतोषजनक बताते हैं. रिपोर्ट लिखे जाने तक प्रदेश के सभी ज़िलों में क्वारेंटाइन के लिए कुल 95 हज़ार से ज़्यादा बेड चिन्हित किए जा चुके थे. वहीं आइसोलेशन के लिए चिन्हित बेडों की संख्या क़रीब सोलह हज़ार थी. राजस्थान सरकार से जुड़े विश्वसनीय सूत्र बताते हैं कि जल्द ही कोरोना वायरस के संक्रमितों की जांच और उपचार में जुटे चिकित्सक/नर्सिंग कर्मियों के लिए कुछ प्रोत्साहन राशि देने का फ़ैसला लिया जा सकता है. रिपोर्ट लिखे जाने तक राजस्थान में क़रीब आधी आबादी यानी सवा तीन करोड़ लोगों की स्क्रीनिंग की जा चुकी है.

प्रदेश के अतिरिक्त मुख्य सचिव (स्वास्थ्य विभाग) रोहित कुमार सिंह की मानें तो राजस्थान कोरोना टेस्टिंग के मामले में देश में पहले पायदान पर है और पॉज़िटिव केस मिलने के मामले में सबसे आख़िरी राज्यों में शामिल है. राहत इस बात की भी है कि रिपोर्ट लिखे जाने तक भीलवाड़ा में मिले कोरोना के सभी 26 मरीज़ों में से 13 की रिपोर्ट निगेटिव आ चुकी है.

राजस्थान में इस पूरे मामले को सक्रियता से देख रहे पत्रकार आशुतोष शर्मा बताते हैं कि ‘अशोक गहलोत सरकार इस बात के लिए तारीफ़ की हक़दार है कि वह बड़े स्तर पर कोरोना संक्रमण को रोक पाने में अभी तक सफल दिखी है.’ आशुतोष शर्मा के शब्दों में, ‘(भीलवाड़ा को छोड़कर) राज्य में पाए गए कोरोना मरीज़ों में से अधिकतर दूसरे देशों या राज्यों से संक्रमित होकर आए थे और यहां उनके सीधे संपर्क में आने वाले लोगों को भी इस बीमारी ने अपनी चपेट में ले लिया. ऐसे किसी भी केस की सूचना मिलते ही सरकार ने बिना देर किए उस पूरे इलाक़े में कर्फ़्यू लगा दिया और पल-पल की निगरानी रखी. शायद इस मुस्तैदी का ही असर रहा कि इनमें से किसी भी इलाक़े से कोरोना संक्रमण का कोई नया मामला सामने नहीं आ पाया है.’

लेकिन राजस्थान सरकार की इस सक्रियता की वजह से प्रदेश के सरकारी अस्पताल इस समय बेहद दबाव में हैं. शर्मा इस वजह से यहां के डॉक्टरों और नर्सिंग कर्मचारियों की सुरक्षा को लेकर चिंता जताते हुए कहते हैं, ‘ऐसे हालात में निजी अस्पतालों की तुलना में सरकारी अस्पतालों में हर एक बात की मॉनिटरिंग बहुत मुश्किल साबित हो रही है. ऐसे में प्रदेश के सरकारी अस्पतालों के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने कर्मचारियों को संक्रमण से बचाए रखने की है. इस मामले में हुई जरा सी चूक बहुत भारी पड़ सकती है!’

लेकिन इससे भी बड़ी चुनौती आम जनता का रवैया है

भीलवाड़ा की मौजूदा स्थिति के हवाले से भंवर मेघवंशी बताते हैं कि ‘शहर के मुख्य मार्गों पर सन्नाटा रहता है. लेकिन शहर की गलियों, बाहरी इलाक़ों और ग्रामीण क्षेत्रों में जुटने वाली भीड़ पर इस मुश्किल वक़्त का कोई खास प्रभाव नज़र नहीं आता है. पुलिस की गाड़ी का खटका होते ही सभी घरों में चले जाते हैं और पुलिस के जाते ही हालात जस के तस हो जाते हैं.’

वहीं, भीलवाड़ा प्रेसक्लब के अध्यक्ष सुखपाल जाट रोष जताते हुए कहते हैं कि ‘सोशल डिस्टेंसिंग को तार-तार करने पर तुले ये लोग एक तरफ़ तो चिकित्साकर्मियों के लिए थाली बजाते हैं और दूसरी तरफ़ अपने घरों पर स्क्रीनिंग के लिए आने वाले कर्मचारियों को ऐसी संदेहभरी नज़रों से देखते हैं मानो वे ही कोरोना को धरती पर लाए हों. लोग स्क्रीनिंग-सर्वे करने वालों के साथ बदसलूकी से पेश आ रहे हैं और उन्हें सही जानकारी देने से कतरा रहे हैं.’

स्थानीय जानकारों के मुताबिक ज़िले के कलेक्टर और पुलिस के अधिकारियों की लगातार समझाइश और सख़्ती के बाद भी भीलवाड़ा के बाशिंदों पर कोई ख़ास फ़र्क़ पड़ता नहीं दिख रहा है. सख़्त ज़रूरत पड़ने पर ही घर से निकलने की कुछ घंटों की छूट का यहां जबरदस्त दुरुपयोग किया जा रहा है. हालांकि कोरोना की वजह से हुई दो मौतों के बाद यहां कुछ दिन लोगों में अनुशासन महसूस किया गया था. लेकिन अब स्थिति फिर पहले जैसी ही नज़र आती है. नतीजतन सरकार ने भीलवाड़ा में 3 अप्रैल से 13 अप्रैल तक पूरी तरह कर्फ़्यू लगाए जाने का फ़ैसला लिया है.

राजस्थान के स्वास्थ्य एवं चिकित्सा राज्य मंत्री सुभाष गर्ग इस पूरे मामले पर सत्याग्रह को बताते हैं कि ‘सरकार अपनी तरफ़ से इस महामारी से लड़ने की हरसंभव कोशिश कर रही है. लेकिन इस मुहीम में हमें लोगों का भी सहयोग चाहिए. इसके लिए हम लगातार समझाइश भी कर रहे हैं. लेकिन कुछ लोगों पर इस बात का कोई असर नहीं होता दिख रहा. वे लोग ख़ुद पर मंडरा रहे ख़तरे को भांप नहीं पा रहे हैं.’ गर्ग आगे जोड़ते हैं, ‘आपके माध्यम से राजस्थान सरकार लोगों से यही अपील करती है कि वे ज़्यादा से ज़्यादा अपने घरों में रहें. क्योंकि यही सबसे बड़ी मानवता है कि हम बेवजह न तो अपनी जान को ख़तरे में डालें और न ही किसी और की.’